विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

मेटा के नए नियम: क्या बच्चों के लिए सुरक्षित होगा इंटरनेट मीडिया?

Published: Wed, 02 Sep 2026 03:08 PM (IST)

इंटरनेट मीडिया के नकारात्मक प्रभावों से बच्चों और किशोरों को बचाने के लिए मेटा ने कुछ बड़े बदलावों की घोषणा की है।

मेटा के नए नियम: क्या बच्चों के लिए सुरक्षित होगा इंटरनेट मीडिया?

मेटा के नए नियम: क्या बच्चों के लिए सुरक्षित होगा इंटरनेट मीडिया?

timer icon

समय कम है?

जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में

संक्षेप में पढ़ें

टेक्नोलॉजी डेस्क, नई दिल्ली। 20वीं सदी के नवें दशक में स्वास्थ्य चिंताओं, लत, जानकारियों के छिपाने के आरोपों के चलते तंबाकू कंपनियों के खिलाफ अमेरिकी अदालतों में लंबी मुकदमेबाजी शुरू हो गई थी। इसी का नतीजा हुआ कि 1998 में 'मास्टर सेटल एग्रीमेंट' हुआ। कुछ ऐसा ही मामला अब इंटरनेट मीडिया कंपनियों के खिलाफ देखने में भी आ रहा है।

फेसबुक और इंस्टाग्राम की पैरेंट कंपनी मेटा को लत लगाने वाले फीचर्स से बच्चों को हो रहे नुकसान का दोष माना गया है। दावों को सेटल करने के लिए कंपनी अमेरिकी राज्यों को 18 अरब डालर देने पर सहमति भी हो गई है।

मेटा के साथ साथ यूट्यूब, स्नैप, टिकटाक जैसी कंपनियों को भी अदालतों में अपना जवाब पेश करना पड़ा है। यह सेटलमेंट इंटरनेट मीडिया इंडस्ट्री के लिए एक अहम मोड़ हो सकता है, जो अभी तक रेगुलेटरी जांच से काफी हद तक बची हुई हैं।

दरअसल, इंटरनेट मीडिया के फीचर्स जैसे, इनफिनिट स्क्रालिंग, एल्गोरिदमिक रिकमेंडेशन, नोटिफिकेशन और अपने आप चलने वाले वीडियो लोगों को, खासकर किशोर यूजर्स को लंबे समय तक अपने आकर्षण में रखते हैं। इसी लत के चलते डिप्रेशन, एंग्जाइटी, ईटिंग डिसआर्डर और खुद को नुकसान पहुंचाने जैसी घटनाएं चर्चा में रहती हैं।

क्या इंटरनेट मीडिया में संभव है बदलाव

ज्यादातर इंटरनेट मीडिया प्लेटफॉर्म का मानना है कि टेक के इस्तेमाल और लत के बीच कोई साफ साइंटिफिक लिंक नहीं है। हालांकि, समझौते के चलते मेटा को अमेरिकी यूजर्स के लिए कुछ बड़े बदलावों के लिए बाध्य होना पड़ा है।

कंपनी इंस्टाग्राम और फेसबुक पर लगातार स्क्रालिंग रोकने, लत लगने और नींद में खलल पड़ने से बचाने के लिए एप के इस्तेमाल को सीमित करने जैसे उपाय करने जा रही है। मेटा उन फीचर्स को भी सीमित करेगा, जिससे बच्चों की मानसिक सेहत पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

WhatsApp Image 2026-09-02 at 2.37.29 PM

टीनएजर्स के लिए इन बदलावों के मायने

अभी इंस्टाग्राम और फेसबुक पर 13 साल या उससे अधिक उम्र का कोई भी व्यक्ति अकाउंट खोल सकता है। 18 वर्ष से कम उम्र के यूजर्स को स्वतः 'टीन अकाउंट्स' में डाल दिया जाता है, जो डिफाल्ट तौर पर प्राइवेट होते हैं और कुछ तरह के नुकसानदायक कंटेंट को भी सीमित कर दिया जाता है। मेटा अगले छह महीनों में नए फीचर्स लाने की तैयारी में है।

