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    गाजियाबाद में पुरानी गाड़ियों का करोड़ों का कारोबार, लेकिन जिले में नहीं एक भी अधिकृत डीलर

    Updated: Tue, 14 Jul 2026 12:24 PM (IST)

    गाजियाबाद में पुराने वाहनों का करोड़ों का कारोबार बिना किसी पंजीकृत डीलर के चल रहा है, जबकि दिसंबर 2022 से केंद्र सरकार के नियम लागू हैं। ...और पढ़ें

    लोहिया नगर में अंबेडकर रोड किनारे बिक रहीं सेकंड हैंड गाड़ियां। जागरण

    लोहिया नगर में अंबेडकर रोड किनारे बिक रहीं सेकंड हैंड गाड़ियां। जागरण

    HighLights

    1. गाजियाबाद में पुराने वाहनों का करोड़ों का कारोबार बिना पंजीकरण।

    2. परिवहन विभाग के पास एक भी अधिकृत डीलर नहीं।

    3. फर्जी दस्तावेजों, चोरी के वाहनों की बिक्री का खतरा।

    लक्ष्य चौधरी, गाजियाबाद। जिले में पुराने वाहनों की खरीद-बिक्री का कारोबार हर वर्ष करोड़ों रुपये का है, लेकिन परिवहन विभाग के रिकॉर्ड में अब तक एक भी अधिकृत पंजीकृत वाहन व्यवसायी दर्ज नहीं है। जबकि केंद्र सरकार ने दिसंबर 2022 में केंद्रीय मोटर वाहन नियमावली में संशोधन कर पुराने वाहनों के कारोबार को लाइसेंस व्यवस्था के दायरे में लाने के लिए स्पष्ट प्रावधान कर दिए थे।

    इसके बावजूद जिले में नियम केवल कागजों तक सीमित हैं और सेकेंड हैंड वाहनों का कारोबार बिना अधिकृत पंजीकरण के धड़ल्ले से चल रहा है। परिवहन विभाग के आंकड़ों के अनुसार जिले में करीब 50 क्रय- विक्रय केंद्र संचालित हैं।

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    रोजाना आते हैं 10 से 15 वाहन स्वामित्व ट्रांस के आवेदन

    आरटीओ कार्यालय में प्रतिदिन 10 से 15 वाहन स्वामित्व हस्तांतरण के आवेदन आते हैं। हर माह यह संख्या 300 से अधिक पहुंच जाती है। इसके अलावा ऑनलाइन प्लेटफार्म और निजी शोरूम के माध्यम से होने वाले हजारों सौदे अलग हैं। इसके बावजूद विभाग के पास ऐसे किसी भी व्यवसायी का रिकार्ड नहीं है, जिसे केंद्र संचालन का प्रमाण-पत्र जारी किया गया हो।

    केंद्र सरकार की एसओपी के अनुसार, पुराने वाहनों की खरीद-बिक्री करने वाले व्यवसायी को परिवहन विभाग से अधिकृत प्रमाण-पत्र लेना अनिवार्य है। इसके लिए कंपनी, एलएलपी, फर्म या प्रोपराइटर के रूप में पंजीकरण, कम से कम तीन वर्ष पुरानी विधिक इकाई, 20 लाख रुपये की बैंक गारंटी, चरित्र प्रमाण-पत्र, पार्किंग व कार्यालय की व्यवस्था सहित कई शर्तें पूरी करनी होती हैं।

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    अधिकृत व्यवसायी ही वाहन खरीदकर अपने नाम दर्ज कर सकते हैं और निर्धारित अवधि में आगे बेच सकते हैं, जिससे वाहन का पूरा रिकॉर्ड सुरक्षित रहता है। वर्तमान में बिना पंजीकरण कारोबार होने से फर्जी दस्तावेज, लंबित चालान, टैक्स बकाया, चोरी या विवादित वाहनों की खरीद-बिक्री की आशंका बनी रहती है।

    वाहन स्वामित्व और जवाबदेही तय करना भी मुश्किल हो जाता है। सूत्रों का कहना है कि विभागीय उदासीनता और मिलीभगत के कारण भी यह व्यवस्था फल-फूल रही है।

    ऐसे में सवाल उठता है कि जब केंद्र सरकार की स्पष्ट व्यवस्था मौजूद है तो जिले में अब तक एक भी अधिकृत वाहन व्यवसायी क्यों नहीं बनाया गया और करोड़ों के इस कारोबार की निगरानी आखिर किसके भरोसे चल रही है।

    इस संबंध में एआरटीओ प्रशासन अशोक कुमार श्रीवास्तव से उनका पक्ष जानने के लिए फोन पर संपर्क किया गया, लेकिन उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया।