गोरखपुर : हर पांचवें स्टूडेंट पर नशे का खतरा, देश के 6 शहरों के 108 स्कूलों के 6168 विद्यार्थियों पर एम्स की स्टडी
एम्स गोरखपुर के अध्ययन में सामने आया है कि देश के छह शहरों के स्कूलों में हर पांच में से एक किशोर नशे के मध्यम या उच्च जोखिम की श्रेणी में है। यह अध्य ...और पढ़ें

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HighLights
हर पांच में से एक किशोर नशे के जोखिम में।
नशीले पदार्थों की आसान उपलब्धता, डिजिटल एक्सपोजर प्रमुख कारक।
स्कूलों में रोकथाम कार्यक्रम और प्रभावी नियंत्रण आवश्यक।
गजाधर द्विवेदी, गोरखपुर। विद्यार्थियों में बढ़ती नशे की प्रवृत्ति को लेकर एम्स गोरखपुर के नेतृत्व में किए गए अध्ययन ने गंभीर चिंता पैदा कर दी है। देश के छह शहरों के 108 सरकारी और निजी स्कूलों में 10 से 19 वर्ष आयु वर्ग के 6,168 विद्यार्थियों पर अध्ययन किया गया। सामने आया कि हर पांच में से एक किशोर नशे के मध्यम या उच्च जोखिम की श्रेणी में है।
अध्ययन में एम्स गुवाहाटी, एम्स नागपुर, एम्स राजकोट, एम्स देवघर और जवाहरलाल स्नातकोत्तर चिकित्सा शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान (जिपमर) पुडुचेरी सहयोगी संस्थान थे। अध्ययन को इसी माह अंतरराष्ट्रीय जर्नल लैंसेट ने प्रकाशित किया है।
अध्ययन में विश्व स्वास्थ्य संगठन के अल्कोहल, स्मोकिंग एंड सब्स्टेंस इन्वाल्वमेंट स्क्रीनिंग टेस्ट (डब्लूएचओ-असिस्ट) का उपयोग कर संभावित जोखिम का आकलन किया गया। इसमें गोरखपुर के 1,223, गुवाहाटी के 890, नागपुर के 1,082, राजकोट के 919, देवघर के 1,066 और पुडुचेरी के 988 विद्यार्थियों को शामिल किया गया।
इनसे 25 प्रश्नों वाली प्रश्नावली में परिवार में नशे की आदत, स्वयं में नशे की इच्छा, सामाजिक परिवेश, डिजिटल एक्सपोजर और मानसिक-सामाजिक पहलुओं से जुड़े सवाल पूछे गए। इसके आधार पर प्रतिभागियों को कम, मध्यम व उच्च जोखिम श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया।
अध्ययन में तंबाकू, अल्कोहल, भांग-गाजा, कोकीन, एम्फेटामाइंस, इनहेलेंट्स, सेडेटिव, हैलुसिनोजेंस, ओपिआइड्स आदि नशीले पदार्थों से जुड़े जोखिम का आकलन किया गया। गोरखपुर में जिन विद्यार्थियों में नशे का खतरा मिला है, उनमें से 51.1 प्रतिशत के पिता की शिक्षा प्राथमिक, 26.82 प्रतिशत की मिडिल व 22.08 प्रतिशत उच्च शिक्षित थे। इन विद्यार्थियों में 40.39 प्रतिशत कमजोर आय वर्ग के थे। गोरखपुर के प्रतिभागियों की औसत आयु 15.6 वर्ष रही, जो सभी केंद्रों में सबसे अधिक थी, जबकि नागपुर में यह सबसे कम 12.4 वर्ष दर्ज की गई।
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ये हैं जोखिम के कारक
- नशीले पदार्थों की आसान उपलब्धता से जोखिम दोगुणा मिला
- मोबाइल, इंटरनेट और इंटरनेट मीडिया का अधिक उपयोग
- नशे के प्रति सकारात्मक सोच भी स्वतंत्र जोखिम कारक पाई गई
- दोस्तों का प्रभाव, स्कूल का वातावरण और सामाजिक परिवेश
विद्यार्थियों का प्रतिशत जोखिम का स्तर
78.6 कम
10.3 मध्यम
11.1 उच्च
शहर जोखिम प्रतिशत
गुवाहाटी 42.3
देवघर 41.3
गोरखपुर 24.5
राजकोट 13.5
नागपुर 7.1
पुडुचेरी 0.1
नोट- ये निष्कर्ष केवल अध्ययन में शामिल स्कूलों तक सीमित हैं। इन्हें पूरे राज्यों की स्थिति का प्रतिनिधि नहीं माना जाना चाहिए।
अध्ययन का उद्देश्य यह बताना नहीं है कि कितने बच्चे नशा कर रहे हैं, बल्कि यह पहचानना है कि किन किशोरों में भविष्य में नशे की ओर बढ़ने का जोखिम अधिक है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानकों पर आधारित इस अध्ययन से स्पष्ट हुआ है कि नशीले पदार्थों की आसान उपलब्धता, बढ़ता डिजिटल एक्सपोजर और सामाजिक परिवेश जैसे कारक जोखिम बढ़ा रहे हैं। -डॉ. विभा दत्ता, कार्यकारी निदेशक एम्स
बच्चों को नशे की गिरफ्त में जाने से बचाने के लिए केवल जागरूकता अभियान पर्याप्त नहीं होंगे। स्कूल आधारित रोकथाम कार्यक्रमों को मजबूत करने, नशीले पदार्थों की उपलब्धता पर प्रभावी नियंत्रण, डिजिटल माध्यमों पर जोखिमपूर्ण सामग्री की निगरानी तथा जोखिम वाले किशोरों की समय रहते पहचान कर उन्हें परामर्श और सहयोग उपलब्ध कराना बेहद जरूरी है। -डॉ. यू वेंकटेश, असिस्टेंट प्रोफेसर सामुदायिक एवं पारिवारिक चिकित्सा विभाग, एम्स