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    यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Nov 16, 2015 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

    जीवन की वास्तविकताएं कुछ और होती, हमारी कल्पनाओं में जीवन कुछ अलग होता है

    By Preeti jhaEdited By:
    Updated: Mon, 16 Nov 2015 09:57 AM (IST)

    जीवन की वास्तविकताएं कुछ और होती हैं और हमारी कल्पनाओं में जीवन कुछ अलग होता है। जीवन दृष्टि का यही भेद सभी दुखों का कारण है। व्यक्ति अपनी हर अच्छी-बु ...और पढ़ें

    जीवन की वास्तविकताएं कुछ और होती, हमारी कल्पनाओं में जीवन कुछ अलग होता है
    जीवन की वास्तविकताएं कुछ और होती, हमारी कल्पनाओं में जीवन कुछ अलग होता है

    जीवन की वास्तविकताएं कुछ और होती हैं और हमारी कल्पनाओं में जीवन कुछ अलग होता है। जीवन दृष्टि का यही भेद सभी दुखों का कारण है। व्यक्ति अपनी हर अच्छी-बुरी इच्छा पूरी होते हुए देखना चाहता है। चाहे यह कैसे भी पूरी हो। व्यक्ति दूसरे व्यक्ति के कष्ट से अपरिचित है। दूसरा व्यक्ति थोड़ा क्रोध करता है तो ऐसा लगता है कि इसने हमारा अपमान कर दिया। सबको हर बात पर अपनी बात का प्रभाव चाहिए। सब चाहते हैं कि जो बात वे बोलें उसे ही सर्वमान्य समझा जाए। क्या यह संभव है? जब नहीं, तो क्यों अहं का विकार सामाजिक धारणा बनता जा रहा है? गुणी और ज्ञानीजन जीवन का ज्ञान भी दे रहे हैं, लेकिन वास्तव में ज्ञान आज अभिनय और प्रदर्शन का प्रतीक बन चुका है।
    ज्ञानीजन ज्ञान की गंभीरता का संवरण नहीं कर पा रहे। ज्ञान देने-लेने, बांटने-छांटने, सिखाने-सीखने की पद्धति केवल मनुष्यों में है। प्रकृति और पशु-पक्षियों पर कभी ध्यान दें तो आभास होता है कि इनकी दुनिया कितनी सहज व सरल है। ये प्राकृतिक नियमों का पूर्ण पालन करते हैं। स्वयं को प्रकृति से श्रेष्ठ नहीं समझते। इसी भावना से इनमें प्रकृति-प्रदत्त ज्ञान गहरे समाया होता है। इनकी आभासी दुनिया बहुत शक्तिशाली होती है। अपनी प्राकृतिक संचेतना, जानकारी का इन्हें गर्व नहीं होता।
    इनमें बुद्धि, विवेक, प्रज्ञा और आत्मिक ज्ञान की भावनात्मक प्रतियोगिताएं नहीं होतीं। इनका समस्त अर्जित अनुभव श्रेष्ठता या सम्मान के लिए नहीं तरसता। ये अपने अनुभवों से अपने परिवेश को यत्नपूर्वक सुखी-संपन्न रखते हैं। खाद्यान्न, रहन-सहन, चिकित्सा और भोग-विलास आदि के लिए इन्होंने चमचमाती कृत्रिम दुनिया इसीलिए नहीं बनाई ताकि इनके जीवन में आवश्यकताओं का भेद उत्पन्न न हो जाए, अमीर-गरीब का कोई विचार न उभर जाए। इन्हें कृत्रिम जीवन की विवशता में पड़ने की इसीलिए कभी आवश्यकता भी नहीं पड़ी। हमें पशु-पक्षियों से ज्ञान के मूल सिद्धांत सीखने चाहिए। नि:संदेह मानव पृथ्वी का सबसे ज्ञानी प्राणी है, लेकिन आज उसका ज्ञान जीवन की मौलिकता भूलकर कृत्रिमता से भर गया है। मौलिकता के लिए व्यक्ति को अपनी रचनात्मक शक्तियों को विकसित करना होगा। हर व्यक्ति में अलग-अलग रचनात्मक शक्तियां होती हैं। मन को एकाग्र कर इन्हें समझने का प्रयास करना चाहिए।