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लोकतंत्र सेनानी राममूर्ति सिंह का निधन, राजकीय सम्मान के साथ सरयू नदी के तट पर अंतिम विदाई

Published: Wed, 26 Aug 2026 05:12 PM (IST)

आपातकाल के संघर्ष में सक्रिय रहे लोकतंत्र सेनानी राममूर्ति सिंह का अयोध्या में निधन हो गया। उन्हें राजकीय सम्मान के साथ सरयू नदी के तट पर अंतिम विदाई दी गई।

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HighLights

  1. लोकतंत्र सेनानी राममूर्ति सिंह का अयोध्या में निधन।

  2. आपातकाल में करीब दो साल तक जेल में रहे।

  3. राजकीय सम्मान के साथ सरयू तट पर अंतिम संस्कार।

जागरण संवाददाता, भीटी (अंबेडकरनगर)। आपातकाल के संघर्ष का हिस्सा रहे लोकतंत्र सेनानी व साकेत महाविद्यालय छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष राममूर्ति सिंह का बुधवार सुबह उनके अयोध्या स्थित आवास पर निधन हो गया। वे करीब 77 वर्ष के थे।

1975-77 के बीच देश में लागू आपातकाल के विरोध में व्यापक आंदोलन किया गया था। उस दौरान पुलिस ने लाठीचार्ज कर आंदोलन स्थल व घरों से तमाम लोग को गिरफ्तार कर विभिन्न जेलों में बंदी बना दिया था। भीटी के टेमा गांव के राममूर्ति सिंह अयोध्या में आंदोलन का प्रमुख हिस्सा थे।

उन्होंने अपने सैकड़ों साथियों के साथ फैजाबाद (अब अयोध्या) में एकत्र होकर 1975 में आंदोलन किया। इसके बाद पुलिस ने उन्हें फैजाबाद से भीटी के रायगंज के श्यामा चरण सहित तमाम साथियों के साथ गिरफ्तार कर डीआईआर और मीसा लगाकर बंदी बना दिया था।

राममूर्ति करीब दो वर्षों तक जेल में बंद रहे। मार्च 1977 में आपातकाल समाप्त होने के बाद अन्य बंदियों के साथ उन्हें भी रिहा किया गया था। वह प्रमुख समाजवादी राजनेता राजनारायण और जयप्रकाश नारायण के करीबी रहे।

उनके तीन पुत्र चंद्रशेखर सिंह, रवि शेखर और इंद्र शेखर हैं। मुखाग्नि छोटे पुत्र इंद्र शेखर ने दी। शव को तिरंगे में लपेटकर पुष्प अर्पित किया गया। सरयू नदी किनारे पुलिस व प्रशासन की मौजूदगी में जमथरा घाट पर सलामी संग राजकीय सम्मान के साथ अंतिम विदाई दी गई। पूर्व विधायक जयशंकर पांडेय, भाजपा के पूर्व जिलाध्यक्ष रमाशंकर सिंह समेत तमाम लोग मौजूद रहे।

संसद में पर्चा फेंकने पर किए गए थे गिरफ्तार

राममूर्ति सिंह 1967 से राजनीति में सक्रिय रहे। वर्ष 1972-73 में वे साकेत महाविद्यालय अयोध्या छात्रसंघ अध्यक्ष रहे। 1971-72 में अयोध्या में विश्वविद्यालय की मांग को लेकर तत्कालीन छात्रसंघ अध्यक्ष जयशंकर पांडेय के नेतृत्व में आंदोलन चल रहा था। यहां बनी रणनीति के क्रम में राममूर्ति ने सहयोगी श्यामाचरण के साथ संसद भवन में पर्चा फेंका। तत्समय दोनों को गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया।

तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने मामले को संज्ञान लिया और मांग को जायज बताते हुए उन्हें जेल से रिहा कराया। डा. राम मनोहर लोहिया अवध विश्वविद्यालय की स्थापना का श्रेय उक्त आंदोलन को है।

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