देश सेवा की अनूठी मिसाल है कारगिल बलिदानी हसन अली का परिवार, बेटे के बाद बेटी भी पहनेगी सेना की वर्दी!
कारगिल शहीद हसन अली के परिवार ने 27 साल बाद भी देश सेवा की मिसाल कायम रखी है, उनकी पत्नी ने बेटे को सेना में भेजा और अब बेटी को भी तैयार कर रही हैं। ह ...और पढ़ें

कारगिल के बलिदानी वीर हसन अली।
HighLights
शहीद हसन अली की पत्नी ने बेटे को सेना में भर्ती कराया।
अब बेटी को भी सेना में भेजने की तैयारी कर रही हैं।
शहीद परिवार आज भी मूलभूत सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहा।
जागरण संवाददाता, हाथरस। कारगिल युद्ध में सर्वोच्च बलिदान देने वाले सादाबाद क्षेत्र के वीर सपूत हसन अली की शहादत के 27 वर्ष बाद भी उनका परिवार देशभक्ति की मिसाल बना हुआ है। पति की शहादत के बाद जहां रीमा बेगम ने बेटे आबू हसन को सेना में भर्ती कर देश सेवा के लिए समर्पित कर दिया, वहीं अब बेटी को भी सेना में भेजने की तैयारी कर रही हैं।दूसरी ओर विडंबना यह है कि शहीद परिवार आज भी मूलभूत सुविधाओं के लिए प्रशासन की ओर देख रहा है।
सादाबाद क्षेत्र की ग्राम पंचायत कंजौली के मजरा नगला कल्हू निवासी अशरफ अली के पुत्र हसन अली का जन्म एक जनवरी 1978 को हुआ था।
कारगिल वीर हसन अली की पत्नी रीमा बेगम बोलीं देश से बढ़कर कुछ नहीं
साधारण परिवार से होने के बावजूद बचपन से ही उनके मन में सेना में भर्ती होकर देश सेवा करने का सपना था। वर्ष 1997 में उनका चयन 22 ग्रेनेडियर्स में हुआ। कारगिल युद्ध छिड़ने पर वह अपनी टुकड़ी के साथ मोर्चे पर पहुंचे और कई दिनों तक दुश्मनों से डटकर मुकाबला किया। सेना के अधिकारियों के अनुसार उन्होंने अदम्य साहस का परिचय देते हुए कई दुश्मनों को ढेर किया और तीन जुलाई 1999 को मातृभूमि की रक्षा करते हुए वीरगति प्राप्त की।
शहादत के बाद नहीं टूटा परिवार, और मजबूत हुआ हौसला
रीमा बेगम बताती हैं कि पति की शहादत ने परिवार को तोड़ा नहीं, बल्कि देश सेवा का संकल्प और मजबूत कर दिया। उन्होंने बेटे आबू हसन को सेना में भर्ती कराया और अब बेटी को भी सेना की वर्दी पहनाने का लक्ष्य लेकर तैयारी करवा रही हैं। उनका कहना है कि देश की रक्षा करना परिवार की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है और वह चाहती हैं कि उनकी अगली पीढ़ी भी इसी परंपरा को आगे बढ़ाए।
घोषणाएं अधूरी, सुविधाओं का इंतजार
शहीद हसन अली के भाई और माता-पिता आज भी गांव में रहते हैं। परिवार का कहना है कि शहीद गेट और शहीद पार्क बनाने की घोषणाएं अब तक पूरी नहीं हो सकीं। शहीद स्मारक पर पेयजल की व्यवस्था नहीं है और घर के सामने आज तक खरंजा भी नहीं बन सका। कई बार अधिकारियों से शिकायत करने के बावजूद समस्याएं जस की तस बनी हुई हैं।
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परिवार का संदेश, देश सबसे पहले
रीमा बेगम कहती हैं कि पति ने देश के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया था। उसी प्रेरणा से बेटे को सेना में भेजा और अब बेटी भी सेना में जाकर देश की सेवा करे, यही उनकी सबसे बड़ी इच्छा है। उनके अनुसार शहीद परिवारों का सम्मान केवल शब्दों से नहीं, बल्कि उनके सम्मान और सुविधाओं का ध्यान रखकर भी किया जाना चाहिए।