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    विरासत सौंपने की पिता की जिद, 27 साल से MBBS में उलझा बेटा

    Updated: Sat, 03 Jan 2026 08:28 AM (IST)

    आगरा के एक चिकित्सक का बेटा 27 साल से एमबीबीएस की पढ़ाई में फंसा है, पिता के दबाव के कारण। 1998 में बीआरडी मेडिकल कॉलेज में दाखिला लेने वाला यह छात्र ...और पढ़ें

    पिता की ‘डाक्टरी विरासत’ का दबाव, 27 साल से एमबीबीएस में उलझा बेटा। सांकेतिक तस्वीर

    पिता की ‘डाक्टरी विरासत’ का दबाव, 27 साल से एमबीबीएस में उलझा बेटा। सांकेतिक तस्वीर

    HighLights

    1. आगरा के चिकित्सक का बेटा 27 साल से एमबीबीएस में फंसा।

    2. 1998 बैच का छात्र अब 46 वर्ष का, डिग्री का इंतजार।

    3. गोरखपुर विश्वविद्यालय ने परिणाम रोका, कॉलेज मांगेगा एनएमसी से मार्गदर्शन।

    गजाधर द्विवेदी, गोरखपुर। यह कहानी किसी संघर्ष की प्रेरक मिसाल नहीं, बल्कि पारिवारिक दबाव की त्रासदी है। आगरा के एक चिकित्सक पिता अपनी वर्षों की डॉक्टरी प्रैक्टिस और विरासत संभालने के लिए बेटे को हर हाल में डाक्टर बनाना चाहते हैं।

    उनकी इस जिद की वजह से बेटा 27 वर्षों से एमबीबीएस में उलझा है। बीआरडी मेडिकल कॉलेज के 1998 बैच का यह छात्र 19 वर्ष की उम्र में पढ़ने आया था, आज 46 वर्ष का हो चुका है। आज भी वह गौतम हाॅस्टल के 26 नंबर कमरे में बैठकर उस डिग्री का सपना देख रहा है जो उसके पिता चाहते हैं।

    चिकित्सक बनने की प्रत्याशा में उसने अब तक शादी तक नहीं की। उसके बैच के छात्र आज प्रोफेसर, वरिष्ठ चिकित्सक और मेडिकल संस्थानों के कर्ताधर्ता बन चुके हैं। इसी तरह 2009 बैच का मऊ निवासी एक छात्र एमबीबीएस पास करने के लिए संघर्ष कर रहा है। हर साल रिजल्ट आने पर शर्ट फाड़कर बाबा राघव दास की मूर्ति के पास चिल्लाता है और एक शिक्षक पर आरोप मढ़ता है कि वह उसे पास नहीं होने दे रहे।

    कुशीनगर का एक छात्र 15 वर्षों से एमबीबीएस पास करने की कोशिश कर रहा है, लेकिन सफलता अभी तक हाथ नहीं लग पाई है। वर्ष 1998, 2009 व 2010 में जब इन तीनों छात्रों ने एमबीबीएस में प्रवेश लिया था, उस समय मेडिकल शिक्षा का नियमन मेडिकल काउंसिल आफ इंडिया (एमसीआइ) के अधीन था। तब एमबीबीएस पास करने की कोई स्पष्ट अधिकतम समय-सीमा तय नहीं थी।

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    ये बार-बार असफल होते रहे, लेकिन पढ़ाई छोड़ने की उन्हें न तो इजाजत मिली और न ही हिम्मत। पारिवारिक दबाव इतना गहरा था कि हर हाल में एमबीबीएस पूरा करना ही था। बाद में मेडिकल काउंसिल आफ इंडिया की जगह नेशनल मेडिकल काउंसिल (एनएमसी) का गठन हुआ। एनएमसी ने एमबीबीएस पास करने के लिए अधिकतम 10 वर्ष की समय-सीमा निर्धारित कर दी।

    यहीं से मामला और उलझ गया। पुराने नियमों में दाखिला लेने वाले छात्र पर नए नियम लागू हों या नहीं, इस सवाल में तीनों छात्रों का भविष्य फंस गया। इस वर्ष जून में जब उन्होंने एक बार फिर फाइनल ईयर की परीक्षा दी तो पास होने की उम्मीद थी, लेकिन दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय ने नियमों का हवाला देते हुए रिजल्ट ही रोक दिया। जिस समय इन छात्रों ने बीआरडी मेडिकल कालेज में प्रवेश लिया था। उस वक्त यह गोरखपुर विश्वविद्यालय संबद्ध था।

    बीआरडी मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य डा. रामकुमार जायसवाल ने बताया कि विश्वविद्यालय ने इन छात्रों का रिजल्ट रोक दिया है। इनके मामलों में कालेज भी एनएमसी से मागदर्शन मांगेगा, क्योंकि इनके बारे में निर्णय जरूरी हो गया है।