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    Success Story: मां ने सरकारी नौकरी छोड़ बेटों की परवरिश की, बेटे ने NEET पास कर त्याग को बनाया कामयाबी की मिसाल

    Updated: Sat, 18 Jul 2026 05:48 PM (IST)

    फतेहपुर के शास्वत पटेल ने नीट यूजी परीक्षा में 596 अंक और 11419 रैंक हासिल कर सफलता पाई है। अब उनका लक्ष्य न्यूरोलॉजी में विशेषज्ञ बनकर दिमाग का डॉक्ट ...और पढ़ें

    घर की छत पर टैब पर आनलाइन क्लास के तैयारी करता नीट यूजी में सफलता हासिल करने वाले शास्वत पटेल। स्रोत स्वयं

    घर की छत पर टैब पर आनलाइन क्लास के तैयारी करता नीट यूजी में सफलता हासिल करने वाले शास्वत पटेल। स्रोत स्वयं 

    HighLights

    1. शास्वत पटेल ने नीट यूजी में 596 अंक हासिल किए।

    2. उनका अगला लक्ष्य न्यूरोलॉजी में विशेषज्ञता प्राप्त करना है।

    3. ऑनलाइन क्लास और परिवार के सहयोग से मिली सफलता।

    जागरण संवाददाता, फतेहपुर। कहते हैं जीवन में लक्ष्य बनाकर कोई भी काम किया जाए तो सफलता खुद ही कदम चूमती है। अपनी लगन और मेहनत के दम पर शिक्षक पुत्र ने घर बैठे पढ़ाई कर नीट यूजी जैसी प्रतिष्ठित परीक्षा पास कर ली। इस युवा प्रतिभा ने 596 अंकों के साथ आल इंडिया 11419 कैटगरी रैंक हासिल की है। अब एमबीबीएस में चयनित होने के साथ अब युवा मेधावी ने न्यूरोलाजी के क्षेत्र में जाकर दिमाग का स्पेशलिस्ट बनने की ठान ली है।

    तेलियानी विकास खंड क्षेत्र में पनई इनायतपुर जूनियर हाईस्कूल के शिक्षक व मूल रूप से झाऊ मेदनीपुर गांव के रहने वाले हैं। इनके बड़े पुत्र शास्वत पटेल ने नीट यूजी में सफलता हासिल की है। शास्वत की माने तो उनके मन में डाक्टर बनने का सपना हाईस्कूल से पल रहा था। वह वर्ष 2022 में अपनी दादी मुन्नी देवी के बीमार होने पर पिता के साथ कानपुर के एक हास्पिटल में गये थे। वहां उनके चचेरे मामा डा. रंजीत पटेल डाक्टर हैं। वहीं से उनके मन में डाक्टर बनने का सपना पलने लगा।

    हाईस्कूल की परीक्षा 94 प्रतिशत अंकों साथ और 2024 में हंशग्रीन पब्लिक स्कूल से इंटरमीडिएट की परीक्षा 88 प्रतिशत अंकों के साथ पास की। इसके बाद नीट-यूजी की तैयारी शुरू कर दी। तैयारी के लिए आनलाइन पैकेज लिए और फिजिक्स, केमेस्ट्री और बायो की विषय की पढ़ाई। प्रतिदिन तीनों विषयों के दो-दो घंटे के बैच आनलाइन लेते रहे। अब मेहनत का परिणाम मिल गया। उनका सपना है कि वह न्यूरोलाजी के डाक्टर बनें, एमबीबीएस करने के बाद वह न्यूरोलाजी की विशेषज्ञता की पढ़ाई के इच्छुक हैं।

    Shashwat Patel

    पिता परशुराम के साथ बड़ा बेटा शास्वत व छोटा बेटा अपूर्व। स्रोत स्वजन 

    मोबाइल से बनाई दूरी, टैब में ली क्लासें

    शास्वत कहते हैं कि उनके पास पिछले वर्ष तक मोाबाइल फोन नहीं था। पिता जी ने इंटर पास होने पर टैब दिलाया जिसमें वह आनालाइन क्लास लेते थे। कई बार टैब की बैटरी खत्म हो जाती थी, गांव में बिजली नियमित नहीं होती थी तो वह क्लास की रिकार्डिंग से तैयारी करते थे। अब पिता ने उन्हें मोबाइल भी दिला दिया है। मोबाइल न रखने के पीछे कारण है कि अगर मोबाइल हाथ में रहेगा तो न चाहते हुए थी दिमाग इधर-उधर बंटने का का खतरा होता है।

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    Shashwat Patel

    मां रीता देवी के साथ शास्वत व अपूर्व पटेल। स्रोत स्वयं 

    बेटों की परवरिश को मां न छोड़ दी सरकारी नौकरी

    पिता परशुराम बताते हैं कि वह परिषदीय स्कूल में शिक्षक हैं। वर्ष 2021 में टेट और सीटेट पास करने के बाद पत्नी रीता देवी ने भी नौकरी के लिए आवेदन कर दिया था। उनका चयन शिकोहाबाद में हुआ था। लेकिन उस समय बच्चों की देखभाल की सख्त जरूरत थी। ऐसे में पत्नी ने नौकरी न ज्वाइन करने का फैसला लिया। चयन के बाद भी वह नौकरी करने नहीं गयी। उनके त्याग का फल अब बच्चों को मिल रहा है।

    इस तरह थी शास्वत की दिनचर्या

    शास्वत के अनुसार वह सुबह पांच बजे के आसपास उठते थे, गांव में पशुओं के दैनिक कार्य को निपटाकर उनके लिए खेत से चारा लाते और कटिया मशीन में काटकर सुबह आठ बजे तक आनलाइन क्लास के लिए तैयार हो जाते। एकांत कमरे में क्लास लेते और पूरी एकाग्रता के साथ पढ़ते। जो कोचिंग में पढ़ाया जाता शाम को उसका अभ्यास करते ताकि हर प्रश्न को हल करने में उन्हें आसानी हो। पिछले दो साल में वह रिश्तेदारों तक के यहां नहीं गये। इसी रूटीन में अपने आप को ढाल लिया। घरेलू काम करने का नतीजा था कि शरीर में चुस्ती-फुर्ती रही और कभी बीमार नहीं पड़े।

    बोले माता-पिता

    शास्वत की मां रीता देवी व पिता परशुराम पटेल कहते हैं कि उन्होंने अपने बेटे को इंटर पास करने के बाद कहा था कि इंजीयनिंग कर ले, लेकिन बेटे ने इच्छा डाक्टर बनने की प्रकट की। ऐसे में वह भी बेटे की राय में शामिल हो गये। शिक्षक होने के नाते वह जानते हैं कि डाक्टर बनना बहुत कठिन है, लेकिन बच्चे की मेहनत पर भरोसा था। मां रीता देवी कहती हैं कि वह कहतीं है कि जिस पढ़ाई में मन लगे वहीं पढ़े, जिस क्षेत्र में जाना चाहते हैं उसी को लक्ष्य बनाए। बेटे ने ऐसा ही किया।

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