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    ऑटो चालक ने पसीने से सींचा दो संतानों के डॉक्टर बनने का सपना, पढ़िए संघर्ष से सफलता की कहानी

    Updated: Sat, 18 Jul 2026 09:38 AM (GMT+05:30)

    गोरखपुर के ऑटो चालक हृदयनारायण गुप्ता के बेटे शिवम और बेटी आंचल ने नीट परीक्षा में सफलता हासिल कर अपने माता-पिता के त्याग और मेहनत को सार्थक किया है। ...और पढ़ें

    हृदयनारायण व किरण, बेटी आंचल व बेटे शिवम संग खुशी मनाते हुए l-जागरण

    हृदयनारायण व किरण, बेटी आंचल व बेटे शिवम संग खुशी मनाते हुए l-जागरण

    HighLights

    1. गोरखपुर के ऑटो चालक के बच्चों ने नीट परीक्षा पास की।

    2. शिवम और आंचल ने अनुशासन व कड़ी मेहनत से सफलता पाई।

    3. माता-पिता के त्याग और कर्ज ने बच्चों को डॉक्टर बनाया।

    आशुतोष मिश्र, गोरखपुर। आटो चलाने वाले हृदयनारायण गुप्ता के लिए शहर आकर यहां किराए के घर में गृहस्थी बसाना और दो बच्चों को डाक्टरी की तैयारी कराना, आसान न था। लेकिन, उन्होंने बच्चों के सपनों की कीमत कभी पैसों से नहीं आंकी। अपनी जरूरतें पीछे छोड़ इस पिता ने अपने पसीने से संतानों के सपनों को सींचा। पत्नी किरण ने घर के हर खर्च में कटौती की और बेटे शिवम व बिटिया आंचल की पढ़ाई को सबसे ऊपर रखा। नीट का परिणाम आया, तो दोनों बच्चों की सफलता का शोर हो गया।

    नीट-2026 में बेटे शिवम गुप्ता ने दूसरे प्रयास में अखिल भारतीय स्तर पर 7522वीं रैंक और बेटी आंचल गुप्ता ने तीसरे प्रयास में 9037वीं रैंक हासिल की। कुछ महीने पहले जब नीट परीक्षा निरस्त हुई थी तो दोनों भाई-बहन टूट गए थे। महीनों की मेहनत बेकार होती नजर आई, लेकिन तब माता-पिता ने ही उन्हें संभाला। समझाया कि मेहनत कभी व्यर्थ नहीं जाती। वही भरोसा अंतत: सफलता बनकर लौटा।

    2011 में गगहा के मझगावा गांव से पैतृक घर छोड़कर शहर के कजाकपुर मोहल्ले में आ बसे हृदयनारायण गुप्ता बताते हैं कि 26 जून को शायद वर्षों बाद अपने लिए नए कपड़े खरीदे थे। वजह थी नए घर का गृहप्रवेश। उससे पहले उन्हें यह भी याद नहीं था कि आखिरी बार अपने लिए कब कुछ खरीदा था। जिस पिता के लिए अपनी जरूरतें हमेशा सबसे आखिर में रहीं, उसी के घर अब दो-दो डाक्टर बनने का सपना आकार ले रहा है।

    प्रति माह औसतन 18 हजार रुपये कमाने वाले हृदयनारायण के इस सफर में सिर्फ पसीना ही नहीं बहा, कर्ज भी बढ़ता गया। शिवम और आंचल की कोचिंग पर करीब 2.80 लाख रुपये खर्च हुए। इसके लिए बहन और अन्य रिश्तेदारों से उधार लेना पड़ा। राप्ती किनारे लहसड़ी क्षेत्र में गांव की जमीन बेचकर छोटा-सा मकान बनवाया, वहां भी कर्ज लेना पड़ा। आज हृदयनारायण करीब आठ लाख रुपये के कर्ज तले हैं, लेकिन बच्चों की सफलता ने इस बोझ को हल्का कर दिया है। वह इसे राधारानी की कृपा मानते हैं।

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    आंचल और शिवम बताते हैं कि सफलता का सबसे बड़ा मंत्र अनुशासन है। मोबाइल फोन सिर्फ पढ़ाई के लिए इस्तेमाल किया। इंटरनेट मीडिया से दूरी बनाई। सुबह सिविल लाइंस स्थित कोचिंग और फिर देर रात तक स्वाध्याय। भाई-बहन एक-दूसरे की कमियां बताते, कठिन विषयों पर चर्चा करते और हर दिन खुद को पहले से बेहतर बनाने की कोशिश करते।

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    आंचल की आंखें उस वक्त भर आती हैं, जब वह पिता की बात करती हैं। कहती हैं, 'जब पापा दिनभर आटो चलाकर लौटते थे तो चेहरे पर थकान जरूर होती थी, लेकिन आंखों में हमारे भविष्य का सपना भी साफ दिखाई देता था। उसी सपने ने हमें कभी हार नहीं मानने दी। हमने तय कर लिया था कि पापा की मेहनत बेकार नहीं जाने देंगे।'

    शिवम मुस्कराते हुए कहते हैं, 'दो साल में शायद मुझे यह भी याद नहीं कि मैंने अपने लिए नए कपड़े कब खरीदे थे। जरूरत ही महसूस नहीं हुई। लक्ष्य सिर्फ एक था-डाक्टर बनना।' यह सुन मां किरण गुप्ता की आंखों में आंसू आ जाते हैं, लेकिन यह संघर्ष के नहीं, संतोष के आंसू हैं। वह बस इतना कहती हैं, 'बच्चों की सफलता ने हमारे सारे दुख छोटे कर दिए।'