समय की सीमाः टीनएजर्स इंस्टाग्राम और फेसबुक पर दिन में सिर्फ दो घंटे ही बिता पाएंगे। पैरेंट्स ही सेटिंग्स में जाकर इससे अधिक समय की अनुमति दे सकते हैं। आधी रात से सुबह छह बजे के बीच बच्चे एप्स का इस्तेमाल नहीं कर पाएंगे। स्कूल के समय यानी सुबह आठ से दोपहर तीन बजे के बीच नोटिफिकेशन्स बंद रहेंगे।

फीचर्स बंद करनाः यूजर्स 'आटो प्ले' को बंद कर पाएंगे। यही कंटेंट की लत लगाने वाला फीचर है। एप पर अगली फोटो या वीडियो देखने के लिए टैप या स्वाइप करना होगा। टीनएजर्स एल्गोरिदम-आधारित पर्सनलाइज्ड फीड वाले फीचर को भी बंद कर पाएंगे।

कंपनी की मानें तो 60 मिनट और 90 मिनट के इस्तेमाल के बाद प्रांप्ट दिखाई देंगे। कंपनी 'लाइक' काउंट्स को भी बंद करेगी। साथ ही, टीनएजर्स को "एक्सट्रीम मेकअप फिल्टर्स" और कास्मेटिक सर्जरी जैसे दिखने वाले फिल्टर्स के इस्तेमाल को भी सीमित करेगी।

अतिरिक्त सुरक्षा उपायः मेटा 'अजनबियों से अनचाहे संपर्क' के खिलाफ मजबूत सुरक्षा उपाय लागू करेगा। हालांकि, ये सुरक्षा उपाय और प्रतिबंध कैसे काम करेंगे, यह स्पष्ट नहीं है। मेटा उन टूल्स को बेहतर बनाने का वादा किया है, जिससे पैरेंट्स देख पाएंगे कि उनके बच्चे एप्स पर कितना समय बिता रहे हैं, वे क्या सर्च कर रहे हैं। जब बच्चे नए अकाउंट बनाएंगे या किसी संदिग्ध के साथ बातचीत करेंगे, तो माता-पिता को अलर्ट किया जाएगा।

उम्र की पुष्टिः मेटा और अन्य कंपनियां उम्र की पुष्टि करने के लिए टूल्स विकसित कर रही हैं। ओपनAI ने भी 'चैटजीपीटी फार टीन्स' की घोषणा की है, जो सुरक्षा सुविधाओं वाला चैटबाट का एक नया मोड है। कंपनी की मानें तो यूजर की उम्र जानने के लिए वह 2,000 से अधिक सिग्नल्स को ट्रैक करती है।

फिर भी बनी रहेंगी मूल समस्याएं

यह समझौता एक बड़ा बदलाव है, लेकिन कुछ बुनियादी समस्याओं का इसमें स्पष्ट समाधान नहीं दिखता, खासकर रिकमेंडेशन एल्गोरिदम और स्क्रालिंग को बढ़ावा देने वाले फीचर्स पर नियंत्रण कैसे होगा, यह साफ नहीं है। नए नियमों में समय की सीमा, रात के समय इस्तेमाल और सुरक्षा कंट्रोल पर जोर तो है, पर रिकमेंडेशन सिस्टम की चर्चा नहीं है।

टीनएजर उन दो घंटों के दौरान क्या देखता है, यह भी समझना उतना ही महत्वपूर्ण है। ये शर्तें अभी सिर्फ अमेरिका में लागू होंगी, जबकि मेटा की पहुंच और नुकसान पहुंचाने की उसकी क्षमता पूरी दुनिया में है। जिन देशों में नियमन सख्त नहीं हैं, वहां इनका जोखिम बना रहेगा और बढ़ता रहेगा।

कैसे जोखिम छिपे हैं इंटरनेट मीडिया में

हमें समझना होगा कि खतरा इंटरनेट मीडिया के किसी खास फीचर में नहीं, बल्कि बुनियादी बिजनेस माडल में है, चाहे वह लत की शक्ल में हो या जहरीली गलत जानकारी के फैलाव में, सतर्कता कई स्तरों पर बढ़ानी होगी। लोगों को आनलाइन ट्रैक और मानिटर करना, इकट्ठा डेटा से प्रोफाइल बनाना और उसे ग्राहकों को टारगेट करने वाले विज्ञापनों को बेचना।

