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चार सितंबर को मनेगी कृष्ण जन्माष्टमी, रोहिणी नक्षत्र में होगा कान्हा का जन्मोत्सव

Updated: Sun, 30 Aug 2026 05:51 PM (IST)

हापुड़ में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का पर्व चार सितंबर को मनाया जाएगा, जिसमें अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र के संयोग से ...और पढ़ें

4 सितंबर को मनेगी श्री कृष्ण जन्माष्टमी।

4 सितंबर को मनेगी श्री कृष्ण जन्माष्टमी।

HighLights

  1. जन्माष्टमी पर्व चार सितंबर को मनाया जाएगा।

  2. अष्टमी-रोहिणी नक्षत्र के संयोग से 'जयंती' योग।

  3. रात 11:54 से 12:42 बजे तक पूजन श्रेष्ठ।

जागरण संवाददाता, हापुड़। श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का पर्व इस बार चार सितंबर शुक्रवार को मनाया जाएगा। अष्टमी तिथि के साथ रोहिणी नक्षत्र के संयोग से ‘जयंती’ नामक शुभ योग बन रहा है। ज्योतिषाचार्यों के अनुसार यह संयोग जन्माष्टमी व्रत और भगवान श्रीकृष्ण के बाल स्वरूप के पूजन के लिए विशेष माना गया है। स्मार्त और वैष्णव दोनों संप्रदायों के श्रद्धालु चार सितंबर को निर्जला अथवा सजला व्रत रखेंगे।

भारतीय ज्योतिष कर्मकांड महासभा के अध्यक्ष ज्योतिर्विद पं. केसी पांडेय काशी वाले ने श्रीमद्भागवत, महाभारत, भविष्य पुराण, अग्नि पुराण, निर्णयसिंधु और धर्मसिंधु आदि ग्रंथों का उल्लेख करते हुए बताया कि भगवान श्रीकृष्ण का जन्म द्वापर युग में भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मध्यरात्रि में रोहिणी नक्षत्र में हुआ था।

उन्होंने बताया कि इस बार भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि तीन सितंबर की देर रात 2:25 बजे से शुरू होकर चार सितंबर की देर रात 12:13 बजे तक रहेगी। वहीं रोहिणी नक्षत्र तीन सितंबर की रात 12:29 बजे से शुरू होकर चार सितंबर की रात 11:04 बजे तक रहेगा। सूर्योदय से लेकर अर्धरात्रि तक तिथि-नक्षत्र का संयोग मिलने के कारण चार सितंबर को ही जन्माष्टमी व्रत और भगवान श्रीकृष्ण के बाल स्वरूप का पूजन किया जाएगा।

अष्टमी-रोहिणी का संयोग ‘जयंती’

पं. पांडेय ने भविष्य पुराण का उल्लेख करते हुए बताया कि अष्टमी तिथि यदि रोहिणी नक्षत्र से युक्त हो तो उसे ‘जयंती’ कहा जाता है। शास्त्रों में इस योग में उपवास और भगवान श्रीकृष्ण के पूजन को विशेष फलदायी बताया गया है। अग्नि पुराण में भी भाद्रपद कृष्ण पक्ष की रोहिणी नक्षत्रयुक्त अष्टमी पर व्रत रखकर भगवान श्रीकृष्ण का पूजन करने का उल्लेख है।

उन्होंने निर्णयसिंधु के संदर्भ का हवाला देते हुए कहा कि त्रेता, द्वापर और सतयुग में भी रोहिणी से युक्त अष्टमी पर विद्वानों द्वारा उपवास किए जाने का उल्लेख मिलता है। इसलिए चार सितंबर को जन्माष्टमी व्रत रखना शास्त्रसम्मत है।

रात 11:54 से 12:42 बजे तक पूजन

जन्माष्टमी के मुख्य पूजन के लिए चार सितंबर की रात 11:54 बजे से 12:42 बजे तक का समय श्रेष्ठ बताया गया है। इस दौरान स्थिर लग्न, शुभ चौघड़िया और वज्र योग का संयोग रहेगा। व्रती पूजन के बाद तिथि और नक्षत्र की समाप्ति के अनुसार व्रत का पारण कर सकते हैं।

कान्हा को चढ़ाएं माखन-मिश्री

जन्माष्टमी पर भगवान श्रीकृष्ण को पीले और नीले रंग के वस्त्र अर्पित करने के साथ मोरपंखयुक्त मुकुट और बांसुरी भेंट करने की परंपरा है। पं. पांडेय के अनुसार भगवान को मिश्री युक्त माखन का भोग विशेष रूप से प्रिय माना जाता है। इसके अलावा सफेद और पीले रंग के मिष्ठान का भोग भी लगाया जा सकता है। जन्माष्टमी के अगले दिन पांच सितंबर शनिवार को नंदोत्सव और दही हांडी का आयोजन किया जाएगा।

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