यूपी के इस जिले में 150 साल पुराना 'शैतान का गोबर' बिजनेस, हर घर की है पहली पसंद
हाथरस का हींग व्यापार 150 साल पुराना है, जिसमें 100 से अधिक फैक्ट्रियां सालाना 100 करोड़ रुपये से अधिक का कारोबार करती हैं और हजारों लोगों को रोजगार देती हैं।

हाथरस की हींग।
HighLights
हाथरस में हींग का 150 साल पुराना व्यापार
100 करोड़ रुपये से अधिक का सालाना कारोबार
'एक जिला एक उत्पाद' योजना में शामिल हींग
अभिषेक सक्सेना, आगरा। हाथरस की हींग का तड़का खाने को आम से खास बना देता है। हाथरस की पहचान सदियों से हींग, मसालों और पीतल के दीयों से रही है। पूरे भारत में उपयोग होने वाली हींग का एक बड़ा हिस्सा हाथरस से ही आपूर्ति किया जाता है। यहां के उद्यमियों ने मसालों और नमकीन के क्षेत्र में भी बड़ी प्रगति की है, और अब यहां के उत्पादों की मांग अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ रही है। आज इस रिपोर्ट में बात कर रहे हैं हाथरस की हींग के बारे में, जानते हैं इस बिजनेस की हिस्ट्री और अंग्रेजों से जुड़ी एक रोचक जानकारी...
150 साल से हाथरस में है बिजनेस
हाथरस जिले में हींग का बिजनेस 150 साल पुराना है, यहां एक सैकड़ा हींग की फैक्ट्री हैं, जिनमें हजारों कारीगरों को रोजगार मिल रहा है। अंग्रेजी में हींग को 'Asafoetida' कहते हैं, जो पारसी के शब्द Asa (मतलब गोंद) और लैटिन के Foetida (मतलब तेज गंध) से मिलकर बना है।
हींग की महक या गंध इतनी तेज होती है कि अगर हाथ में लग जाए तो चाहे जितना धो लें, यह लंबे समय तक बनी रहती है। यानि इस मसाले की महक इतनी तीखी है कि जब अंग्रेजों ने इसके बारे में जाना तो इसे "Devil's Dung" यानी "शैतान का गोबर" कहा।
हींग की रोचक जानकारी
एक रोचक जानकारी यह भी है कि हींग हम जैसा खाते हैं उस रूप में नहीं होता है। शुद्ध हींग को अगर हम जीभ पर रख लें तो जलन शुरू हो जाएगी। इसलिए आम इंसान प्रोसेस्ड हींग ही खा सकते हैं। हाथरस जिले में 100 से अधिक हींग की फैक्ट्रियों से 100 करोड़ रुपये से अधिक का सालाना कारोबार है।
यहां पाया जाता है हींग का पौधा
हींग का पौधा प्रमुख रूप से ठंडे प्रदेशों में पाया जाता है। इसके अलावा कुछ-कुछ यह औसतन कम ठंडे प्रदेशों में भी पाया जाता है। जैसे ईरान-सूडान। वैसे तो यह प्रमुख रूप से अफगानिस्तान, ताजिकिस्तान और उज्बेकिस्तान में होता है। यहां यह बर्फ के पहाड़ों पर प्राकृतिक रूप से पैदा होता है। यह एक प्रकार का पौधा होता है, जिसकी जड़ों से मिलने वाली राल के जरिए हींग बनाया जाता है। हींग की एक तेज महक होती है।
हाथरस में हींग का कारोबार
- जिले में हींग की लगभग 100 फैक्ट्रियां हैं, जिनमें हींग तैयार किया जाता है
- हाथरस जिले में 15 हजार से अधिक लोग सीधे इस कारोबार से जुड़े हुए हैं
- हींग का कारोबार हाथरस में 150 साल से भी पुराना है
- इस मसाले की महक इतनी तीखी है कि जब अंग्रेजों ने इसके बारे में जाना तो इसे "Devil's Dung" यानी "शैतान का गोबर" कहा। हाथरस में यह कारोबार 150 वर्षों से किया जा रहा है।
- हाथरस में 4 तहसील, 15 ब्लॉक, 672 गांव और 1488 पंजीकृत औद्योगिक इकाइयां हैं
- 100 करोड़ रुपये सालाना का है हींग का बिजनेस
देश में हींग की दो किस्में उपयोग की जाती हैं
भारत में हींग की किस्में प्रयोग में लाई जाती हैं, एक लाल और दूसरी सफेद। सफेद हींग अफगानिस्तान में उगाई जाती है और पानी में घुलनशील होती है, जबकि अन्य जगहों पर उगाई जाने वाली लाल हींग तेल में घुलनशील होती है। कुछ समय पहले तक भारत में लगभग 90 हींग का आयात अफगानिस्तान से होता था। लकिन, अफगानिस्तान में तालिबान का शासन आने के बाद से इसके आयात पर भी प्रभाव पड़ा है, वहीं इसकी कीमतें भी दुगनी हो गयी हैं।
आयुर्वेद में भी हींग का है बेहद खास उपयोग
भारतीय खाने में हींग का इस्तेमाल प्रमुखता से किया जाता हैं जो कि भोजन में महक लाने के साथ ही इसके पाचन के लिए सही रहता हैं। आयुर्वेद में भी हींग को बहुत उपयोगी माना हैं, जो सेहत से जुड़ी कई तरह की परेशानियों को दूर कर सकता हैं। लेकिन अगर आप नकली हींग का इस्तेमाल कर रहे हैं तो फायदे की जगह शरीर को नुकसान हो सकता है।
एक जिला एक उत्पाद योजना में शामिल है हाथरस की हींग
यूपी सरकार ने हाथरस के हींग को 'एक जिला एक उत्पाद' योजना में भी शामिल किया है। 24 जनवरी, 2018 के दिन मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा 'एक जिला एक उत्पाद योजना' लॉन्च की गई थी। अंग्रेजी भाषा में इस योजना को 'One District One Product' योजना भी कहा जाता है। इस योजना के तहत जिसके द्वारा उत्तर प्रदेश के सभी जिलों का अपना एक प्रोडक्ट होगा, जो उस जिले की पहचान बनेगा। यह बिजनेस सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम (MSME) के श्रेणी में रखा गया है। इस योजना का उद्देश्य जिले के छोटे, मध्यम और परंपरागत उद्योगो का विकास करना है। हाथरस की हींग को भी शामिल किया गया है।
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हींग का इतिहास
हींग 2500 ईसा पूर्व की प्राचीन मिस्र की कब्रों में पाया गया है, जो दर्शाता है कि यह तीखा, रालयुक्त पदार्थ तब तक अच्छी तरह से स्थापित हो चुका था। हिंग 600 ईसा पूर्व में अफगानिस्तान से भारत आया था और उस समय के हिंदू और बौद्ध ग्रंथों में इसका उल्लेख है। इसका उल्लेख महाभारत में भी मिलता है, जिसे लगभग 300 ईसा पूर्व लिखा गया था। वहीं, उत्तर प्रदेश के जिले हाथरस में हींग का इतिहास 150 साल पुराना है।
