गोरखपुर : BJP पार्षद ज्ञानती देवी को हाईकोर्ट से बड़ी राहत, चुनाव रद करने के आदेश पर रोक; अब 15 सितंबर को होगी सुनवाई
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गोरखपुर की पार्षद ज्ञानती देवी के निर्वाचन को शून्य घोषित करने वाले आदेश के क्रियान्वयन पर रोक लगा दी है। इस अंतरिम आदेश से ज्ञान ...और पढ़ें
-1786188170170_m.webp)
इलाहाबाद हाईकोर्ट।
HighLights
हाईकोर्ट ने पार्षद ज्ञानती देवी के निर्वाचन रद्द करने पर रोक लगाई।
निर्वाचन ट्रिब्यूनल के 23 जुलाई के आदेश के क्रियान्वयन पर रोक प्रभावी।
मामले की अगली सुनवाई 15 सितंबर को निर्धारित की गई है।
जागरण संवाददाता, गोरखपुर। नगर निगम के शाहपुर वार्ड की पार्षद ज्ञानती देवी को इलाहाबाद हाईकोर्ट से बड़ी राहत मिली है। हाईकोर्ट ने उनके निर्वाचन को शून्य घोषित करने वाले निर्वाचन ट्रिब्यूनल के आदेश के क्रियान्वयन पर अगले आदेश तक रोक लगा दी है।
23 जुलाई को अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश/फास्ट ट्रैक कोर्ट (महिलाओं के विरुद्ध अपराध), गोरखपुर ने ज्ञानती देवी का वार्ड सदस्य के रूप में निर्वाचन शून्य घोषित किया था। हाईकोर्ट के आदेश के बाद फिलहाल उस फैसले का क्रियान्वयन नहीं होगा। मामले की अगली सुनवाई 15 सितंबर को होगी।
मुख्य न्यायाधीश अरुण भंसाली और न्यायमूर्ति क्षितिज शैलेंद्र की खंडपीठ ने ज्ञानती देवी की ओर से दाखिल प्रथम अपील संख्या 658/2026 पर सुनवाई के बाद यह अंतरिम आदेश दिया। अदालत ने निर्वाचन ट्रिब्यूनल के 23 जुलाई के आदेश के संचालन पर अगले आदेश तक रोक लगाई है।
ज्ञानती देवी को बताया पार्टी की अधिकृत प्रत्याशी
मामले में विवाद नामांकन से जुड़े दस्तावेज में पति के नाम की कथित त्रुटि को लेकर उठा था। हाईकोर्ट में ज्ञानती देवी की ओर से दलील दी गई कि राजनीतिक दल द्वारा जारी फॉर्म-7ए में उनके पति का नाम ‘परशुराम’ के बजाय ‘श्यामलाल’ दर्ज हो गया था। अपीलकर्ता के अधिवक्ताओं ने अदालत को बताया कि फॉर्म तैयार करने वाले गवाह और तत्कालीन महानगर अध्यक्ष राजेश कुमार गुप्ता ने स्पष्ट रूप से कहा था कि ज्ञानती देवी ही पार्टी की अधिकृत प्रत्याशी थीं।
खबरें और भी
अपील में यह भी बताया गया कि राजनीतिक दल की ओर से जारी प्रत्याशियों की सूची में वार्ड संख्या 43 के लिए ज्ञानती देवी और उनके पति का नाम स्पष्ट रूप से दर्ज था। वहीं वार्ड संख्या 44 में प्रत्याशी के पिता का नाम श्यामलाल था। इसी वजह से फॉर्म-7ए तैयार करते समय नाम दर्ज करने में त्रुटि हुई।
संपत्ति का ब्योरा न देने के निष्कर्ष को भी दी चुनौती
ज्ञानती देवी की अपील में निर्वाचन ट्रिब्यूनल के उस निष्कर्ष पर भी सवाल उठाया गया, जिसमें कुछ संपत्तियों का विवरण कथित तौर पर नहीं दिए जाने को अनुचित प्रभाव अथवा भ्रष्ट आचरण से जोड़ा गया था। अपीलकर्ता की ओर से तर्क दिया गया कि केवल संपत्ति का विवरण नहीं देने के आधार पर निर्वाचन को निरस्त नहीं किया जा सकता। इसके लिए यह साबित करना जरूरी है कि कथित कमी का चुनाव परिणाम पर वास्तविक और महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ा।
अधिवक्ता अखिल कुमार सिंह ने बताया कि सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के हालिया अजमेरा श्याम बनाम कोवा लक्ष्मी मामले का भी हवाला दिया गया। दलील दी गई कि संपत्ति का खुलासा न करने की कमी कितनी महत्वपूर्ण है, इसका निर्धारण निर्वाचन न्यायाधिकरण को करना होता है और केवल गैर-प्रकटीकरण अपने आप में निर्वाचन रद्द करने का पर्याप्त आधार नहीं है।
यह भी पढ़ें- यूपी में 15 अगस्त से पहले e-KYC कराना जरूरी, वरना तीन गुना महंगे दाम पर मिलेगा LPG सिलिंडर
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने मामले को 15 सितंबर को अगली सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया है। तब तक निर्वाचन ट्रिब्यूनल के 23 जुलाई के आदेश के क्रियान्वयन पर रोक प्रभावी रहेगी।
हाईकोर्ट के आदेश से हमें न्यायिक प्रक्रिया पर भरोसा और मजबूत हुआ है। हम न्यायालय के आगामी निर्णय का सम्मान करेंगे। हमारा विश्वास है कि पूरे मामले का अंतिम निस्तारण तथ्यों और कानून के आधार पर होगा। -चंद्रशेखर सिंह, पूर्व उप सभापति व पुत्र ज्ञानती देवी