‘भगवान को अकेला छोड़कर नहीं जाऊंगा’...चित्रकूट में सैलाब के बीच दिखा भक्ति का अटूट प्रेम, महांत को मनाने पहुंचे DM-SP
चित्रकूट में मंदाकिनी नदी के रौद्र रूप और बढ़ते पानी के बीच, रामघाट के बड़ा मठ के महांत वरुण प्रपन्नाचार्य ...और पढ़ें
HighLights
मंदाकिनी नदी में बाढ़ के कारण चित्रकूट में जलस्तर बढ़ा
महांत वरुण प्रपन्नाचार्य ने मंदिर छोड़ने से साफ इनकार किया
डीएम-एसपी ने सुरक्षित स्थान पर जाने का आग्रह किया, पर महांत नहीं माने
जागरण संवाददाता, चित्रकूट। मंदाकिनी के रौद्र रूप और चारों ओर बढ़ते पानी के सैलाब के बीच तपोभूमि में आस्था की ऐसी तस्वीर सामने आई, जिसने हर किसी का ध्यान खींच लिया। जहां लोग जान बचाने को जिंदगी भर की पूंजी घर को छोड़कर सुरक्षित स्थान पर जा रहे, वहां एक महांत भगवान को अकेले छोड़ने को तैयार नहीं। संकट की घड़ी में भगवान के प्रति उनकी अटूट आस्था का यह दृश्य लोगों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है।

रामघाट स्थित बड़ा मठ में बाढ़ का पानी पहुंचने के बावजूद वहां के महांत वरुण प्रपन्नाचार्य मंदिर छोड़कर सुरक्षित स्थान पर जाने को तैयार नहीं हुए। उन्हें बाहर निकालने पहुंचे जिलाधिकारी पुलकित गर्ग और पुलिस अधीक्षक अरुण कुमार सिंह ने काफी देर तक सुरक्षित स्थान पर चलने का आग्रह किया, लेकिन महांत का जवाब साफ था भगवान को बाढ़ के बीच अकेला छोड़कर वह कहीं नहीं जाएंगे।
बाढ़ की गंभीर स्थिति को देखते हुए प्रशासन लगातार नदी किनारे रहने वाले लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचा रहा है। अधिकारियों ने महांत को स्थिति की गंभीरता समझाते हुए मठ छोड़कर सुरक्षित स्थान पर चलने का आग्रह किया। अधिकारियों ने उन्हें भरोसा दिलाया कि मंदिर की सुरक्षा के लिए प्रशासन की निगरानी रहेगी, लेकिन पुजारी अपनी बात पर अड़े रहे। महांत ने कहा कि संकट की इस घड़ी में वह भगवान को अकेला छोड़कर नहीं जा सकते।

पूर्वजों और भगवान का नाम लेते हुए बिताए आठ घंटे
मंदाकिनी में आई बाढ़ से गोबरिया गांव में पेड़ और छत पर फंसे परिवारों ने दर्द बयां किया। बाढ़ के दौरान शनिवार को सात से आठ घंटे आठ साल के बराबर लगे। पीड़ितों के मुताबिक चारों ओर पेड़ और पानी के रूप में पास आती तबाही दिखाई दे रही थी। पूर्वजों और भगवान का नाम लेते हुए किसी प्रकार आठ घंटे बिताए। सुबह लगभग साढ़े आठ से बाढ़ में फंसे थे और शाम लगभग साढ़े चार बजे स्टीमर आते देख लगा अब जान बच जाएगी।
पीड़ितों की जुबानी
पवन कुमार कुशवाहा पुत्र प्रेम लाल ने बताया कि सुबह बारिश चालू थी लेकिन घर तक पानी आने उम्मीद नहीं थी। बताया कि साढे़ सात बजे घर के पास पानी आ गया। सामान को सुरक्षित करने की सोचा लेकिन पानी बढ़ता ही जा रहा था। थोड़ी देर में सामान डूबने की स्थिति बन गई। ध्यान नदी की ओर था लेकिन दूसरी ओर से पानी का शैलाब आ गया। कुछ सामान के साथ पास में लगे नीम के पेड़ में चढ़ गए। थोड़ी देर में पानी और बढ़ा तब अपनी जान पर बन आई। पवन के साथ मां चंदी, बहन कुसुम, भाई सत्यनारायण चार लोग फंसे थे। मम्मी पूर्वजों को याद करने और भगवान का जाप करने के लिए बोल रही थी।
चंदी कुशवाहा ने बताया कि चारों ओर पानी ही पानी देख वह घबरा रही थी लेकिन बेटों और बेटी का साहस बढ़ाती रही। पूर्वजों और भगवान का नाम लेते हुए समय गुजारा।
नन्हू कुशवाहा ने बताया कि उन्होंने सभी जानवर और परिवार को सुरक्षित बाहर निकाल दिया और वह रुके रहे। उन्हें उम्मीद नहीं थी बाढ़ इतनी बिकराल होगी। पानी बढ़ने पर वह छत में पहुंच गए। पानी और बढ़ा तो वह छत से बेरी के पेड़ में चढ़ गए। मरता क्या न करता, पूरे शरीर में कांटे लग रहे थे फिर भी जान बचानी थी। लगभग चार पांच बजे के बीच स्टीमर आया तब जान में जान आई और सुरक्षित स्थान पर पहुंच गए।
इसी प्रकार राजाभइया, पत्नी ऊषा देवी, बेटी रोशनी, खुशी, शिवानी पास के छत में फंसे थे। जबकि पास में रानी देवी पत्नी मेड़ेलाल व उनके साथ श्री राम, बाबू, धनपतिया पत्नी दिनेश, बाबू पुत्र नत्थू पहले छत में चढ़े और पानी बढ़ने पर वह घर के बगल में पीपल के पेड़ में पहुंच गए। इन सभी को स्टीमर से रेस्क्यू किया गया।
