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रुक्मिणी ने क्यों कहा राधा को ‘रासेश्वरी’? जानिए कृष्ण भक्ति का सबसे मधुर रहस्य

Published: Mon, 31 Aug 2026 02:31 PM (IST)

जिस बालक ने बचपन से ही सहारा लिया, वही सारे संसार का सहारा बना। पराधीनता के कारागार में बंद द्वारों ...और पढ़ें

रुक्मिणी ने राधा को क्यों कहा रासेश्वरी कृष्ण भक्ति का अनमोल रहस्य

रुक्मिणी ने राधा को क्यों कहा रासेश्वरी कृष्ण भक्ति का अनमोल रहस्य

स्वामी मैथिलीशरण (संस्थापक अध्यक्ष, श्रीरामकिंकर विचार मिशन)। श्रीकृष्ण की लीला में गीतों की भरमार है। उनमें भी यदि गोपी गीत को निकाल दें तो श्रीमद्भागवत् में से भक्ति का अभाव हो जाएगा। गोपियों ने जो श्रीकृष्ण के प्रति अपना संबंध और अनुभव बताया है, वह अद्भुत भावराज्य है। वास्तव में गोपियों का भाव और जीवन तो श्रीकृष्ण का ही प्रतिबिंब है। कृष्ण रूप बिंब के बिना गोपी रूप प्रतिबिंब संभव ही नहीं है। वस्तुत: श्रीमद्भागवत में ही श्रीकृष्ण के माधुर्य और विरह की पीने योग्य व्याख्या है। भगवान से संबंध की स्थापना भागवत है। श्रीकृष्ण का विश्वरूप श्रीमद्भगवद्गीता है। मनुष्य की संपूर्ण मानसिकता में भगवान की उपस्थिति के काल में भगवान का दिव्य दर्शन ही महाभारत है। गर्ग संहिता तो प्रेम सरोवर है। गर्ग जी का भाव राधा के प्रति और वेदव्यास का भाव कृष्ण के प्रति परिलक्षित होता है।

यही पक्षपात वेदांत का अद्वैत है। जहां पर सिद्धाश्रम में पुन:रासलीला के लिए श्रीरुक्मिणी जी ही श्रीकृष्ण से एक बार पुन: रासलीला के आयोजन के लिए प्रोत्साहित करती हैं। यह विदेह भाव के अतिरिक्त संभव नहीं। रसिकशेखर भगवान कृष्ण मंद-मंद मुस्कुराहट प्रकट करते हुए रुक्मिणी जी से कहते हैं कि यदि श्रीजी श्रीराधा स्वयं इसको स्वीकार करें तो यह संभव हो सकता है। जो ईश्वर महाभारत के महायुद्ध में प्रवृत्त करने के लिए 18 अध्याय की गीता के द्वारा संपूर्ण ज्ञान देकर अर्जुन को शरणागत कर सकते हैं, वे कृष्ण क्या एक वाक्य में राधा जी को आदेश नहीं कर सकते? नहीं कर सकते! यही तो कृष्ण का माधुर्य है, जो राधाभाव में शरणागत हुए बिना संभव ही नहीं था। राधा की प्रियता और उनके अंदर उस भाव की उत्पत्ति के बिना कृष्ण नृत्य नहीं कर सकते हैं। भगवान कहते हैं...

रासेश्वर्यास्तु राधाया मनश्चेद् रन्तुमड़्ना:।
तदा रासो भवेदत्र भवतीभिस्तु पृचछ्यताम्।।

रुक्मिणी जी ने अन्य राजकुमारियों के साथ राधा जी के पास जाकर उन्हें अनेक गुणात्मक विशेषणों से संबोधित किया-हे रंभोरु! हे चंद्रवदने! वृजसुंदरियों की स्वामिनी, रासेश्वरी! प्रियतमे! शीलरूपिणी! हे शुभांगि! यदि आप हमारे रासेश्वर कृष्ण के साथ यहां श्रद्धाश्रम में रास रचाएं तो हम सबको अत्यंत प्रिय होगा। श्रीजी ने भी वही उत्तर दिया- यदि बिंब है तो मुझ प्रतिबिंब में वह स्वत: भाषित होगा ही। वे अन्य राजकुमारियों की प्रशंसा करती हुई अपने श्रीमुख से अमृतमय शब्दविन्यास के द्वारा कहती हैं कि यदि आप लोग अपनी परम सेवा-शुश्रूषा और भक्ति से परमप्रियतम प्रभु को वश में कर सको तो यह संभव है।

न ही कृष्ण अपने वश में हैं, न ही श्रीजी अपने वश में हैं। यही है गर्गसंहिता की आचारसंहिता। यही है कृष्ण की राधाभक्ति और राधा की कृष्णभक्ति। दोनों के प्रेम को जोड़कर प्रेम में सराबोर होने की इच्छा रखने वाली महारानी रुक्मिणी और राजकुमारियां धन्य हैं। यदि रुक्मणी जी स्वयं श्रीराधा के साथ श्रीकृष्ण के रास की भावना कर सकती हैं तो इससे बड़ा प्रसाद और इससे बड़ा अशरीरी महादर्शन प्रसाद कहां मिलेगा? यही है प्रत्यक्ष, साक्षात दर्शन, इति प्रसाद:।

