आस्था, संगीत और मिठास की नगरी अमरोहा: द्वापरकालीन वासुदेव तीर्थ से लेकर विश्वप्रसिद्ध ढोलक और ऐतिहासिक दरगाह तक की स्वर्णिम गाथा
अमरोहा अपनी प्राचीन आध्यात्मिक विरासत, बेमिसाल हस्तशिल्प और गंगा-जमुनी तहजीब के लिए प्रसिद्ध है। यहां द्वापरकालीन वासुदेव तीर्थ, हजरत शाह विलायत की दर ...और पढ़ें

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5000 वर्ष पुराना श्री वासुदेव तीर्थ और स्वयंभू बाबा बटेश्वरनाथ।
हजरत शाह विलायत की दरगाह, जहां बिच्छू नहीं डंक मारते।
ओडीओपी योजना से विश्वप्रसिद्ध अमरोहा ढोलक उद्योग को पहचान।
डिजिटल डेस्क, अमरोहा। उत्तर प्रदेश का ऐतिहासिक जनपद अमरोहा अपनी प्राचीन आध्यात्मिक विरासत, बेमिसाल हस्तशिल्प और गंगा-जमुनी तहजब के लिए पूरे विश्व में एक विशिष्ट पहचान रखता है। मंदिरों की पावन घंटियों से शुरू होने वाली यहाँ की सुबह और ढोलक की सुरीली थाप के साथ ढलती शाम इस शहर को बेहद खास बनाती है। 'आम' और 'रोहू' मछली के अनूठे संगम से उत्पन्न 'अमरोहा' नाम केवल एक भौगोलिक सीमा नहीं, बल्कि एक जीवंत रूहानी अनुभव है। शहर का हर कोना, ऐतिहासिक इमारतें और धार्मिक स्थल सदियों पुरानी गौरवशाली कहानियों को आज भी अपने भीतर जीवंत रखे हुए हैं।
5000 वर्ष पुराना श्री वासुदेव तीर्थ और स्वयंभू बाबा बटेश्वरनाथ
अमरोहा की आध्यात्मिक चेतना का मुख्य केंद्र यहाँ स्थित प्राचीन श्री वासुदेव तीर्थ है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, लगभग 5,300 वर्ष पूर्व द्वापर युग में स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने इस पावन भूमि पर आगमन किया था और इस कुंड में स्नान कर पिंडदान संपन्न किया था। इस पवित्र सरोवर में मत्स्य व कच्छप रूपी अवतारों के प्रतीक आज भी विद्यमान माने जाते हैं। इसी पावन परिसर में एक विशाल वट वृक्ष के नीचे से स्वतः प्रकट हुए स्वयंभू शिवलिंग 'बाबा बटेश्वरनाथ' के रूप में विख्यात हैं, जहाँ वर्ष भर सभी धर्मों के श्रद्धालु अगाध श्रद्धा के साथ दर्शन और पूजन करने आते हैं।
हज़रत शाह विलायत की ऐतिहासिक दरगाह: जहाँ बिच्छू भी नहीं मारते डंक
अमरोहा अपनी रूहानी करामातों और भाईचारे की मिसाल के लिए भी दुनिया भर में जाना जाता है। ईस्वी सन 1272 में सूफी संत हज़रत शाह विलायत अमरोहा तशरीफ लाए थे। उनकी पावन दरगाह परिसर में एक अद्भुत चमत्कार सदियों से चला आ रहा है—यहाँ पाए जाने वाले अत्यंत विषैले बिच्छू भी किसी इंसान को डंक नहीं मारते। देश-विदेश से आने वाले ज़ायरीन और पर्यटक इन बिच्छुओं को बिना किसी भय के अपनी हथेलियों पर रखकर तस्वीरें खिंचवाते हैं। यह दरगाह अमरोहा की साझी संस्कृति और अलौकिक आस्था का एक अनुपम प्रतीक है।
ओडीओपी ढोलक उद्योग: लकड़ी के शहतीर से सुरीली थाप तक का वैश्विक सफर
संगीत और वाद्ययंत्र निर्माण के क्षेत्र में अमरोहा के कारीगरों के हुनर का कोई सानी नहीं है। राज्य सरकार की 'एक जिला एक उत्पाद' (ODOP) योजना के तहत अमरोहा की प्रसिद्ध ढोलक को विशेष दर्जा प्रदान किया गया है। यहाँ के कारीगर लकड़ी के एक ही ठोस गट्टे को ऐसी अद्भुत तकनीक से तराशते हैं कि बिना लकड़ी बर्बाद किए उसी से पंजाबी ढोल, पखावाज, ढोलक और तबले का ढांचा तैयार कर लेते हैं। 25 प्रतिशत सब्सिडी युक्त वित्तीय सहायता और सुलभ बैंक ऋणों के माध्यम से यहाँ ढोलक निर्माण की कई नई इकाइयां स्थापित हुई हैं, जिससे स्थानीय कारीगरी को वैश्विक पहचान और नया बाजार मिला है।
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आमों की दुर्लभ किस्म 'नियादर मनोता', बाह का कुआं और तिगरी मेला
अमरोहा अपनी खास पैदावार और ऐतिहासिक धरोहरों के लिए भी विख्यात है। यहाँ आमों की ऐसी दुर्लभ प्रजातियां पाई जाती हैं जो केवल इसी क्षेत्र में उगती हैं, जैसे अचार के लिए प्रसिद्ध 'नियादर मनोता' आम, जिसका बना अचार वर्षों तक खराब नहीं होता। इसके साथ ही, बदलते दौर का साक्षी रहा ऐतिहासिक 'बाह का कुआं' अमरोहा के समृद्ध अतीत की झलक दिखाता है। गंगा नदी के तट पर स्थित तिगरी घाट पर कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर विशाल 'लक्खी मेला' आयोजित होता है, जहाँ लाखों श्रद्धालु आस्था की डुबकी लगाते हैं। मान्यता है कि त्रेतायुग में श्रवण कुमार भी इस तट पर ठहरे थे, जो अमरोहा की सनातन परंपरा को दर्शाता है।