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    कानपुर में अवर अभियंता और बाबू पर 1000 करोड़ की सरकारी जमीन निजी नामों पर दर्ज कराने का आरोप, जांच शुरू

    Updated: Thu, 30 Jul 2026 11:33 PM (IST)

    कानपुर में नगर भूमि सीलिंग विभाग के एक अवर अभियंता और बाबू पर 29 साल तक नियमों को ताक पर रखकर करीब 1000 करोड़ रुपये की सरकारी जमीन निजी नामों पर दर्ज ...और पढ़ें

    प्रतीकात्मक तस्वीर

    प्रतीकात्मक तस्वीर

    HighLights

    1. कानपुर में 29 साल चला 1000 करोड़ का जमीन घोटाला।

    2. अवर अभियंता और बाबू ने 500 बीघा सरकारी भूमि मुक्त की।

    3. जिलाधिकारी ने प्रमुख सचिव को पत्र लिखकर कार्रवाई की मांग की।

    रितेश द्विवेदी, कानपुर। सरकारी जमीन की रक्षा के लिए बने कानून की आड़ में यदि वही जमीन नियमों को दरकिनार कर निजी नामों पर दर्ज होने लगे और तीन दशक तक किसी जिम्मेदार अधिकारी को इसकी भनक तक न लगे, तो यह केवल प्रशासनिक चूक नहीं बल्कि व्यवस्था पर गंभीर सवाल है।

    जिले के नगर भूमि सीलिंग विभाग में सामने आया मामला ऐसे ही एक कथित खेल पकड़ में आया है। आरोप है कि वर्ष 1992 से 2021 तक विभाग में 29 साल तक तैनात रहे एक अवर अभियंता और कार्यालय के बाबू ने जिलाधिकारी और शासन की मंजूरी के बिना करीब 500 बीघा, लगभग एक हजार करोड़ रुपये मूल्य की सरकारी जमीन को सीलिंग से मुक्त कराने के आदेश जारी किए गए। जांच शुरू होने पर कई मूल फाइलें और अभिलेख भी गायब मिले।

    अब जिलाधिकारी जितेन्द्र प्रताप सिंह ने पूरे प्रकरण को शासन के सामने उठाते हुए प्रमुख सचिव आवास एवं शहरी नियोजना से पुन: आदेश जारी करने के लिए पत्र भेजा गया है।

    रानीघाट स्थित नगर भूमि सीलिंग कार्यालय में वर्ष 1992 से 2021 तक तैनात रहे अवर अभियंता अशोक कुमार मिश्र और बाबू संजीव कुमार सक्सेना पर नियमों को ताक पर रखकर करीब एक हजार करोड़ रुपये मूल्य की लगभग पांच सौ बीघा की सीलिंग से मुक्त कराने का आरोप है।

    प्रशासन की प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि मसवानपुर और बिनगवां क्षेत्र में मौजूदा बाजार रेट की एक हजार करोड़ रुपये से अधिक की सीलिंग भूमि (अधिकतम सीमा एवं विनियमन) अधिनियम के तहत राज्य सरकार में निहित होने के बावजूद निरसन अधिनियम, 1999 की धारा 3(2) का लाभ देकर दोबारा भूमिधरों के नाम दर्ज कराने के आदेश जारी कर दिए गए।

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    सबसे गंभीर बात यह है कि इन आदेशों से पहले न तो जिलाधिकारी की अनुमति ली गई और न ही शासन को कोई जानकारी दी गई। सभी मामलों में अवर अभियंता अशोक कुमार मिश्र ने स्वयं को प्रभारी सक्षम प्राधिकारी का विधिवत नोटिफिकेशन जारी करते हुए अनापत्त प्रमाण पत्र भूस्वामियों के नाम पर दे दिया।