राजकुमारियों द्वारा श्रीकृष्ण के भावों और उनके प्रति समर्पण को सुनते ही श्रीजी ने कह दिया- तथास्तु! रास की सारी रात्रि एक क्षण में व्यतीत हो गई। दो सखियों के बीच में एक कृष्ण, इस तरह से आकाशीय गोला बना और बीचोबीच श्रीकृष्ण और राधा। बीच में जो राधा के साथ कृष्ण हैं, यही सारे व्रत, दान, संयम, यज्ञ, तप, तीर्थ का फल हैं। यदि यह सुख नहीं मिला तो धर्म और धार्मिकों के सारे कार्य केवल शारीरिक व्यायाम हैं और कुछ नहीं। इस संसार में नारी और पुरुष के बीच में देह रहते हुए विदेहत्व यदि देखना हो तो महाराज गर्ग जी के नेत्रों से और नारद जी के मुख से उसे देखना और सुनना चाहिए।

रानियों ने रास करने के बाद ज्ञानमार्गी वेदांतियों के हृदय को परिपूर्ण करने के लिए वही कहा जो भक्ति, रास और ज्ञान को मिला दे। रानियां बोलीं- हे मेरे प्रभु! आपके साथ रास करके आपके मुख और चरणों की ताल को देख-सुनकर हमारा मन वैसे ही अद्वैतनिष्ठ हो गया, जैसे ज्ञानी मुनि ब्रह्मानंद में डूब जाते हैं। चाहे रास हो, चाहे कृष्ण जन्म हो चाहे रामजन्म हो, ब्रह्मानंद तो वही है।

राजकुमारियों, सत्यभामा जी और रुक्मिणी जी ने जब राधा जी से वृंदावन में हुए महारास और इस रास की तुलना करने को कहा तो श्रीजी ने वृंदावन के रास में प्रकृति और कालिंदी के सम्मान की रक्षा के लिए महारास को महान बताया। हमारी जो दिव्य सनातन वैष्णवी परंपरा है, उसमें उपलब्ध सुख को कृपा माना जाता है और जो उपलब्ध नहीं है, उसकी स्मृति में उसका सम्मान किया जाता है। यही है कृष्ण जन्म, जिसमें सब में प्रेम समा जाए। कारागार के ताले टूट जाएं और कालिंदी के तट पर मुक्ताकाश में रास हो। कृष्ण में ऐसा माधुर्य है, जिसकी सुगंध से आज भी सारा ब्रजमंडल सुवासित है। माधुर्य और शौर्य, कृष्ण की कला है। बांसुरी और शंख ही उनके वाद्य हैं। वे कर्तुं, अकर्तुं तथा अन्यथा कर्तुम हैं। कृष्ण पक्ष का पक्ष लेकर और अष्टमी तिथि का पक्ष लेकर इस धराधाम पर अवतरित हुए।

कृष्ण ब्रह्मांड की सत्ता के एकमात्र स्वामी हैं। श्रीकृष्ण मानव जाति के हृदय देश पर राज्य करने वाले वे राजा हैं, जो अपने हर रूप में संपूज्य और संपूर्ण सृष्टि के हृदयदेश में ग्राह्य और सुसंस्थापित हैं। जिस बालक ने बचपन से ही सहारा लिया हो, वही तो सारे संसार का सहारा बना। पराधीनता के कारागार में बंद द्वारों के ताले तोड़ना और जमुना के पार जाना, जो बंदी जाग रहे हैं उन्हें सुला देना तो उनकी वह लीलाएं हैं, जब वे जन्मे थे। देवकी और यशोदा, वसुदेव और नंदबाबा, अष्टमी और नौमी, जेल और घर, रात्रि और दिन, बांसुरी और राधा, राधा और रुक्मिणी और अनेक रानियां, महाभारत और भगवद्गीता और गर्ग संहिता। कृष्ण सबमें पूर्ण थे, हैं और रहेंगे।


भगवान कृष्ण ने कभी भी अपने लिए एक दिन भी नहीं जिया। प्रेम का ऐसा व्यापक स्वरूप, जो जिसको मिला पूरा मिला। अनुभव का आधार चाहे ज्ञान हो, प्रेम हो, कर्म हो या अज्ञानता ही क्यों न हो, वे सबको पूरे मिले। माखन चुराना, मिट्टी खाना ये सब व्यष्टि सत्य हैं। समष्टि सत्य तो वे स्वयं हैं। जो कृष्णद्वैपायन को भी पूज्य बना देते हैं, वृजभूमि को भी आराध्य बना देते हैं, पृथापुत्र परंतप अर्जुन से अपनी एकरूपता सिद्ध कर देते हैं। इतना बड़ा महाभारत युद्ध की मध्यस्थता करते हुए भी वे किसी के बैरी नहीं हैं। श्रीकृष्ण अनंत हैं, व्यापक और अखंड हैं। कृष्ण विश्वास के परमाश्रय हैं, श्रद्धा के बल हैं और भक्ति के परमलक्ष्य हैं। कितनी कृपा है उनकी कि वे जिसके पास होते हैं, उसी को अपना प्रिय बनाकर अपनी प्रियता और व्यापकता को सिद्ध करते हैं।

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