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    बासमती चावल की क्रांति: बचपन में पिता संग खेती से उपजे लगाव से पद्मश्री तक का सफर

    Updated: Sun, 08 Feb 2026 01:57 PM (IST)

    गाजीपुर के डॉ. अशोक कुमार सिंह को बासमती चावल की 25 से अधिक उन्नत किस्में विकसित करने के लिए पद्मश्री से सम्मानित किया गया है। बचपन से खेती से जुड़े ड ...और पढ़ें

    अपनी विकसित धान की फसल के साथ डा. अशोक कुमार सिंह। स्रोत-स्वयं

    अपनी विकसित धान की फसल के साथ डा. अशोक कुमार सिंह। स्रोत-स्वयं

    HighLights

    1. 25 से अधिक उन्नत बासमती चावल किस्में विकसित कीं।

    2. किसानों की आय बढ़ाई, कीटनाशक उपयोग घटाया, निर्यात सुधारा।

    3. कृषि में योगदान हेतु पद्मश्री से सम्मानित किया गया।

    शिवानंद राय, गाजीपुर। मिट्टी से जुड़ाव, मेहनत और सीखने की जिद बचपन से जीवन का हिस्सा बन जाए, तो साधारण किसान परिवार का बेटा भी देश की कृषि को दिशा दे सकता है। गाजीपुर जिले के बरहट गांव निवासी डा. अशोक कुमार सिंह इसका सशक्त उदाहरण हैं।

    बचपन में पिता के साथ खेतों में काम करते हुए खेती के प्रति पैदा हुए लगाव ने आगे चलकर उन्हें बासमती चावल का विश्वस्तरीय कृषि विज्ञानी के रूप में पहचान दिलाई। उन्होंने बासमती की 25 से अधिक उन्नत प्रजातियां विकसित कीं।

    उनके द्वारा विकसित किस्मों की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इनमें रोग कम लगते हैं। इससे कीटनाशकों पर खर्च घटता है, पर्यावरण सुरक्षित रहता है और निर्यात में गुणवत्ता मानकों पर खरा उतरने से किसानों को बेहतर दाम मिलते हैं। अपने योगदान से किसानों की आय बढ़ाने और भारत की निर्यात क्षमता को सशक्त करने के लिए उन्हें इस वर्ष पद्मश्री से सम्मानित करने की घोषणा की गई है।

    किसान केदारनाथ सिंह के घर एक जुलाई 1962 को जन्मे अशोक की प्रारंभिक शिक्षा गांव के परिषदीय प्राथमिक विद्यालय से हुई। कक्षा पांच के बाद जूनियर हाईस्कूल की पढ़ाई डेढ़ किलोमीटर दूर कटघरा स्कूल से की। इंटर कालेज गांव के पास न होने के कारण हाईस्कूल और इंटरमीडिएट की पढ़ाई के लिए उन्हें 15 किमी दूर मलिकपुर जाना पड़ता।

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    रास्ते में पड़ने वाली बेसो नदी को रोज नाव से पार करना, घर पर 20 पशुओं की देखभाल, चारा काटना और गोबर उठाना उनकी दिनचर्या का हिस्सा था। बावजूद इसके, पढ़ाई के प्रति लगन कभी कम नहीं हुई।

    इंटरमीडिएट में विषय चयन को लेकर असमंजस था। इस दौरान बड़े भाई ऋषिमुनि सिंह (आगे चलकर अमेरिका के फ्लोरिडा विश्वविद्यालय से पीएचडी की) की सलाह पर एग्रीकल्चर को चुना। यह फैसला निर्णायक साबित हुआ। इंटरमीडिएट में उन्होंने प्रदेश में चौथा स्थान हासिल किया। इसके बाद बीएचयू से बीएससी की।

    बीएचयू से एमएससी (कृषि आनुवांशिकी एवं पादप प्रजनन) में विश्वविद्यालय में प्रथम स्थान और गोल्ड मेडल प्राप्त किया। इसके बाद भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (आइएआरआइ), पूसा, नई दिल्ली से पीएचडी की। उनका शोध भारत रत्न प्रो. एमएस स्वामीनाथन की अवधारणा पर आधारित रहा, जिसमें उच्च उपज के साथ पारंपरिक बासमती की गुणवत्ता बनाए रखने पर जोर था।

    अध्यापन और शोध में रुचि होने के कारण भारतीय कृषि सेवा परीक्षा छोड़कर आइएआरआइ में कृषि विज्ञानी के रूप में काम करना चुना। 1994 से बासमती चावल प्रजनन कार्यक्रम से जुड़े डा. अशोक ने 2007 में बासमती अनुसंधान विभाग के प्रमुख की जिम्मेदारी संभाली।

    उस समय पारंपरिक बासमती किस्मों की अवधि करीब 160 दिनों की थी और पैदावार मात्र दो से ढाई टन प्रति हेक्टेयर होती थी। गुणवत्ता अच्छी होने के बावजूद कम पैदावार होने से किसान इन्हें बड़े पैमाने पर नहीं अपनाते थे। डा. अशोक ने ऐसी किस्में विकसित करने पर काम किया, जिनमें कम अवधि, अधिक पैदावार और रोग प्रतिरोधक क्षमता हो।

    उन्होंने पूसा बासमती 1509 और 1692 विकसित की, जो 120 दिनों में तैयार हो जाती है। इससे किसानों को दूसरी फसलों की बोआई का अवसर मिला। माड्यूल ब्रीडिंग के जरिए विकसित इन किस्मों में रोग कम लगते हैं, कीटनाशकों का प्रयोग घटता है और गुणवत्ता बेहतर रहती है।

    इसके बाद पूसा बासमती 1509, 1692, 1718, 1728, 1847, 1885, 1886, 1979, 1985 सहित 25 से अधिक उन्नत प्रजातियां विकसित कीं। आज देशभर में 20 लाख से अधिक किसान लगभग 25 लाख हेक्टेयर क्षेत्रफल में इन किस्मों की खेती कर रहे हैं। इनके निर्यात से भारत को हर साल करीब 50 हजार करोड़ रुपये की विदेशी मुद्रा प्राप्त हो रही है।

    आइएआरआइ आने से पहले डा. अशोक टाटा इंस्टीट्यूट में रिसर्च एसोसिएट रहे। इसके बाद 1994 से 2009 तक हिसार स्थित बायोसीड जेनेटिक्स में कपास ब्रीडर के रूप में कार्य किया।

    2009 में आइएआरआइ में प्रधान विज्ञानी बने और 2019 से 2024 तक संस्थान के निदेशक रहे। उन्हें 2012 में बोरलाग अवार्ड से सम्मानित किया गया। उनकी पत्नी डा. रेनू सिंह भी पीएचडी हैं। दो बेटियां ऋचा सिंह और शिवानी सिंह ब्रिटेन में रहती हैं।