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    बदायूं में 2027 विधानसभा चुनाव की बिसात बिछी: सपा-भाजपा में सियासी घमासान, जातीय समीकरण होते हैं निर्णायक

    Updated: Sat, 30 May 2026 01:24 PM (IST)

    बदायूं में 2027 विधानसभा चुनाव से पहले समाजवादी पार्टी और भाजपा के बीच सियासी सरगर्मी तेज हो गई है। सपा के गढ़ रहे इस जिले में भाजपा ने सेंध लगाई थी, ...और पढ़ें

    सांकेतिक तस्वीर।

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    अंकित गुप्ता, बदायूं। जिला बदायूं लंबे समय से समाजवादी पार्टी का मजबूत गढ़ रहा है। यादव और मुस्लिम वोट बैंक के प्रभाव वाले इस जिले में सपा की राजनीतिक पकड़ हमेशा मजबूत रही, लेकिन वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव और 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने यहां बड़ी सेंध लगाकर राजनीतिक समीकरण बदल दिए थे।

    हालांकि 2022 के विधानसभा चुनाव और 2024 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने फिर मजबूत वापसी कर जिले की राजनीति को नए मोड़ पर ला खड़ा किया। अब 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले जिले में राजनीतिक हलचल तेज होने लगी है।

    2017 में खिला था कमल, 2022 और 2024 में साइकिल ने छुड़ाया पसीना

    जिले में कुल छह विधानसभा सीटें हैं। जिसमें वर्तमान समय में बदायूं सदर, बिल्सी और दातागंज सीट भाजपा के पास हैं, जबकि शेखूपुर, बिसौली और सहसवान सीट पर समाजवादी पार्टी का कब्जा है। वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने जिले में बड़ी सफलता हासिल करते हुए सहसवान सीट छोड़ बाकी पांच सीटों पर जीत दर्ज की थी। उस चुनाव में भाजपा की लहर का असर बदायूं में भी साफ दिखाई दिया था।

    जिले की सभी छह सीटों पर बढ़ी हलचल

    सपा अपने पारंपरिक गढ़ में सीमित होकर रह गई थी। लेकिन भाजपा यहीं नहीं रुकी थी, इसके बाद 2019 के लोकसभा चुनाव में भी भाजपा ने अपनी बढ़त कायम रखी।

    भाजपा ने बदायूं और आंवला दोनों लोकसभा सीटों पर जीत हासिल कर जिले में अपनी राजनीतिक स्थिति और मजबूत कर ली थी। बदायूं सीट पर तो सैफई परिवार के सदस्य और पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव के भतीजे धर्मेंद्र यादव को भाजपा की संघमित्रा मौर्या ने हरा दिया था। तब यह माना जाने लगा था कि भाजपा ने सपा के गढ़ में स्थायी राजनीतिक जगह बना ली है।

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    टिकट से पहले नेताओं ने संभाला मोर्चा

    हालांकि 2022 के विधानसभा चुनाव में तस्वीर फिर बदली। समाजवादी पार्टी ने वापसी करते हुए सहसवान सीट बचाने के साथ शेखूपुर और बिसौली सीट भी भाजपा से छीन लीं। भाजपा तीन सीटों तक सिमट गई। इसके बाद 2024 के लोकसभा चुनाव में भी सपा ने जिले में अपनी ताकत दिखाते हुए दोनों संसदीय सीटों पर जीत दर्ज कर ली।

    बदायूं लोकसभा सीट पर सैफई परिवार के आदित्य यादव ने जीत हासिल की। वहीं आंवला लोकसभा सीट पर नीरज मौर्या जातीय समीकरण साधने में सफल रहे और भाजपा को मात दी।

    जातीय समीकरण हमेशा चुनावी नतीजों में निर्णायक भूमिका निभाते रहे हैं

    राजनीतिक जानकारों का मानना है कि बदायूं में जातीय समीकरण हमेशा चुनावी नतीजों में निर्णायक भूमिका निभाते रहे हैं। यादव, मुस्लिम, दलित, पिछड़ा और सवर्ण वोट बैंक को लेकर सभी दल अपनी रणनीति तैयार कर रहे हैं। भाजपा जहां 2017 और 2019 जैसी सफलता दोहराने की कोशिश में जुटी है, वहीं समाजवादी पार्टी अपने पारंपरिक गढ़ को और मजबूत करने में लगी है। जिले में अभी से टिकट दावेदार सक्रिय हो गए हैं।

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    सपा और भाजपा दोनों ही पार्टी 2027 में सभी छह सीटें जीतने का भर रहे हैं दंभ

    गांवों में जनसंपर्क अभियान, सामाजिक कार्यक्रमों में मौजूदगी और संगठनात्मक बैठकों का दौर शुरू हो चुका है। इंटरनेट मीडिया के जरिए भी राजनीतिक माहौल बनाया जा रहा है। फिलहाल चुनाव में समय है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में तेजी से बदले राजनीतिक समीकरणों ने बदायूं की सियासत को बेहद दिलचस्प बना दिया है। आने वाले विधानसभा चुनाव में जिले की छह सीटों पर मुकाबला बेहद कड़ा रहने के संकेत मिल रहे हैं।

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    दोनों ही पार्टियों में खेमेबंदी बन रही बड़ी चुनौती

    चुनाव से पहले टिकट की चाह ने पार्टी में खेमेबंदी करा दी है। भाजपा सत्ता में है ताे यह खुल कर नजर नहीं आ रही, लेकिन अंदरखाने जमकर गुटबाजी हावी है, जो गाहे बगाहे इंटरनेट मीडिया और सार्वजनिक कार्यक्रमों में नजर आ ही जाती है। वहीं सपा में तो धड़ेबाजी कई बार खुल कर सामने आ चुकी है। पूर्व में जिले में आए प्रदेश अध्यक्ष के सामने इसका उदाहरण पेश किया गया था। यही कारण है कि जिले की कार्यकारिणी भी भंग करनी पड़ी थी, जो अब तक नहीं बनाई जा सकी।

    वहीं शेखूपुर सीट पर सपा कब्जा हैं, जहां सपा के ही एक नेताजी ने रैलियां और सभाएं करनी शुरू कर दी है। वह पीडीए सभा के जरिए वहां अपने लिए आधार बना रहे हैं। जबकि इस सीट पर सपा जिलाध्यक्ष के बेटे हिंमाशू यादव वर्तमान में विधायक हैं।