    2024 में जब कार्यालय में तैनात बाबू संजीव कुमार सक्सेना सेवानिवृत्त हुए और उनके द्वारा सीलिंग भूमि से संबंधित कोई दस्तावेज चार्ज लेने पहुंचे व्योम सक्सेना को नहीं दिया गया, तो मामला पकड़ में आया। इस मामले में पहले अप्रैल 2026 में एडीएम वित्त एवं राजस्व विवेक कुमार चतुर्वेदी ने बाबू के खिलाफ कोतवाली में फाइले गायब करने के आरोप में मुकदमा दर्ज कराया था।

    बाद में जांच के दौरान ही पता चला कि कार्यालय में तैनात रहे अवर अभियंता ने अपनी तैनाती के 29 सालों के दौरान पांच सौ बीघा से अधिक सीलिंग भूमि की स्वयं ही अनापत्ति जारी करके फाइलों काे गायब कर दिया है। जिसके बाद मामले का संज्ञान लेते हुए जिलाधिकारी ने प्रमुख सचिव आवास एवं शहरी नियोजन को पत्र भेजकर पूर्व में जारी आदेश को निरस्त करते हुए नए आदेश जारी करने की अपील की है।

    29 वर्षों तक चलता रहा खेल, किसी अधिकारी को नहीं हुई भनक

    सीलिंग विभाग में वर्ष 1992 से 2021 तक एक ही अवर अभियंता और कार्यालय के बाबू की महत्वपूर्ण भूमिका रही। दोनों की कार्यालय में तैनाती के बाद सेवानिवृत्त भी उसी कार्यालय से हो गए, लेकिन उनके कारनामों पर किसी अफसर ने ध्यान नहीं दिया।

    आरोप है कि इसी दौरान कई विवादित प्रकरणों में सरकारी हित की अनदेखी करते हुए ऐसे आदेश पारित कराए गए, जिनसे राज्य सरकार की जमीन निजी खातों में वापस दर्ज होने लगी। हैरानी की बात यह रही कि लगभग तीन दशक तक यह पूरा खेल चलता रहा, लेकिन किसी स्तर पर इसकी गंभीर समीक्षा नहीं हुई।

    फाइलें और मूल अभिलेख भी गायब

    जांच के दौरान पता चला कि जिन प्रकरणों में बड़े पैमाने पर भूमि मुक्त किए जाने के आदेश जारी हुए, उनसे संबंधित कई मूल वाद पत्रावलियां और अभिलेख कार्यालय से गायब है।

    आशंका जताई जा रही है कि महत्वपूर्ण दस्तावेज जानबूझकर हटाए गए ताकि भविष्य में जांच प्रभावित हो सके। विभागीय अधिकारियों के अनुसार कई मूल फाइलें अब तक नहीं मिल सकी हैं, जिससे पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच में कठिनाई आ रही है।

    वहीं ऐसे मामलों में हाईकोर्ट में लंबित प्रकरणों में प्रशासन की ओर से जवाब तक नहीं दाखिल हो रहा है, जिससे सरकारी भूमि आरोपितों की ओर से जिन लोगों को एनओसी दी गई है, उनके ही पक्ष में छूटने की आशंका है।

    दस बड़े मामलों में उठे सवाल

    जिलाधिकारी जितेन्द्र प्रताप सिंह ने प्रमुख सचिव को भेजे गए पत्र में ऐसे 10 प्रमुख प्रकरणों का उल्लेख किया गया है, जिसमें सरकारी जमीन छोड़ दी गई है, मौजूदा समय में इस जमीन की बाजार में कीमत 90 करोड़ रुपये से अधिक की है, जिसमें सरकार बनाम राजेश कुमार, हरदीन, रामसजीवन, होरीलाल, दयाराम, लल्तू, राम प्रसाद, सिद्धी, एमवी पाइप और धनीराम जैसे मामलों में सीलिंग की भूमि मुक्त किए जाने के आदेश पारित हुए।

