केवल शरीर ही नहीं, याददाश्त भी छीन रही शराब की लत; गोरखपुर यूनिवर्सिटी की स्टडी में बड़ा खुलासा
गोरखपुर विश्वविद्यालय के एक अध्ययन से पता चला है कि शराब की लत शारीरिक के साथ-साथ मानसिक स्वास्थ्य और संज्ञानात्मक क्षमताओं को भी गंभीर रूप से प्रभावि ...और पढ़ें

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HighLights
शराब की लत मानसिक स्वास्थ्य, संज्ञानात्मक क्षमताओं को प्रभावित करती है।
गोरखपुर अध्ययन में 70% में मध्यम मनोविकृति लक्षण मिले।
उपचार में मानसिक मूल्यांकन, परामर्श को शामिल करने की सिफारिश।
डॉ. राकेश राय, गोरखपुर। शराब की लत केवल शरीर को ही नहीं, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य को भी गहराई से प्रभावित करती है। यह याददाश्त पर तो प्रभाव पर डालती ही है, साथ निर्णय क्षमता को भी कमजोर कर देती है। यह तथ्य सामने आए हैं दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय के मनोविज्ञान विभाग में किए गए एक अध्ययन में।
विभाग के शोधार्थी नीरज यादव ने प्रो. विस्मिता पालीवाल के मार्गदर्शन में किए गए अध्ययन पर पाया है कि शराब पर निर्भरता से ग्रस्त अधिकांश लोग किसी न किसी स्तर के मानसिक और संज्ञानात्मक विकार से जूझ रहे हैं।
शोधार्थी नीरज ने बताया कि इस अध्ययन में पुनर्वास केंद्रों में रह रहे शराब पर निर्भर 20 से 40 वर्ष के बीच के 100 व्यक्तियों का मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन किया गया तो पाया गया कि 70 प्रतिशत में मध्यम स्तर के मनोविकृति संबंधी लक्षण हैं। 16.25 प्रतिशत में गंभीर और 13.75 प्रतिशत में हल्के लक्षण मिले। इससे स्पष्ट होता है कि शराब का लंबे समय तक नियमित सेवन व्यक्ति की मानसिक स्थिरता को गंभीर रूप से प्रभावित करता है।
अध्ययन में यह भी सामने आया कि 100 में से 50 व्यक्तियों में याददाश्त, ध्यान, एकाग्रता और निर्णय क्षमता से जुड़े हल्के संज्ञानात्मक विकार विकसित हो चुके थे। समस्याएं धीरे-धीरे शुरू होती हैं और लंबे समय तक शराब का सेवन करने पर गंभीर रूप ले लेती हैं। यही कारण है कि कई बार व्यक्ति सामान्य जीवन, पारिवारिक जिम्मेदारियों और कार्यस्थल पर बेहतर प्रदर्शन करने में असफल होने लगता है।
शोध में शराब छोड़ने के दौरान होने वाली कठिनाइयों का भी विश्लेषण किया गया। आधे से अधिक व्यक्तियों में गंभीर विदड्राल लक्षण पाए गए, जबकि 40 प्रतिशत में मध्यम स्तर की समस्याएं दर्ज हुईं। अध्ययन के अनुसार इस दौरान कई मरीजों को भ्रम, आवाजें सुनाई देना, काल्पनिक दृश्य दिखाई देना और स्पर्श संबंधी असामान्य अनुभव जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ा।
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शोधार्थी के अनुसार अध्ययन के निष्कर्ष इस ओर भी संकेत करते हैं कि शराब पर निर्भरता का उपचार केवल दवा या डिटाक्स तक सीमित रखने से अपेक्षित परिणाम नहीं मिलेंगे। शोधार्थी का मानना है कि मनोविकार संबंधी लक्षणों की समय रहते पहचान कर उचित हस्तक्षेप किया जाए तो पुनर्वास की सफलता बढ़ाई जा सकती है।
लती व्यक्ति के लिए मानसिक जांच भी बने इलाज का हिस्सा
प्रो. विस्मिता पालीवाल के अनुसार अध्ययन मेंं सुझाव दिया गया है कि नशामुक्ति की प्रक्रिया केवल शरीर से शराब के प्रभाव को समाप्त करने तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि मानसिक मूल्यांकन, मनोवैज्ञानिक परामर्श और पुनर्वास को भी उपचार का अभिन्न हिस्सा बनाया जाना चाहिए।
शराब पर निर्भर मरीजों के उपचार में बीपीआरएस (ब्रीफ साइकियाट्रिक रेटिंग स्केल), एमएमएसई (मिनी-मेंटल स्टेट एग्जामिनेशन) व सीआईडब्लूए (क्लिनिकल इंस्टीट्यूट विड्राल असेसमेंट एल्कोहल) परीक्षणों को नियमित रूप से शामिल किया जाए। इससे गंभीर मानसिक और संज्ञानात्मक समस्याओं वाले मरीजों की समय रहते पहचान और इलाज संभव हो सकेगा।
यह अध्ययन दर्शाता है कि नशामुक्ति को केवल शारीरिक उपचार तक सीमित नहीं रखा जा सकता। मानसिक स्वास्थ्य, मनोवैज्ञानिक परामर्श और वैज्ञानिक पुनर्वास को समान महत्व देकर ही शराब पर निर्भर व्यक्तियों को स्वस्थ और सामान्य जीवन की मुख्यधारा में लौटाया जा सकता है।
प्रो. पूनम टंडन, कुलपति, दीदउ गोरखपुर विश्वविद्यालय