आज लगभग हर इंटरनेट मीडिया प्लेटफॉर्म की आनुवांशिकी का हिस्सा है। ये सभी जवाबदेही से मुक्त हैं, वे खुद को पब्लिशर के तौर पर नहीं दिखाते, क्योंकि गलत दिखाने पर जिम्मेदारी तय होगी। वे आटो कंपनियों जैसे नहीं दिखना चाहते, क्योंकि फिर प्रोडक्ट की सुरक्षा की जिम्मेदारी लेनी होगी।

बच्चों की सुरक्षा के लिए भारत की तैयारी

भारत में 15-29 वर्ष के युवाओं में आत्महत्या की दर दुनिया में सबसे अधिक है। भारतीय उपमहाद्वीप में साइबर-बुलिंग की वजह से कई दुखद घटनाएं हुई हैं। इसमें लड़कियों को टारगेट करके परेशान किया जाता है। एल्गोरिदमिक कंटेंट से कट्टरपंथी सोच का नजरिया विकसित हुआ है। हालांकि, भारत पूरी तरह से चुप नहीं है।

डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन (डीपीडीपी) एक्ट, 2023 के तहत 18 वर्ष से कम उम्र के किसी भी व्यक्ति को बच्चा माना जाता है और किसी भी डेटा प्रोसेसिंग से पहले माता-पिता की "वेरिफिएबल सहमति" (सत्यापन योग्य सहमति) जरूरी है। ऐसा नहीं करने पर प्लेटफॉर्म पर करोड़ों रुपये तक का जुर्माना लग सकता है। इसे लागू करने में चुनौतियां भी हैं।

उम्र की पुष्टि करना पुलिस के लिए मुश्किल काम है। यह एक्ट डेटा प्राइवेसी की बात तो करता है, लेकिन यह डिजिटल प्लेटफॉर्म के "लत लगाने वाले आर्किटेक्चर", जैसे एल्गोरिदम-आधारित फीड और वेरिएबल रिवार्ड नोटिफिकेशन को रेगुलेट नहीं करता है, जिससे शोषणकारी डिजाइन का बड़ा सवाल अनसुलझा रह जाता है।

क्या कहते हैं एक्सपर्ट्स?

बढ़ी हैं सकारात्मक बदलाव की उम्मीदें
-जसप्रीत बिंद्रा, सह-संस्थापक एवं सीईओ, AI एंड बियान्ड

नाइट कर्फ्यू, ब्रेक लेने के लिए प्रांप्ट और एल्गोरिदम-आधारित फीड से बाहर निकलने का विकल्प देने जैसे उपाय मेटा का उत्साहजनक कदम है। पहले के फीचर्स के उलट, यह एक अधिक गंभीर और व्यवस्थित प्रतिबद्धता लगती है। लगता है कि यह महज एक घोषणा भर नहीं है जो समय के साथ गायब हो जाएगी। यह सही है कि कुछ फीचर्स के जरिये रातों-रात सब कुछ ठीक नहीं हो सकता, लेकिन यह फैसला महत्वपूर्ण है।

यह सकारात्मक बदलाव की शुरुआत करता है। अगर स्वतंत्र आडिट से यह स्पष्ट होता है कि ये टूल्स अपने वादे पूरे करते हैं, तो ऐसे मानक बनाए जा सकते हैं, जो हर प्लेटफॉर्म बेहतर बनाने में उपयोगी साबित होंगे। इसे अहम मोड़ के तौर पर देख सकते हैं, इंडस्ट्री ने आखिरकार सिर्फ एंगेजमेंट के बजाय लोगों की भलाई को ध्यान में रखकर डिजाइन करना शुरू किया।

यह भी पढ़ें- Vivo का 6500 mAh बैटरी वाला 5G फोन सिर्फ ₹18,524 में, मिलिट्री-ग्रेड ड्यूरेबिलिटी और 50MP कैमरा