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    Kargil Vijay Diwas: मेजर प्राची ने कारगिल युद्ध में इलाज के साथ बढ़ाया जवानों का जोश, पाकिस्तान को चटाई धूल

    Updated: Sun, 26 Jul 2026 10:03 AM (IST)

    मेजर डॉ. प्राची गर्ग ने कारगिल युद्ध के दौरान द्रास सेक्टर में 400 से अधिक सैनिकों का इलाज किया और उनका मनोबल बढ़ाया। गाजियाबाद निवासी प्राची ने अपनी ...और पढ़ें

    कारगिल युद्ध में फोन पर बात करतीं मेजर प्राची गर्ग का फाइल फोटो। सौ. स्वयं

    कारगिल युद्ध में फोन पर बात करतीं मेजर प्राची गर्ग का फाइल फोटो। सौ. स्वयं

    HighLights

    1. मेजर प्राची गर्ग ने 400 से अधिक सैनिकों का इलाज किया

    2. द्रास सेक्टर में रहकर सैनिकों का मनोबल बढ़ाया

    3. कारगिल युद्ध में अदम्य साहस और देशसेवा का प्रदर्शन

    अभिषेक सिंह, गाजियाबाद। Kargil Vijay Diwas 2026: कारगिल युद्ध में भारतीय सैनिकों ने जो अदम्य साहस दिखाया वह आज भी लोगों को गौरवांवित करता है। भारतीय सेना की वीरता के आगे पाकिस्तान ने नतमस्तक होकर अपने घुटने टेक दिए थे। उस वक्त द्रास सेक्टर में आठ माउंटेन आर्टिलरी ब्रिगेड के साथ गाजियाबाद में रहने वाली मेजर डॉ. प्राची गर्ग भी वहां कार्यरत थीं।

    उन्होंने युद्ध के दौरान 400 से अधिक सैनिकों का इलाज करने के साथ ही उनके अंदर दुश्मन को सबक सिखाने का जोश बढ़ाया। गोलियों की तड़तड़ाहट के बीच उनके कदम नहीं डिगे। उपचार के बाद कई सैनिक ऐसे रहे, जिन्होंने प्राथमिक इलाज के बाद दोबारा दुश्मन पर हमला कर धूल चटाई। युद्ध में भारत की जीत के पलों को बाद कर प्राची का सिर आज भी गर्व से ऊंचा हो जाता है।

    मेजर प्राची ने कारगिल विजय दिवस को किया याद

    प्राची गर्ग उन दिनों को याद कर कहती हैं कि 13 जून, 1999 यही वह तारीख है जब अचानक पाकिस्तानी फौज ने हम पर तेजी से बमबारी व गोलीबारी शुरू की। अचानक हुए इस हमले में जांबाज अधिकारियों के साथ कई सैनिक बलिदान हुए। प्राची के करीब से गोली निकली।

    उस वक्त लगा कि अब क्या होगा, लेकिन अचानक फ्लाइट लेफ्टिनेंट के नचिकेता की याद आई, जिनको पाकिस्तानियों ने बंदी बनाकर प्रताड़ित किया था, लेकिन वे हौसला नहीं हारे। प्राची ने सोचा कि अगर युद्ध के दौरान उनको बंदी बना लिया गया तो क्या होगा।

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    साथियों ने हौसला बढ़ाया और युद्ध के मैदान में डटी रहीं। वह बताती है कि 13 उनका लकी नंबर है, क्योंकि 13 अगस्त को उनका जन्म हुआ था। शायद यही वजह है कि वह हमले में बच गई। युद्ध में उनके कई साथी वीरगति को प्राप्त हुए, जिनको याद कर आज भी आंखें नम हो जाती है। देश को उन पर हमेशा गर्व रहेगा ।

    अशोक नगर में रहने वाली मेजर डॉ. प्राची गर्ग के पिता जीएल गर्ग सेंट्रल ग्राउंड वाटर बोर्ड में आफिसर सर्वेयर के पद पर कार्यरत थे। मां मुक्ता गर्ग सरकारी स्कूल में शिक्षिका थीं। प्राची ने आठवीं तक दिल्ली में पढ़ाई की। इसके बाद परिवार गाजियाबाद के अशोक नगर में आकर रहने लगा।

    आगरा से की मेडिकल की पढ़ाई

    सुशीला इंटर कॉलेज में 12वीं तक पढ़ाई पूरी कर मेडिकल की पढ़ाई के लिए वह आगरा गई। वहां सरोजनी नायडू मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस की पढ़ाई पूरी की। मदर टेरेसा को अपना आदर्श मानने वाली प्राची 1997 में पांच साल के लिए शार्ट सर्विस कमीशन पर सेना में भर्ती हुई।

    वह कहती हैं कि सेना में भर्ती होना उनकी नियति थी। उनसे पहले उनके परिवार का कोई व्यक्ति उनसे पहले कार्यरत नहीं रहा। देशसेवा की भावना से सैनिकों की जान बचाने के लिए वह भारतीय सेना में भर्ती हुई। भर्ती के दौरान उनको दुश्मन पर हमला करने के लिए नजदीक से इस्तेमाल किए जाने वाले हथियारों जैसे पिस्टल आदि को चलाने का प्रशिक्षण दिया गया था।

    रॉकेट लांचर, तोप चलाने का प्रशिक्षण नहीं मिला, क्योंकि इसकी जरूरत सेना में कार्यरत चिकित्सकों को नहीं पड़ती है। वहीं कारगिल युद्ध के दौरान एक पल ऐसा भी आया जब उन्होंने रॉकेट लांचर, तोप चलाने और कमांड देने का प्रशिक्षण लिया। ऑपरेशन विजय व आपरेशन पराक्रम में भी भाग लिया। कारगिल युद्ध में उनके पराक्रम को देखते हुए छह माह के लिए उन्हें सेवा विस्तार दिया गया था।

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    कारगिल युद्ध के दौरान की यादें आज भी ताजा हैं। उस वक्त साथ रहे आर्टिलरी नायक दीपचंद ने दो माह पहले ही मुझसे संपर्क किया और हमने उन दिनों को याद किया। दीपचंद के अंदर भी आज भी वह जज्बा कायम है। हमें भारतीय सेना पर गर्व है। इस तरह से और भी पुराने साथियों से अब संपर्क हो रहा है, इससे अच्छा महसूस होता है।

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    - मेजर डॉ. प्राची गर्ग