कारगिल विजय दिवस 2026: टाइगर हिल की जीत में गूंजा था सैनिक गांव उदितपुर का शौर्य
कारगिल विजय दिवस पर फरेंदा क्षेत्र के सैनिक गांव उदितपुर के शौर्य को याद किया गया, जहाँ के जांबाजों ने टाइगर हिल की जीत में अहम भूमिका निभाई थी। यह गा ...और पढ़ें

संदीप गुरुंग, आनंद गुरुंग, कमल गुरुंग, मोहित गुरुंग और सोनू गुरुंग की फाइल फोटो। जागरण
HighLights
कारगिल युद्ध में उदितपुर के सैनिकों ने अदम्य साहस दिखाया।
टाइगर हिल विजय में सैनिक गांव उदितपुर का महत्वपूर्ण योगदान।
उदितपुर की सैन्य परंपरा प्रथम विश्व युद्ध से जारी है।
उमाकांत विश्वकर्मा, आनंदनगर। भारत माता की जय, जय महाकाली, आयो गोरखाली के रणघोष के बीच जब भारतीय सेना ने कारगिल की बर्फीली चोटियों पर विजय पताका फहराई थी, तब फरेंदा क्षेत्र का सैनिक गांव उदितपुर भी उस गौरवगाथा का साक्षी बना था। कारगिल युद्ध में गांव के जांबाज सैनिकों ने अदम्य साहस और वीरता का ऐसा परिचय दिया कि पाकिस्तानी सैनिकों के हौसले पस्त हो गए। आज भी कारगिल विजय दिवस आते ही क्षेत्र में उन रणबांकुरों की बहादुरी की गाथाएं गर्व के साथ सुनाई जाती हैं।
उदितपुर की पहचान केवल एक गांव नहीं, बल्कि सैनिक गांव के रूप में है। यहां लगभग हर परिवार का कोई न कोई सदस्य भारतीय सेना में रहा है या वर्तमान में देश की सेवा कर रहा है। वर्ष 1998 में गांव के सोनू गुरुंग, आनंद गुरुंग, मोहित गुरुंग, संदीप गुरुंग, कमल गुरुंग समेत छह युवकों ने एक साथ भारतीय सेना में भर्ती होकर देश सेवा का संकल्प लिया था।
1/4 गोरखा राइफल में सपाटू (शिमला) में कठिन प्रशिक्षण पूरा करने के बाद इन जवानों की तैनाती सीमावर्ती क्षेत्रों में हुई। वर्ष 1999 में जब पाकिस्तान ने कारगिल की चोटियों पर घुसपैठ की, तब उदितपुर के यह वीर जवान भी मोर्चे पर डट गए। टाइगर हिल व आसपास की ऊंची चोटियों पर दुश्मन की लगातार गोलाबारी के बीच उन्होंने अद्भुत साहस का परिचय दिया।
विषम परिस्थितियों में भी पीछे हटने के बजाय भारतीय सेना के साथ कंधे से कंधा मिलाकर लड़ते रहे। आखिरकार 26 जुलाई 1999 को भारतीय सेना ने विजय का परचम लहराया और टाइगर हिल पर तिरंगा फहरा दिया। इस जीत में सैनिक गांव उदितपुर के रणबांकुरों का योगदान गांव ही नहीं, पूरे जिले के लिए गर्व का विषय बना।
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गांव के लोगों के अनुसार उदितपुर की सैन्य परंपरा प्रथम विश्व युद्ध के समय से चली आ रही है। पीढ़ी दर पीढ़ी यहां के युवाओं ने सेना की वर्दी पहनकर मातृभूमि की रक्षा को अपना सर्वोच्च धर्म माना है। यही वजह है कि आज भी गांव के बच्चों का पहला सपना सेना में भर्ती होकर देश की सेवा करना होता है।
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देश सेवा की मिसाल नई पीढ़ी के हाथों में
आनंदनगर: सेवानिवृत्त मेजर सूबेदार व गांव मुखिया एसबी गुरुंग ने बताया कि गांव में देशभक्ति का जज्बा आज भी पहले जैसा ही है। वर्तमान में 19 सैनिक सेवानिवृत्त हो चुके हैं जबकि 16 से अधिक जवान सेना एवं अर्द्धसैनिक बलों में देश की सीमाओं की रक्षा कर रहे हैं। पूर्व सैनिक प्रतिदिन युवाओं को दौड़, शारीरिक दक्षता और लिखित परीक्षा की तैयारी कराते हैं, ताकि गांव की गौरवशाली सैन्य परंपरा लगातार आगे बढ़ती रहे।
सैनिकों की यहां हैं तैनाती
हवलदार आनंद गुरुवार सेवानिवृत्त हो चुके है। वहीं सूबेदार मोहित गुरुंग व सुबेदार सोनू गुरुंग पठानकोट में तैनात है। संदीप गुरुंग जम्मू कश्मीर व कमल गुरुंग देहरादून में सेवा दे रहे हैं।