बाराबंकी के जिस मैदान से निकले केडी सिंह ‘बाबू’ जैसे लाल, अब वहां खेल नहीं पा रहे नौनिहाल
Save GIC Barabanki Sports Ground: बाबू जिस मैदान पर बचपन में हाकी खेलते थे, अब वह उजड़ रहा है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने उनकी विरासत में हवेली को ...और पढ़ें

राजकीय इंटर कालेज बाराबंकी के मैदान में भरा बारिश का पानी जागरण
HighLights
बाराबंकी में पद्मश्री केडी सिंह ‘बाबू’ की विरासत को बचाने का अभियान
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से ‘बाबू’ की हवेली के बाद उनके मैदान को बचाने की गुहार
जीआईसी का खेल मैदान ही बाबू के पहचान की मूल विरासत, यहां सीखी ड्रिबिलिंग
नरेन्द्र मिश्र, बाराबंकी। विश्व के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी का सम्मान पाने वाले ओलंपिक में भारतीय हाकी टीम की कमान संभालने वाले पद्मश्री कुंवर दिग्विजय सिंह ‘बाबू’ (केडी सिंह बाबू) की विरासत बदहाल है। बाराबंकी के जिस राजकीय इंटर कॉलेज के मैदान से केडी सिंह ‘बाबू’ जैसे लाल निकले, अब वहां नौनिहाल खेल नहीं पा रहे हैं।
केडी सिंह बाबू ने बचपन के स्कूल राजकीय इंटर कॉलेज (जीआइसी) मैदान पर हाकी की ड्रिबिलिंग सीखी। विश्व भर में भारतीय हाकी का परचम फहराया और सितारे बने। बाबू जिस मैदान पर बचपन में हाकी खेलते थे, अब वह उजड़ रहा है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने उनकी विरासत में हवेली को बचाकर संग्रहालय बनवाने में देरी नहीं की। जीआइसी के पुरातन छात्रों समेत हाकी खिलाड़ियों ने अब उनसे ‘बाबू’ के मूल खेल मैदान की विरासत को बचाने की मुहिम शुरू कर दी है।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को पुरातन छात्र एसोसिएशन के साथ अधिवक्ता हरीश चंद्र अग्निहोत्री ने डीएम ईशान प्रताप सिंह के माध्यम से बाबू की विरासत बचाने की गुहार लगाई है। बाराबंकी में राजकीय इंटर कॉलेज की स्थापना 1883 में हुई थी। केडी सिंह को इस कॉलेज के खेल मैदान पर हाकी खेलना खूब भाता था।
कॉलेज से छीन लिया गया खेल मैदान
जब भारतीय हाकी टीम वर्ष 1975 में विश्व विजेता बन कर लौटी तो केडी सिंह बाबू ने अपने कॉलेज के मैदान पर सद्भावना मैच खेला था। अब इसी खेल मैदान को कॉलेज परिसर से अलग कर नुमाइश और राजनीतिक रैली स्थल में बदल दिया गया है। खेल की गतिविधियों व विद्यार्थियों के साथ खिलाड़ियों से यह मैदान छीन लिया गया।
यहां आडिटोरियम का निर्माण हो गया और पूरा मैदान ऊबड़-खाबड़ जमीन में तब्दील है। यहां न तो कॉलेज के बच्चे जाते और न ही खिलाड़ी। चहारदीवारी और गेट अव्यवस्थित होने से खेल का स्थान सार्वजनिक मैदान बन चुका है। बरसात में तो यह मैदान तालाब में बदल जाता है।
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हीरो और देश के सितारे का मैदान देख होता दर्द
बाबू की कोठी को बचाने में विधिक लड़ाई लड़ने वाले पूर्व बार अध्यक्ष हरीश चंद्र अग्निहोत्री कहते हैं कि कॉलेज का यह मैदान पद्मश्री बाबू की विरासत में नींव की ईंट के समान है। बाबू के साथ यहां खेल सीखने वाले लखनऊ विश्वविद्यालय की हाकी टीम के कैप्टन रहे 79 वर्षीय सलाउद्दीन किदवई और भारतीय हाकी टीम के पूर्व खिलाड़ी 72 वर्षीय मुजीब समी किदवई कहते हैं, वह सभी बाबू को अपना हीरो मानकर जीआइसी के मैदान से ही हाकी की शुरुआत की थी।
बाबू इसी मैदान में खेल के गुर सिखाते थे। वर्ष 1972-73 में यह मैदान इतना सुंदर था, कि यहां से घर जाने का मन नहीं करता था। अब उजड़ने का दर्द है। साहित्यकार अजय सिंह गुरु का कहना है कि यह खेल मैदान को बाबू की महत्वपूर्ण विरासत मानकर संजोने की उम्मीद सीएम योगी से है।
पिताजी को बहुत प्रिय था यह मैदान : वीवी सिंह
इस मैदान की विरासत पर जागरण ने केडी सिंह बाबू के पुत्र विश्व विजय सिंह से बात की। उन्होंने बताया कि पिताजी इसी कॉलेज में पढ़े और इसी मैदान से खेलना शुरू किया था। वह कभी यह मैदान नहीं छोड़ पाए। अब मैदान में अन्य सभी गतिविधियां बंद की जानी चाहिए। और विरासत के तौर पर संजोते हुए हाकी और खिलाड़ियों को सुसज्जित कर समर्पित किया जाना चाहिए।
खेल और खिलाड़ियों का कॉलेज के मैदान पर हक
उत्तर प्रदेश के खेल निदेशक डा. आरपी सिंह का कहना है कि जीआईसी का मैदान सिर्फ विद्यार्थियों, खेल और खिलाड़ियों के लिए होता। यह मैदान तो पद्मश्री केडी सिंह बाबू की विरासत का प्रमुख स्थल है। खेल के लिए संजोकर संवारना चाहिए।
बनाई जाएगी कार्ययोजना
जिलाधिकारी बाराबंकी ईशान प्रताप सिंह ने बताया कि जीआइसी ग्राउंड खेल मैदान है। यहां खेल की गतिविधियों को बढ़ाने और मैदान को खेल के अनुरूप विकसित और व्यवस्थित करने के लिए एक कार्ययोजना बनाकर शासन को भेजी जाएगी।