लंबे स्क्रीन टाइम से एकाग्रता में कमी, कमजोर हो रही बच्चों की याददाश्त
बच्चों में मोबाइल फोन के अत्यधिक उपयोग से एकाग्रता में कमी, चिड़चिड़ापन और याददाश्त कमजोर होने जैसी समस्याएं बढ़ रही हैं। गोरखपुर एम्स में हर महीने 30 ...और पढ़ें

तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीकात्मक प्रस्तुतीकरण के लिए किया गया है। जागरण
HighLights
मोबाइल के अत्यधिक उपयोग से बच्चों में एकाग्रता की कमी।
चिड़चिड़ापन, याददाश्त कमजोर होना और व्यवहार में बदलाव।
एम्स गोरखपुर में प्रतिमाह 30-40 मामले, अभिभावकों को सलाह।
जागरण संवाददाता, गोरखपुर। मोबाइल फोन जहां बच्चों की पढ़ाई और रचनात्मक गतिविधियों का माध्यम बन रहा है। वहीं इसका अत्यधिक इस्तेमाल मानसिक स्वास्थ्य के लिए चिंता का कारण बनता जा रहा है। लंबे समय तक मोबाइल फोन गेम और इंटरनेट मीडिया का उपयोग करने वाले बच्चों में एकाग्रता की कमी, चिड़चिड़ापन, पढ़ाई में मन न लगना और व्यवहार में बदलाव जैसी समस्याएं सामने आ रही हैं। एम्स में प्रतिमाह औसतन 30 से 40 मामले पहुंच रहे हैं। चिकित्सक का कहना है कि समस्या लगातार बढ़ रही है। इसलिए बच्चों के मोबाइल फोन प्रयोग पर नियंत्रण आवश्यक है।
एम्स के मनोरोग विभाग के इंचार्ज (हेड आफ डिपार्टमेंट) एसोसिएट प्रोफेसर डा. मनोज पृथ्वीराज एम ने बताया कि मोबाइल फोन का सामान्य उपयोग और उसकी लत में अंतर समझना जरूरी है। कुछ बच्चे मोबाइल का इस्तेमाल पढ़ाई और रचनात्मक कार्यों के लिए करते हैं।
कई बच्चे गेम, इंटरनेट मीडिया और मनोरंजन के लिए कई-कई घंटे मोबाइल पर बिताते हैं। ऐसे बच्चों में मोबाइल एडिक्शन और इंटरनेट एडिक्शन की समस्या देखने को मिल रही है। उन्होंने बताया कि मनोरोग विभाग में मोबाइल फोन से जुड़ी समस्याओं को लेकर बच्चों संग अभिभावक परामर्श के लिए पहुंच रहे हैं। हर महीने चाइल्डहुड डिप्रेशन और याददाश्त कमजोर होने मामले भी आ रहे हैं। इनमें अधिकांश बच्चों में कई घंटे लगातार मोबाइल इस्तेमाल करने की आदत पाई जा रही है।
डा. मनोज ने बताया कि अत्यधिक मोबाइल उपयोग करने वाले बच्चों में ध्यान केंद्रित करने की क्षमता कम हो सकती है। पढ़ाई में रुचि घटने के साथ ही चिड़चिड़ापन, भावनात्मक असंतुलन, अवसाद और एंजाइटी (चिंता या घबराहट) जैसी समस्याएं सामने आती हैं। कई बार बच्चे पहले से मौजूद मानसिक परेशानियों से बचने के लिए भी मोबाइल फोन का ज्यादा सहारा लेने लगते हैं।
उन्होंने बताया कि देर रात तक मोबाइल फोन प्रयोग करने से बच्चों की नींद प्रभावित होती है। पर्याप्त नींद न मिलने से थकान, व्यवहार में बदलाव और मानसिक तनाव बढ़ सकता है। वहीं, हिंसक या नकारात्मक सामग्री देखने से बच्चों में आक्रामकता बढ़ने की संभावना रहती है।
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अभिभावक रखें स्क्रीन टाइम पर नजर
चिकित्सक का कहना है कि मोबाइल फोन की समस्या को समझने के लिए पहले बच्चों की मनोवैज्ञानिक जांच की जाती है। इससे यह पता लगाते हैं कि मोबाइल फोन का अधिक इस्तेमाल किसी अन्य मानसिक समस्या से जुड़ा है या नहीं। इसके बाद काउंसिलिंग और आवश्यक उपचार किया जाता है।
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उनकी सलाह है कि कम उम्र के बच्चों को मोबाइल फोन देने से बचें। यदि आवश्यक है तो बच्चे क्या देख रहे हैं, इस पर नजर रखें। पैरेंटल कंट्रोल और सेफ्टी सेटिंग का उपयोग कर अनावश्यक सामग्री से बचाव किया जा सकता है।
उन्होंने कहा कि बच्चों को खेलकूद, पारिवारिक गतिविधियों और रचनात्मक कार्यों से जोड़ना जरूरी है। परिवार के सदस्य बच्चों के साथ समय बिताएं और उन्हें शारीरिक गतिविधियों के लिए प्रेरित करें। इससे बच्चों का मानसिक विकास बेहतर होगा और मोबाइल पर निर्भरता कम होगी।