सुखी दांपत्य जीवन का सूत्र: पति प्रेम दे और पत्नी आदर करे, एक-दूसरे को साधन समझने से बिगड़ते हैं रिश्ते
अक्सर हम सुख और आनंद को एक ही मान लेते। यह गलत है। किसी को सुख मिलता है, लेकिन आनंद नहीं। सुख उसे कहते हैं, जहां दुख दब जाए। जब दुख जड़ से मिट जाए, वह ...और पढ़ें
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विवेक, प्रेम और आदर से पाएं जीवन में सच्चा आनंद और सुखी दांपत्य
HighLights
विवेक से जीवन में सच्चा आनंद प्राप्त होता है।
पति प्रेम दे, पत्नी आदर करे, दांपत्य सुखी होगा।
क्रोध, प्रतिशोध त्यागकर सत्संग से आनंद प्राप्त करें।
मोरारी बापू, कथावाचक। जीवन में आनंद बहुत माध्यम से प्राप्त किया जा सकता है। विवेक बहुत बड़ा आनंद प्रदान कर सकता है। विवेक दृष्टि का बहुत महत्व है। तुलसीदास कहते हैं, मैं मेरी आंखों को विवेक दृष्टि से दीक्षित कर राम कथा सुनाने जा रहा हूं। उन्होंने तीन प्रकार के विवेक बताए हैं। एक लौकिक विवेक, जिसका उपयोग जगत के साथ करना पड़ता है। पड़ोसी के साथ, बड़ों के साथ, समाज के साथ कैसे रहना चाहिए, यह विवेक लौकिक विवेक है।
लौकिक जगत के साथ हमारा संबंध कैसा हो, यह लौकिक विवेक बताता है। दूसरा है अलौकिक विवेक जो जीवात्मा के साथ जुड़ा है, जगत के साथ नहीं। अलौकिक विवेक का मतलब है- हम भीतर से सोचते रहें कि सारासार क्या है? क्षीर-नीर क्या है? शुभ-अशुभ क्या है? विजयरत्न सूरी कहते हैं- आपकी गाड़ी गलत रास्ते पर जा रही हो और उस समय गाड़ी के पहिए में पंचर हो जाए तो यह तुम्हारे कल्याण में है। यह तुम्हारे लिए आनंद का विषय है। यह समझ विवेक से ही आ सकती है।
तुलसीदास जी ने तीसरे विवेक को ब्रह्म विवेक बताया है... "पावक जुगसम ब्रह्मविवेक।" लकड़ी में अग्नि होती है लेकिन उसको रगडो तो ही अग्नि प्रकट होती है। कोई घट ब्रह्म के बिना सुना नहीं है, लेकिन उसका किसी सद्गुरु के द्वारा मंथन हो, तब ब्रह्म विवेक प्रकट होता है। कुल मिलाकर, विवेक वह है, जिसमें अनित्य नित्य नहीं लगे, अनात्म कभी आत्म नहीं लगे, दुख कभी सुख नहीं लगे और अपवित्र कभी पवित्र ना लगे। जब ऐसा होने लगता है तो जीवन में आनंद के द्वार खुलते चले जाते हैं। ऐसा विवेक सत्संग से ही संभव है। मानस में कहा गया है- बिनु सत्संग विवेक न होई। राम कृपा बिनु सुलभ न सोई।।"
विवेकी आदमी वह है, जो हसंते-हंसते मरण को भी स्वीकार कर ले। जो व्यक्ति मरने के भय को मन से निकाल दे, वह जीवन का आनंद अवश्य ले सकता है। मरण निश्चित है और जो निश्चित है, उसका आनंद अवश्य होना चाहिए। हां, यह आनंद विवेक से ही प्राप्त हो सकता है। भय निकल जाने पर अराजकता नहीं होनी चाहिए। विवेक के साथ व्यवस्था होनी चाहिए। ऐसी व्यवस्था, जो किसी दूसरे को अव्यवस्थित न कर दे। तभी आनंद का प्रादुर्भाव होगा।
