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    बस्ती में पांच दिन तक मोर्चरी में पड़ा रहा शव, अंतिम दर्शन को नहीं आया बेटा

    Updated: Sat, 08 Aug 2026 09:45 AM (IST)

    बस्ती में एक मां का शव पांच दिनों तक मोर्चरी में पड़ा रहा, क्योंकि उसका बेटा अंतिम संस्कार के लिए नहीं आया। आखिरकार, एक गैर-रिश्तेदार ने इंसानियत का फ ...और पढ़ें

    HighLights

    1. मां का शव पांच दिन तक बस्ती मोर्चरी में पड़ा रहा।

    2. बेटे ने अंतिम संस्कार में आने से इनकार कर दिया।

    3. एक गैर-रिश्तेदार ने इंसानियत दिखाते हुए मुखाग्नि दी।

    संवाद सूत्र, पुरानी बस्ती। जिस बेटे को नौ महीने कोख में रखकर मां ने जिंदगी दी, उसी बेटे के इंतजार में मां की आंखें जिंदगी की आखिरी सांस तक दरवाजे पर टिकी रही। जुबान पर आखिरी वक्त तक बेटे का नाम था, दिल में बस एक उम्मीद थी कि बेटा आएगा, मां को अपने साथ ले जाएगा। लेकिन वक्त गुजरता गया और बेटा नहीं आया। बस्ती की इस मां ने जिंदगी में तो बेटे की राह देखी ही मौत के बाद भी पांच दिन तक मर्चरी में अपने वारिस का इंतजार करती रही।

    आखिरकार जब खून का रिश्ता नहीं पहुंचा, तो एक गैर ने बेटे का फर्ज निभाया मां के शव को कंधा दिया और मुखाग्नि देकर अंतिम विदाई दी। ये कहानी सिर्फ एक मां सीमा की मौत की नहीं ये सवाल है उस रिश्ते से, जिसके लिए मां ने पूरी जिंदगी कुर्बान कर दी।

    हर्रैया नगर पंचायत के आसरा आवास का एक छोटा सा कमरा जहां जिंदगी के आखिरी पड़ाव पर पहुंच चुकी एक बुजुर्ग महिला और एक वृद्ध पुरुष बेहद दयनीय हालत में मिले थे। करीब 25 दिन पहले पड़ोसियों की सूचना पर सेवा समर्पण भाव परिवार संस्था की टीम वहां पहुंची थी। दोनों बुजुर्ग करीब 20 दिनों से भूख और बीमारी से बेहाल थे। हालात देखकर संस्था के कार्यकर्ताओं ने पुलिस और स्वास्थ्य विभाग की मदद ली और दोनों को हर्रैया सीएचसी पहुंचाया।

    हालत गंभीर होने पर दोनों को जिला अस्पताल बस्ती रेफर कर दिया गया। बुजुर्ग महिला का शव करीब पांच दिनों तक मर्चरी में रखा रहा। 29 जुलाई को डाक्टर ने महिला को मृत घोषित कर दिया था। आखिरकार सेवा समर्पण भाव परिवार के प्रमुख दिलीप पाण्डेय आगे आए। उन्होंने बुजुर्ग महिला को अपना मानकर अंतिम संस्कार की जिम्मेदारी उठाई।

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    बस्ती के पौराणिक मूड़घाट पर वैदिक मंत्रोच्चार के बीच महिला को मुखाग्नि दी, जिस मां को आखिरी वक्त में अपने बेटे के कंधे का इंतजार था, उसे आखिरकार एक गैर ने कंधा दिया। अंतिम संस्कार के दौरान संस्था के सत्यम मिश्रा, राहुल गौतम, उमंग पाण्डेय समेत कई कार्यकर्ता मौजूद रहे।

    बस्ती की ये कहानी शायद एक सवाल छोड़ जाती है, रिश्ते आखिर खून से बड़े होते हैं या इंसानियत से। बताया जाता है कि सीमा दूसरी शादी थी। पहली शादी छावनी के बछईपुर गांव में हुई थी। एक बेटा पैदा हुआ। पति की मृत्यु के बाद उसने दूसरी शादी की। चार वर्ष पहले दुर्घटना में दूसरे पति दिलीप की मौत हो गई। उसके बाद यह बेसहरा हुईं तो कुछ लोगों ने हर्रैया के आसरा भवन में जगह दिलवा दी थी।