गोरखपुर के मां तरकुलहा देवी धाम से जुड़ी 1857 की क्रांति, अमर शहीद बंधू सिंह से है पहचान
गोरखपुर का मां तरकुलहा देवी मंदिर आस्था के साथ-साथ 1857 की क्रांति के अमर बलिदानी बाबू बंधू सिंह की देशभक्ति ...और पढ़ें

मां तरकुलहा देवी मंदिर। जागरण
HighLights
मां तरकुलहा देवी मंदिर का 1857 क्रांति से गहरा संबंध।
अमर बलिदानी बाबू बंधू सिंह की वीरता और बलिदान का प्रतीक।
गोरखपुर में आस्था का केंद्र, चैत्र रामनवमी मेला लगता है।
विवेक शुक्ला, गोरखपुर। पूर्वांचल में आस्था के प्रमुख केंद्रों की चर्चा हो और मां तरकुलहा देवी मंदिर का नाम न आए, ऐसा कम ही होता है। गोरखपुर से करीब 22 किलोमीटर दूर देवरिया मार्ग पर स्थित यह मंदिर केवल धार्मिक आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि स्वतंत्रता संग्राम की एक ऐतिहासिक कहानी का भी साक्षी है। यहां की मान्यताएं 1857 की क्रांति के अमर बलिदानी बाबू बंधू सिंह से जुड़ी हैं। यही वजह है कि मंदिर में दर्शन करने आने वाले श्रद्धालुओं के लिए यह स्थान आस्था के साथ देशभक्ति की स्मृतियों को भी जीवंत करता है।
मंदिर के इतिहास के अनुसार, वर्तमान मंदिर क्षेत्र कभी घने जंगलों से घिरा हुआ था। इसी इलाके में डुमरी रियासत के बाबू बंधू सिंह रहा करते थे। वह तरकुल के पेड़ के नीचे स्थापित पिंडियों की पूजा करते थे। मां तरकुलहा देवी को वह अपनी इष्ट देवी मानते थे। समय के साथ यह स्थान श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र बन गया। आज मंदिर की पहचान मां के दर्शन और यहां से जुड़ी ऐतिहासिक मान्यताओं के कारण दूर-दूर तक है।
अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष करते थे बंधू सिंह
मां तरकुलहा देवी मंदिर का इतिहास 1857 के स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ा है। स्थानीय मान्यताओं और प्रचलित ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, बाबू बंधू सिंह अंग्रेजी शासन के खिलाफ संघर्ष करते थे। वह गुरिल्ला युद्ध की रणनीति अपनाकर अंग्रेजों को चुनौती देते थे। कहा जाता है कि अंग्रेजों के खिलाफ अपने संघर्ष के दौरान वह मां के चरणों में शत्रुओं की बलि चढ़ाते थे। इससे अंग्रेज अधिकारी उनसे भयभीत रहते थे। बाद में अंग्रेजों ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया।
फांसी से जुड़ी है रोचक लोकमान्यता
मंदिर से जुड़ी सबसे चर्चित मान्यताओं में बाबू बंधू सिंह को फांसी दिए जाने की कहानी शामिल है। प्रचलित कथा के अनुसार, अंग्रेजों ने उन्हें फांसी देने की कोशिश की, लेकिन कई बार फंदा टूट गया। मान्यता है कि मां के प्रति उनकी आस्था के कारण ऐसा हुआ। अंततः उन्होंने मां से प्रार्थना की कि उन्हें बलिदान देने की अनुमति दें। इसके बाद उन्हें फांसी दे दी गई। उपलब्ध ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, 12 अगस्त 1857 को गोरखपुर के अलीनगर चौराहे पर उन्हें सार्वजनिक रूप से फांसी दी गई थी। मंदिर परिसर में उनके सम्मान में स्मारक भी बना है।
मां तरकुलहा देवी मंदिर में वर्षभर श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं। चैत्र रामनवमी के अवसर पर यहां एक महीने तक चलने वाला मेला लगता है। इस दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। मंदिर में पूजा-अर्चना के साथ मुंडन और जनेऊ जैसे धार्मिक संस्कार भी कराए जाते हैं। यह मेला आसपास के क्षेत्रों के लोगों के लिए धार्मिक आयोजन के साथ मेल-मिलाप का अवसर भी बनता है। नवरात्र में भी मंदिर में श्रद्धालुओं की आवाजाही बढ़ जाती है।
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कैसे पहुंचें मां तरकुलहा देवी मंदिर
मां तरकुलहा देवी मंदिर गोरखपुर-देवरिया मार्ग पर स्थित है। गोरखपुर शहर से सड़क मार्ग के जरिए यहां पहुंचा जा सकता है। मंदिर के मुख्य मार्ग तक पहुंचने के बाद आगे जाने के लिए स्थानीय साधनों का उपयोग किया जा सकता है।
मां तरकुलहा देवी मंदिर की खासियत यह है कि यहां धार्मिक आस्था और स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ी स्मृतियां एक साथ मिलती हैं। एक ओर श्रद्धालु मां के दर्शन के लिए आते हैं, तो दूसरी ओर बाबू बंधू सिंह की वीरता और बलिदान की कहानी इस स्थान को ऐतिहासिक महत्व प्रदान करती है।
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