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राम जन्म प्रसंग सुनाते हुए मैं अक्सर दांपत्य जीवन को आनंदमय बनाने की बात करता हूं। आजकल दांपत्य बहुत बिगड़ रहा है तो फिर आनंद कहां से आएगा? दांपत्य जीवन आनंदमय बनाने के लिए सिर्फ इतना करना है कि पति अपनी पत्नी से प्रेम करे और पत्नी अपने पति को पूरा आदर दे। पति-पत्नी एक-दूसरे को साधन नहीं, साध्य समझें। स्त्री सदैव प्रेम की भूखी होती है। पति प्यार दे, नारी समर्पित हो जाएगी। पत्नी को भी पति का आदर सम्मान करना चाहिए। आज के दौर में पति-पत्नी दोनों एक-दूसरे को साधन के रूप में देखते है, जिस कारण दांपत्य जीवन उलझता जा रहा है। पति-पत्नी परस्पर प्रेम करें और आदर दें, फिर दोनों मिलकर ठाकुर की सेवा करें तो घर अवध बन जाएगा। राम रूपी आनंद का जन्म संभव हो जाएगा। व्यक्ति जीवन रूपी रथ कृष्ण को सौंप दे। वह चलाएंगे तो मार्ग से नहीं भटकोगे। बीच-बीच में उपदेश देकर मार्गदर्शन भी करेंगे। अपनी लीलाओं से आनंद भी कराएंगे।
आनंद का एक मार्ग सत्य, प्रेम, करुणा भी है। सत्य अपने लिए हो, प्रेम दूसरे को लिए हो और करुणा पूरे संसार के लिए हो तो आनंद ही आनंद है। हां, इतना ज़रूर है कि सत्य की राह पर विघ्न आते हैं। प्रेम में बाधा आएगी। करुणा की राह पर प्रहार होंगे। भक्ति में विघ्न आना स्वाभाविक है। अगर भक्ति और प्रेम अहेतु हैं तो विघ्न कुछ नहीं कर पाएंगे। प्रेम निःस्वार्थ हो, इसमें सौदा नहीं होना चाहिए। परमात्मा मिले न मिले, परमात्मा का नाम हर वक्त साथ रखो। साधक को नियम का बंधन और प्रेम की स्वतंत्रता होनी चाहिए। मैं रामकथा के माध्यम से प्रसन्नता बांट रहा हूं, आनंद बांट रहा हूं। आनंद चाहिए तो जीवन में प्रतिशोध, बदला लेने वाली मनोवृत्ति से बचें। आनंद चाहिए तो संघर्ष से बचें। याद रखें, अति मंथन से विष निकलता है। तृष्णा में मंथन करते रहने से सिवाय अनर्थ के और कुछ हासिल नहीं होता।
आनंद चाहिए तो क्रोध और विरोध से बचें। बोध होने पर ये दोनों मिट सकते हैं। ज्ञान और बोध में अंतर है। ज्ञान होने पर व्यक्ति में क्रोध हो सकता है, जैसे-परशुराम। बोध होने पर व्यक्ति में क्रोध नहीं हो सकता, जैसे-महात्मा बुद्ध। अतिक्रोध शव का परिचायक है। बोध आते ही क्रोध और विरोध दोनों ही समाप्त हो जाते हैं। जहां घर्षण होता है, वहां अग्नि पैदा होती है। घर्षण से चंदन की लकड़ी में भी आग लग जाती है। जिनको भजन करना है, उन्हें विवाद से दूर रहना चाहिए। आनंद स्वयं चल कर आएगा।
आनंद सत्संग से भी आता है और साधु संत के संग से भी। साधु वो है जो निरपेक्ष हो। जो कोई इच्छा नहीं रखता हो। शांत हो। संत कैसा होना चाहिए, जिसमें करुणा आंखों से प्रकट हो जाए। दया उसकी सहज प्रवृति में हो। लोगों का कल्याण करता हो। शांतचित्तवादी हो। ऐसे लोगों का संग जीवन को आनंदित करता है।