आजमगढ़ में नौ साल से चल रहा था भर्ती के नाम पर ठगी का नेटवर्क, विमान से मंगवाता था नियुक्ति पत्र
आजमगढ़ में अर्धसैनिक बलों में नौकरी दिलाने के नाम पर 9 साल से करोड़ों की ठगी करने वाला गिरोह सक्रिय ...और पढ़ें
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नौ साल से चल रहा था भर्ती के नाम पर ठगी का नेटवर्क। AI जेनेरेटेड फोटो

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जागरण संवाददाता, आजमगढ़। अर्द्धसैनिक बलों में नौकरी दिलाने के नाम पर करोड़ों रुपये की ठगी करने वाले गिरोह की जांच में लगातार नए तथ्य निकल कर सामने आ रहे है। ठगी करने वाला गिरोह पिछले नौ साल, वर्ष 2017 से सक्रिय था।
पूर्वांचल के विभिन्न जिलों के सैकड़ों युवाओं को अपने जाल में फंसा चुका है। पुलिस इस मामले में तीन लोगों को गिरफ्तार कर चुकी है, हालांकि गिरोह का सरगना विद्यासागर और बलिया का मुन्ना शर्मा समेत पांच आरोपित अभी भी फरार हैं।
कई अभ्यर्थी अर्धसैनिक बल में प्रशिक्षण प्राप्त कर भर्ती होने के बाद तीन से चार साल कर बाकायदा नौकरी भी कर ली। सघन जांच में दस्तावेजों की गड़बड़ी मिलने के बाद उनकी सेवाएं समाप्त कर दी गईं है।
गिरोह युवाओं से पूर्वोत्तर के राज्यों का फर्जी डोमिसाइल और पहचान पत्र तैयार करने के लिए पहले 20 से 40 हजार रुपये लिए जाते थे। इसके बाद अभ्यर्थियों को परीक्षा दिलाने के लिए असम के सिलचर, करीमगंज, हाइलाकांडी जिला भेजा जाता था।
गिरोह के सदस्य परीक्षा से पहले अभ्यर्थियों को उस क्षेत्र की पूरी जानकारी रटवाते थे। उन्हें संबंधित जिले का पिन कोड, थाना, तहसील और स्थानीय जनप्रतिनिधियों के नाम तक याद कराए जाते थे, ताकि सत्यापन के दौरान किसी को संदेह न हो। अभ्यर्थियों से कहा जाता था कि पूछे जाने पर केवल वही जानकारी दें जो उन्हें सिखाई गई है।
परीक्षा में सफल होने के बाद गिरोह का सरगना विद्यासागर दस्तावेज सत्यापन और नियुक्ति प्रक्रिया पूरी कराने के नाम पर छह से आठ लाख रुपये तक वसूलता था। असम के एक व्यक्ति मधु जो वहां किसी सरकारी विभाग में बाबू है वह असम में बने फर्जी दस्तावेज सत्यापन का काम देखता था। वहीं अभ्यर्थियों के रहने और खाने की व्यवस्था भी करता था।
विमान से मंगवाता था नियुक्ति पत्र
पीड़ितों ने बताया कि गिरोह युवाओं का विश्वास जीतने के लिए नियुक्ति पत्र भी विशेष तरीके से उपलब्ध कराता था। चयन प्रक्रिया पूरी होने के बाद नियुक्ति पत्र को विमान के माध्यम से मंगवाता था। दमदम एयरपोर्ट से वाराणसी एयरपोर्ट पर एयर कार्गो अथवा हवाई डाक से आए लिफाफे दिखाकर नियुक्ति प्रक्रिया की वैधता का भरोसा दिलाते थे।
इससे अभ्यर्थियों और उनके स्वजन पर विश्वास हो जाता था कि भर्ती पूरी तरह वास्तविक है। इसी भरोसे में आकर कई युवाओं ने लाखों रुपये आरोपितों को सौंप दिए। बाद में दस्तावेजों के सत्यापन के दौरान फर्जीवाड़ा सामने आने पर पूरे नेटवर्क का राज खुला।
चार साल नौकरी करने के बाद हुई सेवा समाप्त
नाम न प्रकाशित करने की शर्त पर एक पीड़ित ने बताया कि वर्ष 2017 में उसका और उसके रिश्तेदारों का असम के हाइलाकांडी व सिलचर जिले से फर्जी डोमिसाइल बनवाया गया था। चयन होने के बाद उसने सीआइएसएफ में प्रशिक्षण प्राप्त किया और झारखंड, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश तथा बेंगलुरु में लगभग चार वर्ष तक सेवा भी की।
पीड़ित ने बताया कि उसने नौकरी के लिए 15 लाख रुपये से अधिक खर्च किए थे। इसके लिए परिवार ने बैंक से ऋण लिया और बहन के जेवर तक गिरवी रखने पड़े। बाद में दस्तावेजों की जांच में फर्जीवाड़ा सामने आने पर उसकी सेवा समाप्त कर दी गई।
उसने बताया कि नौकरी जाने के बाद पूरा परिवार आर्थिक और मानसिक संकट में आ गया। ऋण की किस्तें आज भी चुकानी पड़ रही हैं।पूरा परिवार अवसाद में है, रुपये वापस मांगने पर आरोपित धमकियां देते थे।
इसी तरह एक पीड़ित ने बताया कि उसने नौकरी लगवाने के लिए दस लाख रुपये दिए थे, 2021 में उसे नियुक्ति पेपर मिला था। 11 माह के प्रशिक्षण के बाद उसने मुंबई में एक साल तक नौकरी की, सत्यापन के बाद असम का निवास प्रमाण पत्र फर्जी पाए जाने के बाद निरस्त कर दिया गया।
कोट गिरोह के नेटवर्क, आर्थिक लेनदेन और फरार आरोपितों की तलाश के लिए जांच जारी है। पुलिस टीम आरोपितों के बैंक खाते की डिटेल सहित पीड़ितों की जानकारी एकत्र किया जा रहा है। जिससे पूरे गिरोह के नेटवर्क का राजफाश किया जा सके। -डॉ. अनिल कुमार, एसएसपी आजमगढ़।
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