'संघ सत्ता और प्रभाव का आकांक्षी नहीं, समाज संगठन ही ध्येय', मोहन भागवत ने जन गोष्ठी को किया संबोधित
मोहन भागवत ने गोरखपुर में कहा कि संघ एक स्वायत्त संगठन है, जो राष्ट्र को समर्पित है, सत्ता या प्रभाव का आकांक्षी नहीं। उन्होंने स्पष्ट किया कि संघ का ...और पढ़ें

मोहन भागवत ने प्रमुख जन गोष्ठी को किया संबोधित।

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
जागरण संवाददाता, गोरखपुर। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने कहा है कि संघ एक स्वायत्त, स्वतंत्र और स्वावलंबी संगठन है, जो स्वयं के लिए नहीं बल्कि राष्ट्र के लिए समर्पित है। उन्होंने स्पष्ट किया कि संघ किसी परिस्थिति विशेष की प्रतिक्रिया नहीं है, न ही उसका किसी से विरोध या स्पर्धा है।
सत्ता, प्रभाव या लोकप्रियता संघ का लक्ष्य नहीं, बल्कि समाजहित इसका मूल उद्देश्य है। मोहन भागवत रविवार को योगिराज बाबा गंभीरनाथ प्रेक्षागृह में संघ की ओर से आयोजित प्रमुख जन गोष्ठी को संबोधित कर रहे थे।
बाइबिल के पंक्ति 'आई हैव कम टू फुलफिल, नाट फार डिस्ट्राय' का उल्लेख करते हुए संघ प्रमुख ने कहा कि संघ किसी को नष्ट करने नहीं, बल्कि समन्वय और पूरकता के भाव से कार्य करने आया है।
इस क्रम में सरसंघचालक ने भारत की स्वतंत्रता के संदर्भ में चार वैचारिक धाराओं का जिक्र किया। पहली क्रांति की धारा, जो सशस्त्र संघर्ष के माध्यम से स्वतंत्रता चाहती थी और जिसका प्रतिनिधित्व सुभाष चंद्र बोस तक दिखाई देता है।

दूसरी धारा राजनीतिक जागरण की थी, जो समाज में चेतना निर्माण पर बल देती थी। तीसरी धारा आधुनिक ज्ञान-विज्ञान व समाज सुधार की थी, जिसमें राजा राममोहन राय जैसे प्रयास शामिल रहे, किंतु वह समाज से व्यापक रूप से नहीं जुड़ सकी।
चौथी धारा मूल सांस्कृतिक आधारों की ओर लौटने की थी, जिसका नेतृत्व स्वामी विवेकानंद और स्वामी दयानंद सरस्वती ने किया। भागवत ने कहा कि इन सभी धाराओं से केशव बलिराम हेडगेवार का संपर्क रहा। उन्होंने स्वतंत्रता के साथ-साथ राष्ट्र को स्थायी रूप से सशक्त बनाने के लिए 1925 में विजयादशमी के दिन संघ कार्य का प्रारंभ किया।
खबरें और भी
'देश में रहने वाला प्रत्येक व्यक्ति सांस्कृतिक अर्थ में हिंदू है'
मोहन भागवत ने कहा कि संघ हिंदू समाज की बात इसलिए करता है क्योंकि इस देश में रहने वाला प्रत्येक व्यक्ति सांस्कृतिक अर्थ में हिंदू है। हिंदू कोई संकीर्ण संज्ञा नहीं, बल्कि जीवन दृष्टि का विशेषण है, जो विविधता में एकता और समन्वय का मार्ग दिखाता है। हिंदू समाज मानता है कि हमारा रास्ता भी ठीक है और तुम्हारा भी।
वास्तव में हिंदू शब्द एक संज्ञा नहीं, बल्कि व्याकरण की दृष्टि से एक विशेषण है, जो गुणधर्म बताता है जो सबको एक साथ चलाता है। चूंकि यह हिन्दू नाम भारत के साथ स्थापित हो गया है, इसलिए हिंदू नाम से ही सनातन जगेगा। जो भूल गए है कि हम हिंदू है, उन्हें याद दिलाना है कि आप हिंदू हो, जिससे हिंदू समाज खड़ा हो सके।

संघ प्रमुख ने समाज को सहिष्णुता, समरसता और परस्पर हित के भाव से चलाने पर बल दिया और कहा कि भारतीय संस्कृति का मूल तत्व स्वार्थ नहीं, परमार्थ है। कार्यक्रम में प्रांत संघचालक डा. महेंद्र अग्रवाल, गोरखपुर विश्वविद्यालय के विधि विभाग के अध्यक्ष प्रो. चंद्रशेखर आदि मौजूद रहे। प्रांत कार्यवाह विनय ने अतिथि परिचय करवाया और प्रांत बौद्धिक प्रमुख डा. अरविंद सिंह ने गोष्ठी की प्रस्ताविकी रखी।
भारतीय ज्ञान परंपरा को बताया दुनिया का मार्गदर्शक
संघ प्रमुख मोहन भागवत ने भारतीय ज्ञान परंपरा को दुनिया का मार्गदर्शक बताया। कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा पर आधारित चिंतन ही विश्व को सुख और शांति का मार्ग दिखा सकता है। उन्होंने कहा कि आज दुनिया के पास सामाजिक संतुलन का कोई समग्र माडल नहीं है, इसलिए विश्व आशा भरी दृष्टि से भारत की ओर देख रहा है।
उन्होंंने कहा कि भारतवर्ष में पाश्चात्य चिंतन का प्रभाव पड़ने लगा था, जिसने भारतीय ज्ञान परंपरा को खंडित करने का प्रयत्न किया और अपने चिंतन को स्थापित करने का प्रयास किया। लेकिन उनकी चिंतन पद्धति अधूरी थी।
उन्होंने कहा कि संघ की दृष्टि पूर्णत: भारतीय चिंतन पद्धति से विकसित हुई है और समाज की बढ़ती अपेक्षाओं के बीच संघ ने व्यापक समाज संपर्क का निर्णय लिया है।
संघ शताब्दी वर्ष के आयोजनों की चर्चा के क्रम में भागवत ने ‘पंच परिवर्तन’ को महत्वपूर्ण बताया। कहा कि उसको आधार बनाकर सशक्त समाज निर्माण का लक्ष्य रखा गया है।
यह भी पढ़ें- मोहन भागवत 17 फरवरी को ट्रेन से आएंगे लखनऊ, स्टेशन पर सुरक्षा के कड़े इंतजाम
यह भी पढ़ें- भारत के आर्थिक विकास में पशु चिकित्सकों की अहम भूमिका, मोहन भागवत का बयान