300 साल पुरानी पांडुलिपि में श्रीरामचरितमानस के सातों कांड समाहित, राम मंदिर के संग्रहालय में रखी जाएगी कृति
अयोध्या के कुमारगंज निवासी जंगजीत सिंह ने अपनी 300 साल पुरानी, लगभग 400 पन्नों की दुर्लभ श्रीरामचरितमानस पांडुलिपि अंतरराष्ट्रीय रामकथा संग्रहालय को स ...और पढ़ें

श्रीरामचरितमानस की तीन सौ वर्ष पुरानी पांडुलिपि। जागरण

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लवलेश कुमार मिश्र, अयोध्या। अंतरराष्ट्रीय रामकथा संग्रहालय को श्रीरामचरितमानस की दुर्लभ पांडुलिपि सौंपने का प्रस्ताव देकर चर्चा में आए कुमारगंज निवासी जंगजीत सिंह का परिवार इस कृति को देवतुल्य मानकर पूजता है। लगभग 400 पन्नों की इस श्रीरामचरितमानस में सातों कांड सुरक्षित हैं, जिसे यह परिवार पीढ़ियों से संजोता आ रहा है।
जंगजीत सिंह बताते हैं कि यह कृति उन्हें उनके बाबा स्व. सुरेंद्र बहादुर सिंह (जन्म 1904) से मिली थी, जिन्हें यह उनके बाबा स्व. श्रीपाल सिंह ने सौंपी थी। वर्ष 1990 में बाबा और 2004 में पिता स्व. तेज बहादुर सिंह के निधन के बाद, अब जंगजीत और उनकी पत्नी मीरा देवी इस विरासत की सेवा कर रहे हैं।
जंगजीत के बाबा जीवनभर नियमित रूप से इसका पाठ करते रहे। अयोध्या में विज्ञापन देखने के बाद जंगजीत ने इसे संग्रहालय को सौंपने का निर्णय लिया।
हालांकि, परिवार ने शुरुआत में इसका विरोध किया, लेकिन जंगजीत इस बात पर अडिग रहे कि उनके घर में रखी यह दुर्लभ निधि पूरी दुनिया के सामने आए और विशेषज्ञ इस पर शोध कर सकें।
समिति कर रही गहन परीक्षण
प्रधानमंत्री संग्रहालय के अध्यक्ष और श्रीराम मंदिर ट्रस्टी नृपेंद्र मिश्र द्वारा गठित पांच सदस्यीय विशेषज्ञ समिति इस पांडुलिपि का गहन परीक्षण कर रही है। संरक्षण से पूर्व इसे चार प्रमुख मानकों पर परखा जा रहा है।
इसमें कृति की भाषाई संरचना की जांच के साथ ही उपयोग की गई स्याही के ऐतिहासिक समय का निर्धारण होगा। कागज के निर्माण काल की वैज्ञानिक जांच करके सुलेख के आधार पर कालखंड की पुष्टि होगी।
संग्रहालय के निदेशक डा. संजीव कुमार सिंह के अनुसार, अब तक करीब 70 लोगों ने संपर्क किया है। परीक्षण सफल होने पर इन दुर्लभतम कृतियों को भविष्य में श्रीराम मंदिर के द्वितीय तल पर भी संरक्षित किया जा सकता है। फिलहाल, जंगजीत सिंह ने इस धरोहर को घर में ही पूरी श्रद्धा के साथ सहेज कर रखा है।