'दादी मां का बटुआ' से सुधर रही सेहत, भारतरत्न नानाजी देशमुख की पहल से 200 गांवों में मात्र 2 रुपये में हो रहा इलाज
नानाजी देशमुख द्वारा स्थापित दीन दयाल शोध संस्थान का 'दादी मां का बटुआ' अभियान उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के 200 गांवों में आयुर्वेद के माध्यम से स्व ...और पढ़ें

HighLights
'दादी मां का बटुआ' अभियान 200 गांवों में स्वास्थ्य सेवा दे रहा।
मात्र 2 रुपये में आयुर्वेदिक उपचार, पारंपरिक ज्ञान का पुनरुद्धार।
नानाजी देशमुख की पहल से ग्रामीण स्वास्थ्य और रोजगार को बढ़ावा।
हेमराज कश्यप, चित्रकूट। एक समय ऐसा था, जब बीमारियों का उपचार आयुर्वेद व घरेलू नुस्खों से ही किया जाता था। ज्यादातर स्वास्थ्य समस्याओं का समाधान घर की दादी-नानी के पारंपरिक ज्ञान से हो जाता था। आधुनिक चिकित्सा के प्रसार के साथ यह परंपरा कमजोर पड़ी है, जबकि आयुर्वेदिक औषधियां आज भी अनेक रोगों के उपचार में प्रभावी और भरोसेमंद साबित हो रही हैं।
केंद्र सरकार के आयुष मंत्रालय से राष्ट्रीय अयुर्वेद गुरु की उपाधि से सम्मानित आचार्य डा. मदन गोपाल वाजपेयी की यह बात भारत रत्न राष्ट्रऋषि नानाजी देशमुख द्वारा स्थापित दीन दयाल शोध संस्थान (डीआरआइ) की पहल पर आरोग्यधाम की ओर से संचालित किए जा रहे ‘दादी मां का बटुआ’ अभियान पर सटीक बैठती है। इस अभियान के तहत करीब 200 गांवों के लोगों को उपचार किया जा रहा है।
आयुर्वेद से जुड़ाव, स्वास्थ्य स्वावलंबन व आर्थिक सशक्तीकरण के प्रतीक इस माडल से नानाजी के समग्र ग्रामीण विकास के सपने को संबल मिल रहा है। उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के सीमावर्ती ग्रामीण क्षेत्रों में लोकज्ञान को पुनर्जीवित करने में भी मदद मिल रही है।
चित्रकूट से दादी मां का बटुआ अभियान की शुरुआत
आरोग्यधाम के महाप्रबंधक डा. अनिल जायसवाल बताते हैं कि पुणे के वैद्य खड़ीवाले की परंपरा को पुनर्जीवित करते हुए नानाजी देशमुख ने इसे संगठित रूप दिया था। वर्ष 1996 में 12 औषधियों वाली किट के साथ चित्रकूट से दादी मां का बटुआ अभियान की शुरुआत हुई। धीरे-धीरे लोगों को इसका लाभ हुआ तो सफलता के आधार पर क्षेत्रीय रोगों के अनुरूप औषधियों में परिवर्तन कर और संख्या भी बढ़ाई गई।
अब एक छोटे बटुए में 33 प्रकार की आयुर्वेदिक औषधियां रखी जाती हैं, जिन्हें चित्रकूट स्थित आरोग्यधाम की रसशाला में स्थानीय जड़ी-बूटियों से तैयार किया जाता है। प्रारंभ में ग्रामीणों में झिझक थी, लेकिन रोगियों के स्वस्थ होने पर कार्यकर्ता उत्साहपूर्वक घर-घर उपचार करने लगे। अब यह योजना उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के करीब 200 गांवों तक पहुंच चुकी है।
गांव के समझदार व सेवाभावी प्रौढ़ों को इससे जोड़कर सिरदर्द, बुखार, सर्दी-जुकाम, पेट दर्द, उल्टी-दस्त जैसे सामान्य रोगों के प्राथमिक उपचार का प्रशिक्षण दिया जाता है। गंभीर रोगियों को आगे के उपचार के लिए आरोग्यधाम लाया जाता है। जायसवाल कहते हैं कि दादी मां का बटुआ पूरी तरह सेवा भाव पर आधारित योजना है।
कई बुजुर्गों के पास जड़ी-बूटियों का ज्ञान है, जिसे संरक्षित करने के लिए अब वैद्य सम्मेलन आयोजित किए जाते हैं। अब तक 550 युवाओं को आयुर्वेद का प्रशिक्षण दिया गया है, जिससे यह योजना स्वास्थ्य के साथ रोजगार भी प्रदान करने में सहायक है।
500 गांवों को आत्मनिर्भर बनाना था नानाजी का लक्ष्य
नानाजी ने वर्ष 1972 में दीन दयाल शोध संस्थान की स्थापना की थी। इसका उद्देश्य पंडित दीनदयाल उपाध्याय के ‘एकीकृत मानवतावाद’ के सिद्धांतों को जमीन स्तर पर लागू करना था। नानाजी ने 1978 में राजनीति से संन्यास लेकर ग्रामीण विकास को अपने जीवन का लक्ष्य बनाया। शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, आय सृजन व सामाजिक जागरूकता के क्षेत्र में कार्य करते हुए उन्होंने 80 गांवों से चित्रकूट की इस परियोजना की शुरुआत की थी। इसका उद्देश्य 500 गांवों को आत्मनिर्भर बनाना था।
दो रुपये की दवा, 1.56 लाख को मिल चुका उपचार
दादी मां का बटुआ अभियान में अब तक 1,56,163 मरीजों को उपचार मिल चुका है। मरीजों से एक दिन की दवा के लिए मात्र दो रुपये का शुल्क लिया जाता है। दवाओं पर आने वाला शेष खर्च दीनदयाल शोध संस्थान का प्रकल्प आरोग्यधाम वहन करता है। वर्तमान में इस अभियान के तहत 160 उपचार केंद्र संचालित हैं, जो अलग-अलग ग्राम पंचायत स्तर पर कार्य कर रहे हैं। रोस्टर के अनुसार संस्थान के छह वैद्यों की टीम इनमें पहुंचकर मरीजों का परीक्षण व उपचार करती है।
सामान्य बीमारियों से पीड़ित मरीज शत-प्रतिशत स्वस्थ हो जाते हैं, जबकि असाध्य रोगों से ग्रसित लगभग 70 प्रतिशत मरीजों के स्वास्थ्य में भी उल्लेखनीय सुधार का दावा है। यदि किसी मरीज की बीमारी लंबे समय तक ठीक नहीं होती या विशेष उपचार की आवश्यकता होती है तो उसे आगे के उपचार के लिए आरोग्यधाम लाया जाता है।
वर्तमान समय में पाश्चात्य संस्कृति की होड़ के बीच पंडित दीनदयाल उपाध्याय के सपनों के अनुरूप ‘दादी मां के बटुआ’ जैसी प्राचीन परंपराओं को अपनाने की आवश्यकता है। इससे स्वास्थ्य के साथ ही रोजगार भी मिल रहा है। -अभय महाजन, संगठन सचिव डीआरआइ