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    26 साल की उम्र में देश के लिए सर्वोच्च बलिदान, कारगिल हीरो लेफ्टिनेंट गौतम गुरुंग के शौर्य की दास्तान

    Updated: Sun, 26 Jul 2026 09:14 AM (IST)

    लेफ्टिनेंट गौतम गुरुंग ने कारगिल युद्ध में मातृभूमि की रक्षा करते हुए सर्वोच्च बलिदान दिया। उनके पार्थिव शरीर के गोरखपुर पहुंचने पर पूरा शहर शोक में ड ...और पढ़ें

    कारगिल युद्ध के अमर योद्धाओं में शामिल लेफ्टिनेंट गौतम गुरुंग। जागरण

     कारगिल युद्ध के अमर योद्धाओं में शामिल लेफ्टिनेंट गौतम गुरुंग। जागरण

    HighLights

    1. लेफ्टिनेंट गौतम गुरुंग ने कारगिल युद्ध में मातृभूमि के लिए बलिदान दिया।

    2. उनके पार्थिव शरीर के गोरखपुर पहुंचने पर शहर शोक में डूबा।

    3. रक्षाबंधन पर बहन ने अमर शहीद भाई को राखी बांधी।

    जागरण संवाददाता, गोरखपुर। कारगिल युद्ध के अमर योद्धाओं में शामिल लेफ्टिनेंट गौतम गुरुंग का नाम गर्व की अनुभूति कराता है। मातृभूमि की रक्षा करते हुए उन्होंने सर्वोच्च बलिदान दिया। उनका पार्थिव जब गोरखपुर पहुंचा था तो पूरा शहर शोक में डूब गया था। जीआरडी कूड़ाघाट से राजघाट के राप्ती नदी तक निकली अंतिम यात्रा में हजारों लोग स्वतः शामिल होते चले गए।

    ब्रिगेडियर पीएस गुरुंग भारतीय सेना की गोरखा रेजीमेंट तैनात थे। 23 अगस्त 1973 को देहरादून में उनके बेटे गौतम गुरुंग ने जन्म लिया। मां पुष्पलता गुरुंग ने बेटे को बचपन से ही अनुशासन, सेवा और राष्ट्रभक्ति के संस्कार दिए। पारिवारिक सैन्य परंपरा का प्रभाव ऐसा था कि स्नातक और एमबीए की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने कारपोरेट क्षेत्र के बजाय सेना में जाने का निर्णय लिया। छह मार्च, 1997 को उन्हें 3/4 गोरखा राइफल्स में कमीशन मिला और पहली तैनाती जम्मू-कश्मीर में हुई।

    कारगिल युद्ध के दौरान उनकी यूनिट तंगधार सेक्टर में तैनात थी। चार अगस्त, 1999 को एक सैन्य अभियान के दौरान उनके आठ साथी दुश्मन की गोलाबारी के बीच बंकर में फंस गए। अत्यंत गंभीर परिस्थितियों में लेफ्टिनेंट गौतम गुरुंग बिना अपनी जान की परवाह किए सबसे आगे बढ़े। साथियों को सुरक्षित निकालने का प्रयास किया।

    इसी दौरान दुश्मन के राकेट लांचर के हमले में वह गंभीर रूप से घायल हो गए। गंभीर चोटों के बावजूद उन्होंने मोर्चा नहीं छोड़ा और अपने साथियों की सुरक्षा की। उपचार के लिए उन्हें सेना के अस्पताल में ले जाया गया, जहां पांच अगस्त, 1999 को उन्होंने अंतिम सांस ली।

    भारत-नेपाल मैत्री समाज के अध्यक्ष अनिल कुमार गुप्ता बताते हैं कि उस समय ब्रिगेडियर पीएस गुरुंग जीआरडी में तैनात थे। मिलनसार स्वभाव के कारण वह स्थानीय लोगों से गहराई से जुड़े गए थे। उनके बेटे के बलिदान की सूचना से शहर में शोक की लहर दौड़ गई।

    बलिदानी का पार्थिव लाया गया तो एयरपोर्ट से लेकर राजघाट तक बड़ी संख्या में लोग अंतिम यात्रा में शामिल हुए। पिता ब्रिगेडियर पीएस गुरुंग ने स्वयं बेटे की अर्थी को कंधा दिया। उन्होंने पूरे धैर्य के साथ अंतिम संस्कार की रस्में निभाईं, लेकिन मुखाग्नि देने के बाद उनका दर्द आंसुओं में छलक पड़ा। यह दृश्य देखकर वहां मौजूद हर कोई रो पड़ा था।

    जिस दिन लेफ्टिनेंट गौतम गुरुंग का पार्थिव गोरखपुर पहुंचा, उस दिन रक्षाबंधन का पर्व था। उनकी इकलौती बहन मीनाक्षी ने भाई की कलाई पर राखी बांधी। वह हर वर्ष पांच अगस्त को आयोजित होने वाले कार्यक्रम में गोरखपुर पहुंचती हैं।

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    स्मृतियों को बनाया प्रेरणा का केंद्र
    बेटे के बलिदान को केवल यादों तक सीमित न रहने देने का संकल्प ब्रिगेडियर पीएस गुरुंग ने लिया। उनके प्रयास से कूड़ाघाट तिराहे पर लेफ्टिनेंट गौतम गुरुंग की प्रतिमा स्थापित की गई और इसका नाम गौतम गुरुंग तिराहा रखा गया। बाद में शहीद गौतम गुरुंग ट्रस्ट की स्थापना भी की, जो हर वर्ष उनकी स्मृति में कार्यक्रम आयोजित करता है।

    सेवानिवृत्ति के बाद ब्रिगेडियर पीएस गुरुंग ने देहरादून में गुरुंग बाक्सिंग क्लब बनाया। इसके माध्यम से जरूरतमंद बच्चों को खेलों में आगे बढ़ने का अवसर दिया। मार्च, 2026 में उनका निधन हो गया है। इस बार श्रद्धांजलि कार्यक्रमों में उनकी कमी सभी को खलेगी। फिर भी लेफ्टिनेंट गौतम गुरुंग का अदम्य साहस और उनका बलिदान आने वाली पीढ़ियों को हमेशा राष्ट्रसेवा की प्रेरणा देता रहेगा।