Kargil Vijay Diwas 2026: कारगिल शहीद की आखिरी चिट्ठी, 'लौटा तो खुद फोन करूंगा, नहीं तो किसी और का आएगा'
कारगिल युद्ध के नायक सिपाही राजेश गुरुंग 6 जुलाई 1999 को टाइगर हिल पर शहीद हुए। ...और पढ़ें

दुश्मनों से लोहा लेते राजेश हुए थे बलिदान।

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जागरण संवाददाता, देहरादून। कारगिल युद्ध के 27 साल बाद भी नागा रेजीमेंट के वीर सपूत सिपाही राजेश गुरुंग की आखिरी चिट्ठी पढ़ते ही आंखें नम हो जाती हैं।
छह जुलाई 1999 को टाइगर हिल पर दुश्मनों से लोहा लेते हुए, देहरादून के चांदमारी-गढ़ीकैंट निवासी राजेश मातृभूमि पर बलिदान हो गए थे, लेकिन उनकी लिखी चिट्ठी आज भी परिवार के लिए सबसे अनमोल धरोहर है।
अंतिम चिट्ठी में क्या लिखा था?
टाइगर हिल पर निर्णायक लड़ाई से पहले राजेश ने पिता को अपनी अंतिम चिट्ठी में लिखा था, 'जिस जगह पर हम हैं। वहां से लौट पाएंगे या नहीं, कुछ कहा नहीं जा सकता। अगर जिंदा बचा तो दो-तीन दिन बाद मेरा फोन आएगा, नहीं बचा तो मेरी जगह किसी और का फोन आएगा।'
इस चिट्ठी को पढ़कर आज भी परिवार की रूह कांप उठती है। चिट्ठी में उन्होंने स्वजन से अपनापन जताते हुए शिकायत भी की कि वे उन्हें चिट्ठी क्यों नहीं लिखते। साथ ही अपनी मंगेतर का भी जिक्र उन्होंने चिट्ठी में किया था और कहा था कि, उसे बता देना, मैं ठीक हूं।'
अंत में उन्होंने भरोसा जताया कि, 'बस। यह लड़ाई खत्म हो जाए, फिर आपका बेटा आपका और देश का नाम रोशन करके लौटेगा।' पर नियति को कुछ और ही मंजूर था। राजेश की स्मृति को अमर रखने के लिए परिवार ने अपनी जमा पूंजी से गढ़ीर्कंट में उनके नाम का मंदिर बनवाया है, जहां उनकी प्रतिमा भी स्थापित की गई है। मां बसंती देवी कहती हैं, 'बेटा हमारे बीच नहीं है, लेकिन उसका साहस और बलिदान हमेशा जिंदा रहेगा।
राजेश के छोटे भाई अजय का बेटा अक्षित भी ताऊ से प्रेरणा लेकर सेना में भर्ती होने की तैयारी कर रहा है। राजेश की यह चिट्ठी केवल एक सैनिक के शब्द नहीं, बल्कि देशभक्ति, कर्तव्य और परिवार के प्रति प्रेम का ऐसा दस्तावेज है, जिसे हर बार पढ़ने पर नए सिरे से गर्व की अनुभूति होने लगती है और मन भावुक हो उठता है।