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    Kargil Vijay Diwas: जंग पर जाते वक्त कहा था- शायद लौटकर न आऊं... अपने दम पर जीना

    Updated: Sun, 26 Jul 2026 10:09 AM (IST)

    लांस नायक रतन सिंह ने 1971 युद्ध में देश के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया, जिसके बाद उनकी पत्नी लीलावती ने संघर्ष कर बेटे को सीमा शुल्क अधिकारी बनाया। ...और पढ़ें

    रतन सिंह की फाइल फोटो

    रतन सिंह की फाइल फोटो

    HighLights

    1. लांस नायक रतन सिंह 1971 युद्ध में 25 वर्ष की आयु में शहीद हुए।

    2. पत्नी लीलावती ने संघर्ष कर बेटे को सीमा शुल्क अधिकारी बनाया।

    3. पोता अध्ययन दादा की प्रेरणा से सेना में अधिकारी बनना चाहता है।

    जागरण संवाददाता, गाजियाबाद। Kargil Vijay Diwas 2026: देश के लिए सीमा पर लड़ने वाले सैनिकों की शहादत सिर्फ इतिहास का हिस्सा नहीं बनती, बल्कि उनके परिवारों की जिंदगी भी हमेशा के लिए बदल देती है। गाजियाबाद के सांजापुर गांव के लांस नायक रतन सिंह ने महज 25 वर्ष की उम्र में 1971 के भारत-पाक युद्ध में मातृभूमि की रक्षा करते हुए सर्वोच्च बलिदान दिया।

    युद्ध पर रवाना होते समय पत्नी लीलावती से उन्होंने कहा था, शायद लौटकर न आऊं... अपने दम पर जीना और परिवार को संभालना।' पति के इन शब्दों को जीवन का संकल्प बनाकर लीलावती ने संघर्षों के बीच परिवार को संभाला और डेढ़ साल के बेटे को पढ़ा-लिखाकर सीमा शुल्क अधिकारी बनाया। आज भी शहीद की यादें उनके परिवार की सबसे बड़ी ताकत हैं।

    25 साल की उम्र में मातृभूमि पर कर दिया जीवन समर्पित

    गाजियाबाद के सांजापुर गांव के रहने वाले लांस नायक रतन सिंह ने महज 25 वर्ष की आयु में 1971 के भारत-पाक युद्ध में वीरता का परिचय देते हुए देश के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए। आज भी उनकी पत्नी लीलावती और बेटे संजय की यादों में वह जीवंत हैं। जब सेना से युद्ध का तार आया, उस समय लीलावती केवल 22 वर्ष की थीं और उनका बेटा डेढ़ साल का था।

    लीलावती बताती हैं कि उनके पति 1962 और 1965 के युद्ध में भी देश की सेवा कर चुके थे। 1971 में वह छुट्टी पर घर आए थे और पत्नी को अपने साथ पोस्टिंग पर ले जाने की तैयारी थी। तभी युद्ध शुरू होने का संदेश मिला। रवाना होते समय उन्होंने पत्नी से कहा, 'माता-पिता और बेटे का ख्याल रखना। कभी किसी के सहारे मत रहना, अपने दम पर जिंदगी जीना।' इसके बाद वह सीमा पर पहुंचे और वीरता से लड़ते हुए शहीद हो गए।

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    अंतिम दर्शन भी नहीं हुए, यादों का सहारा बना एक बक्सा

    लीलावती बताती हैं कि उन्हें अपने पति के अंतिम दर्शन भी नसीब नहीं हुए। युद्ध में बड़ी संख्या में जवानों के शहीद होने के कारण किसी का भी पार्थिव शरीर घर नहीं लाया जा सका। रतन सिंह के घर केवल उनके फूलों का कलश और एक बक्सा पहुंचा था।

    उस बक्से में पति की वर्दी और बिस्तर रखा था, लेकिन कुछ समय बाद गांव में आई बाढ़ ने वह आखिरी निशानी भी छीन ली। परिवार का पालन-पोषण करने के लिए वह नौकरी करने दूसरे शहर चली गई थीं। लौटने पर देखा कि बक्से में पानी भरने से उसमें रखा कोई भी सामान सुरक्षित नहीं बचा था।

    ''शायद लौटकर न आऊं...'' आज भी कानों में गूंजते हैं आखिरी शब्द

    लीलावती कहती हैं कि पति की विदाई के समय कही गई हर बात आज भी उन्हें याद है। उन्होंने जाते हुए कहा था, 'युद्ध छिड़ गया है, मैं जा रहा हूं और शायद लौटकर न आऊं। अपने दम पर जीना, परिवार को संभालना, माता-पिता का ख्याल रखना और कभी किसी के सहारे मत रहना।' पति की इन्हीं बातों को उन्होंने जीवनभर निभाया। हर कठिनाई का सामना किया और बेटे को अच्छी शिक्षा देकर उसे सीमा शुल्क अधिकारी बनाया।

    संघर्ष के दम पर बेटे को बनाया सीमा शुल्क अधिकारी

    पति के बलिदान होने के समय बेटा केवल डेढ़ साल का था। घर में बुजुर्ग सास पनवेश्वरी देवी और ससुर रिशाल सिंह थे। परिवार की जिम्मेदारी उठाने के लिए लीलावती को दूसरे शहर जाकर नौकरी करनी पड़ी। छोटे बेटे को वह अपने साथ नहीं ले जा सकीं, इसलिए उसे आर्मी हॉस्टल में छोड़ना पड़ा।

    एक साल बाद जब बेटे से मिलने पहुंचीं तो वह मां को पहचान भी नहीं पाया था। बाद में एक कंपनी में नौकरी मिलने पर बेटे को अपने साथ रख लिया। बचपन में जब बेटा अपने पिता के बारे में पूछता तो वह कहतीं कि अच्छे नंबर लाओगे तो पापा खुश होंगे।

    हाईस्कूल पास करने के बाद जब उसने फिर यही सवाल किया तो उन्होंने सच बताते हुए कहा, 'तेरे पापा अब भगवान के पास हैं। अब तेरी मां और पिता दोनों मैं ही हूं।' मां के संघर्ष को देखकर संजय ने भी पढ़ाई में पूरी मेहनत की और आज वह सीमा शुल्क अधिकारी के पद पर कार्यरत हैं। वर्तमान में शहीद रतन सिंह का परिवार विवेकानंद नगर में रह रहा है।

    दादा के बलिदान से मिली प्रेरणा, अब पोता पहनना चाहता है वर्दी

    बलिदानी रतन सिंह के बेटे संजय के तीन बच्चे हैं। दो बेटे अध्ययन और आरव तथा एक बेटी खुशी है। अध्ययन इस समय कक्षा 12 में पढ़ रहे हैं। वह अपने दादा के बलिदान से प्रेरित होकर भारतीय सेना में अधिकारी बनने का सपना देख रहे हैं और एनडीए की तैयारी कर रहे हैं। परिवार को विश्वास है कि शहादत और देशसेवा की यह विरासत आने वाली पीढ़ी भी आगे बढ़ाएगी।

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