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अमेठी में भाजपा दावेदार परेशान? कांग्रेस के गढ़ में ‘कमल’ खिलाने वाली स्मृति हुई एक्टिव, गरमाई 2027 चुनाव की राजनीति

Published: Wed, 12 Aug 2026 10:46 AM (IST)

2027 विधानसभा चुनाव से पहले अमेठी में स्मृति इरानी की बढ़ती सक्रियता ने राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी है, ...और पढ़ें

कांग्रेस के गढ़ में ‘कमल’ खिलाने वाली स्मृति 2024 में हार के बाद फिर बढ़ा रही हैं अपनी सक्रियता

कांग्रेस के गढ़ में ‘कमल’ खिलाने वाली स्मृति 2024 में हार के बाद फिर बढ़ा रही हैं अपनी सक्रियता

HighLights

  1. स्मृति इरानी की सक्रियता ने अमेठी में राजनीतिक हलचल बढ़ाई।

  2. 2027 विधानसभा चुनाव के लिए भाजपा की नई रणनीति तैयार।

  3. कांग्रेस की वापसी की उम्मीदें, भाजपा के लिए नई चुनौतियां।

दिलीप सिंह, अमेठी। विधानसभा चुनाव 2027 से पहले पूर्व केंद्रीय मंत्री स्मृति इरानी की अमेठी को लेकर बढ़ी सक्रियता ने कांग्रेस सहित सभी राजनीतिक दलों के नेताओं की नींद उड़ा दी है। कार्यकर्ताओं से सीधा संवाद, चित्रकूट धाम तक ट्रेन की सौगात की घोषणा और अमेठी से बहन वाले रिश्ते का जिक्र, इन तमाम सियासी घटनाक्रमों ने अमेठी के गलियारों में चर्चा का बाजार फिर से गर्म कर दिया है।

विरोधी दलों के साथ-साथ इस सक्रियता से भाजपा के भीतर टिकट व पद की चाहत रखने वाले नेताओं और जुबानी जंग लड़ने वाले बयानवीरों की धड़कनें भी तेज हो गई हैं।

आम चुनाव 2019 और विधानसभा चुनाव 2022 के नतीजों के बाद ऐसा प्रतीत होने लगा था कि अमेठी में कांग्रेस की वापसी शायद ही निकट भविष्य में संभव हो सके। लेकिन, साल 2023 के नगर निकाय चुनाव में कांग्रेस ने रणनीति बदलते हुए जायस नगर पालिका परिषद की सीट पर विशेष फोकस किया और भाजपा तथा सपा के उम्मीदवारों को पछाड़कर शानदार जीत दर्ज की। यहीं से कांग्रेस के रणनीतिकारों को एक बार फिर अमेठी को अपने पाले में खींचने की उम्मीद नजर आई।

स्मृति की सक्रियता से बढ़ी टिकट व पद की चाहत रखने वालों की बेचैनी

इसका असर आम चुनाव 2024 में साफ दिखाई दिया, जब कांग्रेस ने सोची-समझी रणनीति के तहत केएल शर्मा को मैदान में उतारा और पूरी पार्टी उनके पीछे चट्टान की तरह खड़ी हो गई। समाजवादी पार्टी का साथ मिलने से हाथ को और मजबूती मिली और वे स्मृति इरानी के मुकाबले चुनावी दंगल जीतने में सफल रहे।

दूसरी ओर, जमीनी हकीकत यह रही कि भाजपा के भीतर ही कुछ नेताओं ने स्मृति के पक्ष में हवा का दावा तो खूब किया, लेकिन धरातल पर वह मेहनत नदारद रही जो वोट में तब्दील होती है। नामांकन के पहले दिन से ही शुरू हुई बयानबाजी और अपने ही दल के भीतर एक-दूसरे को नीचा दिखाने की होड़ ने आखिरकार बाजी पलट दी।

2027 विधानसभा चुनाव के पहले स्मृति की दिलचस्पी से बढ़ी हाथ दिखाने वाले नेताओं की धड़कन 

अब स्मृति की दोबारा बढ़ती सक्रियता ने उन विपक्षी नेताओं के साथ-साथ भाजपा के उन नेताओं को भी बेचैन कर दिया है, जिनके बयानों और क्रिया-कलापों ने पार्टी की हार की पटकथा लिखने में परोक्ष रूप से मदद की थी। 2027 के रण के लिए भाजपा की नई व्यूह रचनासाल 2024 के आम चुनाव में मिली हार के बाद कांग्रेस के बढ़ते हौसले को पस्त करने और 2027 के विधानसभा चुनाव में शानदार प्रदर्शन के लिए भाजपा ने अभी से कमर कस ली है और धरातल पर काम शुरू हो चुका है।

2014 से लेकर 2024 तक स्मृति इरानी ने चलाया था लोगों को जोड़ने का सिलसिला

गौरतलब है कि 2014 से लेकर 2024 तक स्मृति इरानी ने अमेठी के गांव-गांव और घर-घर जाकर लोगों को भाजपा परिवार से जोड़ने का जो सिलसिला चलाया था, उसका असर आज भी कायम है। आम चुनाव हारने के बावजूद आज भी उनके समर्थकों और शुभचिंतकों का दायरा अन्य नेताओं के मुकाबले काफी बड़ा है। इसी भावनात्मक जुड़ाव और जनाधार को भाजपा 2027 के चुनावी समर में अपना सबसे बड़ा हथियार बनाने की तैयारी में जुटी है। खास बात यह है कि जिले के सांगठनिक ढांचे पर स्मृति की मजबूत पकड़ पहले की तरह आज भी बरकरार है।

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दीदी स्मृति और अमेठी न कभी, एक दूसरे से दूर थे और न ही कभी होंगे। वह अमेठी के विकास के लिए हमेशा प्रयत्नशील रहती हैं। यहां के जन-जन के सुख-दुख में हमेशा सभी के साथ खड़ी होती हैं। उनकी सक्रियता अपनी अमेठी को लेकर हमेशा एक सी बनी हुई है।

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सुधांशु शुक्ला, जिलाध्यक्ष।