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दीपावली पर गोरखपुर की इन बेटियों का कमाल, पिता के हुनर को दे रहीं नया आयाम

Published: Fri, 06 Nov 2026 10:20 AM (IST)

गोरखपुर में दीपावली के लिए मां लक्ष्मी की प्रतिमाओं को अंतिम रूप दिया जा रहा है। खुर्रमपुर में एक परिवार ...और पढ़ें

बचपन में पिता को देखकर सीखी मूर्तिकला अब बनी पहचान। जागरण

बचपन में पिता को देखकर सीखी मूर्तिकला अब बनी पहचान। जागरण

HighLights

  1. बेटियां पिता से सीखकर बना रहीं लक्ष्मी प्रतिमाएं।

  2. सोनम चेहरे, संध्या साड़ी और शिवानी हाथ-पैर बनाती हैं।

  3. बिना औपचारिक प्रशिक्षण के मूर्तिकला में माहिर हुईं बेटियां।

संगम दूबे, गोरखपुर। दीपावली की आहट के साथ शहर में मां लक्ष्मी की प्रतिमाओं को अंतिम रूप देने की तैयारी चल रही है। कहीं मिट्टी को आकार दिया जा रहा है तो कहीं प्रतिमाओं के रंग-रूप को निखारा जा रहा है। इसी बीच बेतियाहाता से सटे खुर्रमपुर में एक परिवार ऐसा भी है, जहां मूर्तिकला की विरासत पिता से बेटियों तक पहुंची है।

यहां मां लक्ष्मी की प्रतिमाएं सिर्फ पिता के हाथों से नहीं, बल्कि उनकी तीन बेटियों के हुनर और मेहनत से भी आकार लेती हैं। खास बात यह है कि इन बेटियों ने मूर्तिकला का कोई औपचारिक प्रशिक्षण नहीं लिया। बचपन में पिता को मूर्तियां बनाते देखते-देखते यह कला सीखी और आज अपने-अपने काम में इतनी दक्ष हो गई हैं कि प्रतिमा निर्माण में उनकी अलग पहचान बन गई है।

परिवार की बड़ी बेटी सोनम शादीशुदा हैं, लेकिन पिता की कला और मायके से जुड़ाव उन्हें हर साल खुर्रमपुर खींच लाता है। वह दशहरे के आसपास अपने ससुराल से मायके पहुंच जाती हैं और दीपावली से लेकर छठ तक पिता के साथ मूर्तियां बनाने में जुटी रहती हैं। प्रतिमाओं के चेहरे गढ़ना उनकी खासियत है। मां लक्ष्मी की आंखों की बनावट हो या चेहरे पर सौम्यता और आकर्षण उकेरना, इस बारीक काम में सोनम को महारत हासिल है। बचपन से पिता के साथ काम करते हुए उन्होंने चेहरे बनाने की बारीकियां सीखी हैं।

दूसरी बेटी संध्या की जिम्मेदारी प्रतिमाओं को पारंपरिक रूप-सज्जा देने की है। वह मां लक्ष्मी की प्रतिमाओं को साड़ी पहनाने और उनके वस्त्रों को करीने से सजाने का काम करती हैं। वहीं छोटी बेटी शिवानी प्रतिमाओं के हाथ-पैर तैयार करने के साथ उन्हें अंतिम आकार देने में पिता का हाथ बंटाती हैं। इस तरह परिवार की तीनों बहनों ने मूर्ति निर्माण के अलग-अलग हिस्सों को अपनी दक्षता बना लिया है।

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इस परिवार की खासियत यह भी है कि यहां बेटियों ने किसी संस्थान में जाकर मूर्तिकला नहीं सीखी। पिता को मिट्टी से प्रतिमाएं बनाते देखना, उनके काम को समझना और लगातार अभ्यास करना ही उनकी पाठशाला रहा। धीरे-धीरे यह शौक हुनर में बदला और अब दीपावली आते ही तीनों बहनें पिता के साथ मिलकर प्रतिमा निर्माण में जुट जाती हैं। उनके हाथों से तैयार मां लक्ष्मी की प्रतिमाएं शहर के विभिन्न हिस्सों में पहुंचती हैं।

त्योहार के इस मौसम में जहां बाजार में तरह-तरह की प्रतिमाओं की मांग है, वहीं खुर्रमपुर के इस परिवार की कार्यशाला में कला के साथ रिश्तों की गर्माहट भी आकार ले रही है। बेटियां केवल पिता के काम में सहयोग नहीं कर रहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही पारंपरिक मूर्तिकला को अपने हुनर से आगे भी बढ़ा रही हैं।

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