जो रंग-बिरंगी कतरनें कूड़े में जाती थी, देवरिया में अब बन रही आत्मनिर्भरता का आधार
देवरिया में अमृता तिवारी की 'ख्वाहिश क्रिएशन' कपड़ों की कतरनों का पुनर्चक्रण कर आकर्षक उत्पाद बना रही है। यह पहल न केवल पर्यावरण संरक्षण कर रही है, बल ...और पढ़ें

कपड़ों के कतरन से उपयोग की सामग्री तैयार करती महिला उद्यमी। जागरण
HighLights
'ख्वाहिश क्रिएशन' कपड़ों की कतरनों से बनाती है आकर्षक उत्पाद।
यह पहल 25 लोगों को रोजगार देती है, 15 महिलाएं शामिल।
हर महीने 400-500 किलो कपड़ा कचरा होता है पुनर्चक्रित।
सुधांशु त्रिपाठी, देवरिया। सुबह के समय शहर की किसी टेलरिंग गली से गुजरिए। दुकानों के बाहर रंग-बिरंगी कपड़ों की कतरनें बिखरी मिल जाएंगी। शाम होते-होते यही कतरनें कूड़े के साथ उठ जाती हैं। मगर देवरिया में इन्हीं कतरनों ने कुछ महिलाओं के हाथों में रोजगार, प्रकृति और पर्यावरण संरक्षण की नई कहानी लिख दी है।
शहर की अमृता तिवारी ने वर्ष 2022 में ''ख्वाहिश क्रिएशन'' की शुरुआत करते हुए कपड़ों की इन बेकार समझी जाने वाली कतरनों को नया जीवन देने का काम शुरू किया। धीरे-धीरे उत्पादों की मांग बढ़ी तो उन्होंने जागृति एंटरप्राइज सेंटर–पूर्वांचल के इनक्यूबेशन प्रोग्राम से जुड़कर अपने उद्यम को व्यवस्थित रूप दिया। इनक्यूबेशन के दौरान मिले मार्गदर्शन, उत्पाद विकास और बाजार से जुड़ाव ने ''ख्वाहिश क्रिएशन'' को विस्तार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
आज अमृता की टीम स्थानीय टेलरिंग दुकानों, बुटीक, कपड़ा प्रतिष्ठानों, फैशन डिजाइन संस्थानों और घरों से कपड़ों की कतरनें एकत्र करती है। इन्हें रंग, बनावट और गुणवत्ता के आधार पर अलग किया जाता है। इसके बाद इन्हीं टुकड़ों से महिलाओं के सूट, कुर्ती, बच्चों के कपड़े, को-आर्ड सेट, बैग, कुशन कवर और घर की सजावट के आकर्षक उत्पाद तैयार किए जाते हैं।
अमृता की टीम के उत्पाद उत्तर देश के विभिन्न शहरों के अलावा इंस्टाग्राम, व्हाट्सएप, रिटेल स्टोर और विभिन्न प्रदर्शनियों के माध्यम से ग्राहकों तक पहुंच रहे हैं। अब तक का सबसे बड़ा आर्डर पांच हजार उत्पादों का रहा, जिसमें करीब 300 किलोग्राम कपड़ों की कतरनों का उपयोग किया गया।
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हर महीने आधा टन कतरन बन रहे उपयोगी
आज यह उद्यम हर महीने लगभग 400 से 500 किलोग्राम टेक्सटाइल वेस्ट का पुन: उपयोग कर रहा है। वर्ष 2022 से अब तक करीब 30 टन कपड़ा कचरे को उत्पादों में बदला जा चुका है। एक समय जो कतरनें कूड़े का हिस्सा बन जाती थीं, वही अब लोगों के घरों और अलमारियों तक आकर्षक उत्पाद बनकर पहुंच रही हैं। यह सर्कुलर इकोनोमी का स्थानीय उदाहरण भी है, जहां एक उद्योग का अपशिष्ट दूसरे उद्यम के लिए कच्चा माल बन गया है।
ग्राहक पहचान ही नहीं पाते कि ये कतरन है
अमृता बताती हैं कि सबसे दिलचस्प प्रतिक्रिया बच्चों के कपड़ों को लेकर मिलती है। अलग-अलग रंगों की कतरनों से तैयार पैचवर्क डिजाइन इतने आकर्षक होते हैं कि ग्राहक यह विश्वास ही नहीं कर पाते कि ये उत्पाद कपड़ों की बची हुई कतरनों से बने हैं। कई लोग इन्हें विशेष डिजाइनर फैब्रिक से तैयार उत्पाद समझ लेते हैं।
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25 लोगों के जीवन में आया बदलाव
इस पहल ने केवल कपड़ा कचरे का पुन: उपयोग ही नहीं किया, बल्कि कई परिवारों की आय का भी जरिया बनी। वर्तमान में 15 महिलाओं सहित करीब 25 लोगों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार मिल रहा है। वित्तीय वर्ष 2025-26 में अमृता तिवारी का कारोबार लगभग 35 लाख रुपये तक पहुंच गया।
अमृता अब टेक्सटाइल वेस्ट के अगले उपयोग पर भी काम कर रही हैं। उनकी टीम कपड़ा कचरे से टिकाऊ निर्माण सामग्री विकसित करने की संभावनाओं पर शोध कर रही है। यदि यह प्रयास सफल होता है तो भविष्य में कपड़ा कचरे के निस्तारण का एक और प्रभावी विकल्प सामने आ सकता है।
वस्त्र मंत्रालय की 2026 की रिपोर्ट के अनुसार भारत में हर वर्ष 70.73 लाख टन टेक्सटाइल वेस्ट उत्पन्न होता है। यदि इस कचरे को संसाधन के रूप में देखा जाए तो इससे पर्यावरण संरक्षण के साथ स्थानीय स्तर पर रोजगार और नए उद्यम खड़े किए जा सकते हैं। जागृति पूर्वांचल के विभिन्न जिलों में ऐसी पहलों को समर्थन देकर आगे बढ़ाने में जुटी है।
- आशुतोष कुमार, सीईओ, जागृति।
शहर से प्रतिदिन करीब 75 टन कचरा निकलता है। इसमें लगभग 30 टन सूखा और 45 टन गीला कचरा शामिल है। कचरे को एमआरएफ (मैटेरियल रिकवरी फैसिलिटी) सेंटर पर एकत्रित कर उसका पृथक्करण किया जाता है। गीले कचरे से जैविक खाद तैयार की जाती है, जबकि सूखे कचरे को अलग कर उपयोगी सामग्री तैयार कराया जाता है।
-संजय तिवारी, अधिशासी अधिकारी।