सैफई आयुर्विज्ञान विश्वविद्यालय में दुष्कर्म कांड: हाईकोर्ट के आदेश पर पीड़िता का गर्भपात, सफाई कर्मी ने की थी घिनौनी वारदात
उत्तर प्रदेश आयुर्विज्ञान विश्वविद्यालय, सैफई में मानसिक मंदित दुष्कर्म पीड़िता का उच्च न्यायालय के आदेश पर चिकित्सकीय गर्भपात कराया गया। विश्वविद्याल ...और पढ़ें

संवाद सहयोगी, सैफई (इटावा)। उत्तर प्रदेश आयुर्विज्ञान विश्वविद्यालय के मानसिक रोग विभाग में भर्ती मानसिक मंदित महिला से जुड़े दुष्कर्म प्रकरण में शनिवार को अहम घटनाक्रम सामने आया। उच्च न्यायालय के आदेश के अनुपालन में पीड़िता का चिकित्सकीय गर्भपात विशेषज्ञ चिकित्सकों की निगरानी में करा दिया गया। विश्वविद्यालय प्रशासन के अनुसार पूरी प्रक्रिया सुरक्षित ढंग से संपन्न हुई और पीड़िता की स्थिति फिलहाल सामान्य बनी हुई है।
विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से दी गई जानकारी के मुताबिक, पीड़िता के स्वास्थ्य और हित को सर्वोपरि रखते हुए पूर्व में उच्च न्यायालय में विस्तृत रिपोर्ट और चिकित्सकीय आधार प्रस्तुत किया गया था। इस पर न्यायालय ने गंभीरता से विचार करते हुए चिकित्सकीय निगरानी में गर्भपात कराने के निर्देश दिए, जिसके अनुपालन में 10 अप्रैल को विशेषज्ञ चिकित्सकों की टीम ने पूरी प्रक्रिया को अंजाम दिया।
प्रशासन के अनुसार गर्भपात की प्रक्रिया मेडिकल टर्मिनेशन आफ प्रेग्नेंसी एक्ट 1971 (संशोधित 2021) के तहत पूरी की गई। पूरी प्रक्रिया के दौरान पीड़िता के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर विशेष नजर रखी गई और अब भी चिकित्सकों की टीम उसकी लगातार निगरानी कर रही है।
इस पूरे मामले में कानूनी प्रक्रिया भी कम महत्वपूर्ण नहीं रही। पीड़िता के गर्भपात की अनुमति को लेकर सबसे पहले पुलिस द्वारा सिविल जज सीनियर डिवीजन न्यायालय इटावा में प्रार्थना पत्र प्रस्तुत किया गया था, लेकिन वहां से प्रकरण को उच्च न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किए जाने की आवश्यकता जताई गई। इसके बाद विवेचना कर रहे प्रभारी निरीक्षक भूपेंद्र राठी और विश्वविद्यालय प्रशासन ने संयुक्त रूप से इलाहाबाद उच्च न्यायालय का रुख किया, जहां मेडिकल रिपोर्ट और परिस्थितियों को देखते हुए अनुमति प्रदान की गई।
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पुलिस द्वारा न्यायालय में दाखिल प्रार्थना पत्र में पीड़िता की मानसिक स्थिति, चिकित्सकीय परीक्षण और मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट को आधार बनाया गया था। मेडिकल जांच में पीड़िता करीब 16 सप्ताह 5 दिन की गर्भवती पाई गई थी। विशेषज्ञों ने स्पष्ट किया था कि नियमानुसार 20 सप्ताह तक गर्भपात संभव है, लेकिन इस तरह के संवेदनशील मामलों में न्यायालय की अनुमति आवश्यक होती है। साथ ही यह भी उल्लेख किया गया कि पीड़िता की मानसिक स्थिति ऐसी नहीं है कि वह स्वयं बच्चे की देखभाल कर सके।
इस प्रकरण में विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा गठित तीन समितियों की रिपोर्ट भी निर्णायक आधार बनी। डीन प्रोफेसर डा. आदेश कुमार की अध्यक्षता में गठित 9 सदस्यीय जांच समिति ने विभागाध्यक्ष प्रोफेसर डा. अरुण कुमार मिश्रा सहित वार्ड में तैनात 14 स्टाफ और सफाई कार्य से जुड़ी कंपनी की लापरवाही को चिन्हित किया। इसके बाद कार्यपरिषद की बैठक में रिपोर्ट प्रस्तुत कर विभागीय कार्रवाई शुरू कर दी गई। वहीं मुख्य चिकित्सा अधीक्षक प्रोफेसर डा. एसपी सिंह की निगरानी में गठित मेडिकल बोर्ड, जिसकी अध्यक्षता गायनी विभागाध्यक्ष प्रोफेसर डा. कल्पना सिंह ने की, ने अपनी रिपोर्ट में गर्भावस्था की पुष्टि करते हुए न्यायालय की अनुमति जरूरी बताई थी।
गौरतलब है कि मानसिक रोग विभाग में 14 जून 2025 को करीब 38 वर्षीय अज्ञात महिला को भर्ती कराया गया था। 17 मार्च 2026 को रूटीन जांच के दौरान उसके गर्भवती होने की पुष्टि हुई, जिसके बाद पूरे मामले का खुलासा हुआ। इसके बाद विभागाध्यक्ष प्रोफेसर डा. अरुण कुमार मिश्रा की तहरीर पर थाना सैफई में मुकदमा दर्ज कराया गया, जिसमें सफाई कर्मी रविंद्र कुमार बाल्मीकि निवासी लखना, थाना बकेवर को नामजद आरोपित बनाया गया। पुलिस ने आरोपित को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। साथ ही पीड़िता और आरोपित के डीएनए नमूने जांच के लिए भेजे गए और विशेषज्ञों की मौजूदगी में न्यायालय में पीड़िता के बयान भी दर्ज कराए गए।
विश्वविद्यालय के कुलसचिव दीपक वर्मा ने बताया कि पीड़िता के स्वास्थ्य से संबंधित सभी आवश्यक चिकित्सकीय प्रक्रियाएं पूरी कर ली गई हैं और न्यायालय के निर्देशों का पूर्ण पालन किया गया है। विश्वविद्यालय प्रशासन पूरे मामले में जांच और विधिक प्रक्रिया में लगातार सहयोग कर रहा है।
प्रभारी निरीक्षक भूपेंद्र राठी ने बताया कि सभी साक्ष्यों और मेडिकल रिपोर्ट के आधार पर विधिक प्रक्रिया अपनाते हुए उच्च न्यायालय से अनुमति प्राप्त की गई, जिसके बाद गर्भपात की कार्रवाई कराई गई। आगे भी मामले की विवेचना नियमानुसार जारी रहेगी।