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    कारगिल विजय दिवस 2026: शहादत के ढाई दशक बाद भी उनकी यादें और वीरता आज भी स्मृतियों में हैं ताजी

    By Atul SinghEdited By: Vivek Shukla
    Updated: Sun, 26 Jul 2026 08:31 AM (IST)

    कारगिल युद्ध में बलिदान हुए बस्ती के मुन्नाराम यादव की यादें आज भी ताजा हैं। उनकी पत्नी निर्मला ने बच्चों को देशभक्ति के संस्कार दिए, जिससे बेटा अमित ...और पढ़ें

    बलिदानी मुन्नाराम यादव।

    बलिदानी मुन्नाराम यादव।

    HighLights

    1. मुन्नाराम यादव ने कारगिल युद्ध में सर्वोच्च बलिदान दिया।

    2. पत्नी निर्मला ने बच्चों में देशभक्ति के संस्कार भरे।

    3. बेटा अमित यादव भी सेना में शामिल होकर सेवा कर रहा।

    अतुल सिंह, हर्रैया, (बस्ती)। देश की सरहदों की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति देने वाले वीर सपूतों की दास्तानें हमेशा देशवासियों के दिलों में अमर रहती हैं। कारगिल युद्ध (1999) के दौरान अपने अदम्य साहस और शौर्य का परिचय देते हुए मातृभूमि के लिए बलिदान देने वाले बलिदानी मुन्ना राम यादव की यादें आज भी उनके स्वजन और क्षेत्रवासियों के दिलों में उतनी ही जीवंत हैं जितनी ढाई दशक पहले थीं।वर्ष 1999 में जब पाकिस्तान की कायराना हरकतों के कारण कारगिल युद्ध छिड़ा, तब भारतीय सेना के जांबाज सैनिकों ने बर्फीली चोटियों पर दुश्मनों के दांत खट्टे कर दिए थे।

    इसी रण संग्राम में जनपद के छावनी थाना क्षेत्र के मलौली गांव निवासी मुन्नाराम यादव ने मोर्चे पर डटकर मुकाबला करते हुए सर्वोच्च बलिदान दिया। उनकी वीरता और कर्तव्य परायणता ने साबित कर दिया कि एक सैनिक के लिए देशहित से बढ़कर कुछ नहीं होता।

    बलिदानी मुन्ना राम यादव के परिजन और स्थानीय लोग आज भी उनके उन दिनों को याद करते हैं जब वे छुट्टियों में घर आया करते थे। उनका मिलनसार स्वभाव, देशप्रेम से ओत-प्रोत बातें और समाज के प्रति उनका समर्पण आज भी लोगों के जेहन में सुरक्षित है। समय बीतने के साथ उनकी शहादत के वर्ष भले ही आगे बढ़ गए हों, लेकिन उनकी यादों की ताजगी में कोई कमी नहीं आई है।

    देश के लिए अपने प्राण न्योछावर करने वाले अमर शहीदों का बलिदान कभी भुलाया नहीं जा सकता। ऐसे वीर योद्धा हमारी आने वाली पीढ़ियों को हमेशा राष्ट्रसेवा के लिए प्रेरित करते रहेंगे। निर्मला यादव कहती हैं कि पति मुन्नाराम यादव का वर्ष 1985 में सेना में चयन हुआ था। वह लांस नायक के पद पर तैनात थे। कारगिल युद्ध के दौरान उनकी सीमा पर पेट्रोलिंग के लिए ड्यूटी लगी थी।

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    11 अगस्त वर्ष 2000 को अचानक बारूदी सुरंग फटने से अपने तीन अन्य फौजी साथियों के साथ मुन्नाराम बलिदान हो गए। उस समय उनकी तीन मासूम संताने थी। पत्नी निर्मला ने अपने लाल में ही पति का अक्स निहारा और जुट गई उनके परवरिश में। वह पति को खोने का गम दूर कर बचपन से ही अपने संतान में राष्ट्रभक्ति का संस्कार भरने लगीं। बड़ा बेटा अमित यादव पढ़ लिख कर जवान हुआ, तो पिता का देश प्रेम का जलाया हुआ मशाल बेटे अमित के हाथ में थमा दिया। वर्ष 2009 में ही बेटा अमित सेना में भर्ती हो गया। वह अपने कुनबे में देश सेवा की परंपरा की दूसरी पीढ़ी बन गए।

    निर्मला अब पति के अधूरे कार्य को पूरे होते देख संतुष्ट दिख रही है। वह घर गृहस्थी संभालने के साथ अन्य दो संतान बेटी कोमल यादव को पढ़ा लिखा कर शादी कर दी और छोटे बेटे सुमित कुमार यादव की पढ़ाई कर रही हैं। पचवस गांव निवासी निर्मला के पिता सूर्यनाथ यादव व भाई कृष्ण भूषण यादव भी सेना में थे, पिता दिवंगत और भाई सेवा सेवानिवृत्त हो चुके हैं।

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    युवा पीढ़ी के लिए प्रेरणा स्रोत
    बलिदानी मुन्ना राम यादव का जीवन और उनका बलिदान आने वाली पीढ़ियों के लिए हमेशा प्रेरणा का स्त्रोत रहेगा। ऐसे वीर सपूतों की बदौलत ही आज पूरा देश सुरक्षित चैन की सांस ले रहा है। क्षेत्र के लोग हर वर्ष उनकी शहादत को नमन करते हैं और उनके दिखाए देशभक्ति के मार्ग पर चलने का संकल्प लेते हैं।

    बलिदान मुन्ना की पत्नी निर्मला को भरोसा दिलाया गया था कि बलिदानी की स्मृति में उनके नाम से जूनियर हाईस्कूल, गांव के मुख्य रास्ते पर गेट तो बना है, लेकिन अभी तक पार्क नहीं बन पाया। परिवार के जीवन यापन के लिए पेट्रोल पंप या गैस एजेंसी देने का वादा हुआ था। सरकार की तरफ से यह भी पूरा नहीं हो पाया।