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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Dec 23, 2016 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

माघ मेला शुरू होने से पहले ही कई घाटों पर कम हुआ पानी

By Ashish MishraEdited By:
Published: Fri, 23 Dec 2016 10:54 AM (GMT+05:30)Updated: Fri, 23 Dec 2016 12:03 PM (GMT+05:30)

इस बार अभी मेला शुरू भी नहीं हुआ है और संगम के आसपास कई घाट बेपानी हैं। दारागंज, काली घाट ...और पढ़ें

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संजय कुशवाहा, इलाहाबाद । पुरानी कहावत है ...मन चंगा तो कठौती में गंगा। इसका भावार्थ यह है कि मन साफ होना चाहिए। स्नान कहीं भी हो। खैर, सनातन मतावलंबियों की आस्था यह है कि गंगा स्नान से सारे पाप धुल जाते हैं, इसलिए वह कीचडय़़ुक्त पानी में भी डुबकी लगा देते हैं पुण्य की। विश्वास नहीं हो तो यमुना में नहाते श्रद्धालुओं के मुंह से सुन लें... यही सुनाई देता है- हर हर गंगे। माघ मेले में तो अक्सर यह देखने को मिलता है।

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गंगा में प्रदूषण है, यह बात किसी से छिपी नहीं है। फिर भी क्यों आस्था का सैलाब संगम क्षेत्र में उमड़ता है, इस प्रश्न का जवाब किसी के पास नहीं। खैर इस बार अभी मेला शुरू भी नहीं हुआ है और संगम के आसपास कई घाट बेपानी हैं। दारागंज, काली घाट और महावीर घाट पर कीचडय़ुक्त पानी में ही डुबकी लग रही आस्था की। तीर्थ पुरोहित अवधेश त्रिपाठी कहते हैं कि गंगा से हमारी आस्था जुड़ी हैं। फिर चाहे वह मैली ही क्यों न हों। यमुना में स्नान के दौरान गंगा की जयकार पर कहते हैं कि वह तो गंगा की बहन हैं, अंतर कैसा?

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माघ मेला प्रशासन हर साल भीड़ को इधर उधर घुमाता है उससे भी लाखों श्रद्धालुओं को यमुना में ही डुबकी लगानी पड़ती है। जो श्रद्धालु बंधवा हनुमान मंदिर से होते हुए किला घाट के आसपास पहुंचते हैं, उन्हें यमुना में डुबकी लगानी पड़ती है। इसके पीछे एक वजह प्रशासनिक व्यवस्था भी रहती है। यमुना में भी बैरिकेडिंग कर घाट बनाए जाते हैं इससे लोगों को संगम आने से पहले ही डुबकी लगानी पड़ती है। बावजूद इसके भक्तों के मन में गंगा की महिमा कम नहीं होती।

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