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    सावधान! जब विभाग को पता ही नहीं बीमारी कौन सी है, तो रोकथाम कैसे होगी? CBHI की रिपोर्ट में बड़ा खुलासा

    Updated: Sun, 01 Feb 2026 09:00 AM (IST)

    बरेली स्वास्थ्य विभाग डब्ल्यूएचओ के रोग वर्गीकरण पैटर्न का पालन नहीं कर रहा है, जिससे बीमारियों और मौतों का सटीक डेटा उपलब्ध नहीं है। केंद्रीय स्वास्थ ...और पढ़ें

    प्रतीकात्‍मक च‍ित्र

    प्रतीकात्‍मक च‍ित्र

    HighLights

    1. रोगों के वर्गीकरण और कोडिंग के डेटा को तैयार नहीं कर पा रहा स्वास्थ्य विभाग

    2. केंद्र की सीबीएचआइ की टीम ने आंकड़ों की गुणवत्ता को लेकर जताई चिंता

    अनूप गुप्ता, जागरण, बरेली। स्वास्थ्य विभाग न तो यह स्पष्ट कर पा रहा है कि किस मौसम में कौन-सी बीमारी जानलेवा रूप ले रही है और न ही यह कि इलाज के दौरान कहां चूक हो रही है। कारण साफ है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के तय पैटर्न पर रोगों और मौतों की निगरानी व्यवस्था अब तक पूरी तरह से जमीन पर उतर ही नहीं पाई है।

    स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के अधीन सेंट्रल ब्यूरो आफ हेल्थ इंटेलिजेंस (सीबीएचआइ) की टीम जब जिले में पहुंची और सरकारी अस्पतालों में रोगों व मौतों से जुड़े आंकड़ों की गुणवत्ता का आकलन किया, तो तस्वीर चिंताजनक निकली। टीम न तो डेटा की विश्वसनीयता से संतुष्ट दिखी और न ही उसके वैज्ञानिक विश्लेषण से।

    स्वास्थ्य विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि यह पता न हो कि किस समय मलेरिया, डेंगू, टीबी, हार्ट अटैक या सांस की बीमारी अधिक जान ले रही है, तो रोकथाम सिर्फ अनुमान के सहारे ही की जाती है। यही स्थिति जिले में बनी हुई है। कभी अचानक डेंगू के मामले बढ़ते हैं, कभी हार्ट अटैक से मौतों का आंकड़ा चौंकाता है।

    कभी नवजात और गर्भवती महिलाओं की मृत्यु दर सवाल खड़े कर देती है, लेकिन इन सबके पीछे का वैज्ञानिक ट्रेंड सामने नहीं आ पाता। डब्ल्यूएचओ द्वारा विकसित अंतरराष्ट्रीय सांख्यिकीय वर्गीकरण प्रणाली (आइसीडी) ऐसी ही गुत्थियों को सुलझाने के लिए बनाई गई है।

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    इसके तहत हर बीमारी, हर स्वास्थ्य समस्या और हर मौत के कारण की एक तय कोडिंग होती है। यह सिस्टम बताता है कि मौत की असली वजह क्या थी, सहायक कारण कौन-से थे और इलाज के दौरान क्या कमी रह गई। यही नहीं, इससे यह भी समझ आता है कि कौन-सी बीमारी किस क्षेत्र और किस वर्ग को ज्यादा प्रभावित कर रही है।

    सीबीएचआइ टीम को निरीक्षण के दौरान यह देखकर हैरानी हुई कि जिला चिकित्सालय समेत कई सरकारी अस्पतालों में आइसीडी आधारित रिकार्ड या तो अधूरा है या फिर बनाया ही नहीं जा रहा। कहीं डाक्टरों पर काम का अत्यधिक दबाव है, तो कहीं तकनीकी जानकारी का अभाव दिखाई दिया।

    स्वास्थ्य अधिकारियों का कहना है कि आने वाले समय में चिकित्सकों और सहयोगी स्टाफ को पूरी तरह प्रशिक्षित कर रोगों और मौतों से जुड़े आंकड़ों की वास्तविक और पारदर्शी तस्वीर सामने लाई जाएगी। इससे न सिर्फ बीमारियों पर समय रहते काबू पाया जा सकेगा, बल्कि जिंदगियों को बचाने की दिशा में ठोस कदम भी उठाए जा सकेंगे।

    सीबीएचआइ ने माना, आंकड़ों की अनदेखी हो सकती घातक

    टीम में शामिल उपनिदेशक दीक्षा सचदेवा ने आंकड़ों की स्थिति पर असंतोष जाहिर किया। अधिकारियों का मानना है कि ऐसे ही आंकड़ों की अनदेखी होती रही, तो भविष्य में यह बड़ी जनहानि का कारण बन सकती है।

    अधूरे आंकड़े नीतियां भी गलत दिशा में मोड़ देते हैं, जिससे संसाधन वहां खर्च होते हैं, जहां जरूरत कम होती है और जहां जरूरत ज्यादा होती है, वहां तैयारी ही नहीं होती। इसे देखते हुए स्वास्थ्य मंत्रालय ने अब नए सिरे से तैयारी शुरू कर दी है। चिकित्सकों और स्वास्थ्य कर्मियों को आइसीडी प्रणाली के तहत प्रशिक्षित करने की योजना बनाई जा रही है।

    फरवरी में पूरी तरह से लागू होनी आइसीडी

    आइसीडी के तहत चिकित्सकों को ही इसका रिकार्ड तैयार करना है। हालांकि, इसमें ईएमओ यानी इमरजेंसी मेडिकल आफिसर को महत्वपूर्ण कड़ी माना गया है। सीबीएचआइ की टीम ने आइसीडी को लेकर कई वरिष्ठ स्वास्थ्य अधिकारियों संग मंथन करने के साथ यह निचोड़ निकालने की कोशिश की गई थी कि आइसीडी को लेकर दिक्कत कहां से उत्पन्न हो रही है। हालांकि इसके लिए डाक्टरों को ट्रेनिंग पर ज्यादा फोकस किया गया।

     

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