    इन सभी मामलों में नगर भूमि (अधिकतम सीमा एवं विनियमन) अधिनियम, 1976 की धारा 10(3) के तहत भूमि का गजट प्रकाशन हो चुका था। इसके बाद संबंधित भूमि सभी भारों से मुक्त होकर राज्य सरकार में निहित हो गई थी और राजस्व अभिलेखों में अर्बन सीलिंग का नाम दर्ज किया जा चुका था।

    कई मामलों में धारा 10(5) के तहत कब्जा सौंपने के नोटिस भी जारी किए जा चुके थे। इसके बावजूद आरोपितों ने अपने कार्यकाल के दौरान निरसन अधिनियम, 1999 की धारा 3(2) का हवाला देकर भूमिधरों या उनके वारिसों के नाम फिर से दर्ज कराने के आदेश जारी कर दिए।

    शासनादेश की भी अनदेखी

    जांच में यह भी सामने आया कि वर्ष 2001 के शासनादेश में स्पष्ट व्यवस्था थी कि ऐसे मामलों में राज्य सरकार का पक्ष मजबूत होने पर भूमि सरकार के पक्ष में सुरक्षित रखी जा सकती थी। इसके बावजूद संबंधित कर्मचारियों ने सरकारी हित की अनदेखी करते हुए भूमि मुक्त करने की प्रक्रिया अपनाई।

    यही नहीं, कई मामलों में बिना समुचित परीक्षण, बिना शासन और जिलाधिकारी के अनुमोदन तथा राज्य सरकार का पक्ष सुने ही आदेश पारित कर दिए गए।

    डीएम ने प्रमुख सचिव को लिखा पत्र

    पूरा मामला सामने आने के बाद जिलाधिकारी जितेन्द्र प्रताप सिंह ने 23 जून 2026 को प्रमुख सचिव, आवास एवं शहरी नियोजन विभाग को विस्तृत पत्र भेजा है। पत्र में कहा गया है कि जिन मामलों में भूमि राज्य सरकार में निहित हो चुकी थी, उनमें बाद में पारित आदेश प्रथम दृष्टया नियमों के विपरीत प्रतीत होते हैं।

    जिलाधिकारी ने सभी आदेशों का पुनर्विलोकन कर उन्हें निरस्त करने तथा विधिसम्मत कार्रवाई करने का अनुरोध किया है। साथ ही पूरे प्रकरण की विस्तृत जांच कर दोषी अधिकारियों और कर्मचारियों की जिम्मेदारी तय करने की बात भी कही गई है।

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    यह था सीलिंग भूमि एक्ट

    सीलिंग भूमि एक्ट के तहत वर्ष 1976 से 1999 के बीच शहरी क्षेत्र में आवास छोड़कर एक हजार वर्ग मीटर तक का ही मालिक हो सकता था, इस एक्ट के बाद एक वर्ग मीटर से ज्यादा भूमि सरकार अधिग्रहण कर लेती थी, उसे सीलिंग भूमि कहा जाता है।

    1999 में तक अधिग्रहण की गई जमीनों को केडीए को विकास कार्यों के लिए सौंपा गया था। इन्हीं अधिग्रहीत की गई जमीनों को नियमों के विपरीत छोड़ने का कार्य सीलिंग विभाग में तैनात रहे अवर अभियंता और बाबुओं ने किया है।

    सीलिंग भूमि कार्यालय में तैनात रहे अवर अभियंता ने नियम विरूद्ध सीलिंग भूमि की अनापत्ति जारी की हैं। इस मामले में जिलाधिकारी की ओर से प्रमुख सचिव शहरी एवं आवास नियोजन को पत्र भेजकर पुन: आदेश जारी करने के लिए कहा गया है। अन्य सभी मामलों की जांच की जा रही है, जो भी लोग दोषी होंगे, उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी।

                                                                        विवेक कुमार चतुर्वेदी, एडीएम वित्त एवं राजस्व