कुशीनगर में नारायणी के तट पर ठहरी आस्था, लहरों में बह रही तबाही से बढ़ा खतरा
नेपाल की जल प्रलय के बाद कुशीनगर में नारायणी नदी के तट पर सन्नाटा पसरा है, जहाँ लहरों के साथ ...और पढ़ें

प्रतीकात्मक तस्वीर।
HighLights
नारायणी तट पर नेपाल बाढ़ का मलबा, शव बह रहे।
महामारी और जलजनित बीमारियों का गंभीर खतरा बढ़ा।
प्रशासन की अनदेखी से स्वास्थ्य सुरक्षा पर सवाल।
अजय कुमार शुक्ल, कुशीनगर। पावन पुण्य सरस सलिला मोक्षदायिनी नारायणी के तट के किनारे दूर तक सन्नाटा पसरा है। लहरों संग दिख नेपाल में मची तबाही का मंजर रहा है। उजड़ी गृहस्थी के सामान संग कचरा बह रहा है। मानव शवों संग मरे पशु व क्षत-विक्षत अंग संग नारायणी के पानी का रंग बदल गया है। तट किनारे कुछ पुलिस कर्मी हैं। लहरों के बीच एसडीआरएफ की टीम निगरानी कर रही है।
इस बीच दूर से पानी से आती गंध आदमी के कदम लगभग 500 मीटर पहले ही तट की ओर बढ़ने से रोकती है। रोज पूजा करने के लिए आचमन करने वाले हाथों की घाट से बनी दूरी तो शाम को संध्या भजन न होने की मजबूरी बिना कहे ही बहुत कुछ कहती है।
इस बीच नेपाल की त्रासदी की कहानी दिखती है तो महामारी जैसी स्थिति के संभावना का अदृश्य खतरा भी खड़ा दिखता है। इसको लेकर न प्रशासन सचेत दिखता है और न ही स्वास्थ्य विभाग। तट पर कुछ पुलिसकर्मी निगरानी कर रहे हैं। लहरों के बीच एसडीआरएफ की टीमें भी नजर रख रही हैं।
लेकिन नदी के साथ बहकर आ रही जिंदगी की तबाही के दूसरे पहलू पर सवाल बड़ा है। क्या शवों, मृत पशुओं, सड़ते जैविक मलबे और दूषित पानी के बीच स्वास्थ्य सुरक्षा की पर्याप्त तैयारी है। नदी के किनारे जमा हो रहा सड़ता जैविक मलबा एक अलग चिंता पैदा कर रहा है।
गर्मी, नमी और पानी में पड़े जैविक पदार्थों के लंबे समय तक सड़ने से दुर्गंध के साथ स्थानीय पर्यावरण और जल गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है। यदि दूषित पानी या मलबे का संपर्क मानव बस्तियों तक पहुंचता है तो संक्रमण फैलने का जोखिम बढ़ सकता है। यहां फिलहाल लोग नदी से दूरी बनाकर खड़े हैं, लेकिन यह दूरी कब तक सुरक्षा देगी।
नदी अपनी धारा में आगे बढ़ती रहेगी। उसके साथ बहकर आने वाले मलबे को रोकना संभव नहीं, लेकिन महामारी का खतरा दिखाई देने से पहले उसकी आहट पहचानने की आवश्यकता है। नारायणी के किनारे आज थमी हुई आरती और आचमन से दूर खड़े हाथ इसी चेतावनी को बिना शब्दों के कह रहे हैं।
नेपाल की जल प्रलय का पानी उतर जाएगा, लेकिन उससे पैदा हुए स्वास्थ्य संकट की अनदेखी भारी पड़ सकती है। हालांकि, यह अभी महामारी नहीं है और न ही शवों को सीधे महामारी का कारण माना जा सकता है। लेकिन आपदा के बाद दूषित पानी, मल-मूत्र, सड़ते जैविक पदार्थ और पशु अपशिष्ट का पानी में मिलना दस्त, हैजा, टाइफाइड जैसी जलजनित बीमारियों का जोखिम बढ़ा सकता है।
ऐसे में नेपाल से भारत तक बहने वाली नारायणी के किनारे बसे गांवों में स्वास्थ्य निगरानी की बात महत्वपूर्ण तो हो ही जाती है। जानकार बताते हैं कि, नदी किनारे बसे गांवों में बड़ी संख्या में लोग भूजल और हैंडपंप पर निर्भर हैं।
यदि यह पानी इन स्रोतों में प्रवेश करता है तो संक्रमण का खतरा बढ़ सकता है। इसलिए सिर्फ नदी के जलस्तर पर नजर रखना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि पेयजल स्रोतों की गुणवत्ता की नियमित जांच भी जरूरी है।
जैविक प्रदूषण बढ़ सकता है। खासकर बाढ़ के पानी के संपर्क में आने और दूषित पानी के इस्तेमाल से त्वचा संक्रमण, दस्त और अन्य जलजनित बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है। लोगों को नदी के पानी के सीधे संपर्क से बचना चाहिए। पेयजल को उबालकर या सुरक्षित तरीके से इस्तेमाल करना चाहिए। -डॉ. जितेंद्र यादव, चिकित्सक
हम लोग नदी के किनारे खेती करते हैं। पहले नदी का पानी बढ़ने की चिंता थी, लेकिन अब सड़े हुए शव देखकर डर लग रहा है। हवा के साथ दुर्गंध गांव और खेतों तक पहुंच रही है। कई जगह नदी किनारे जाना मुश्किल हो गया है। नदी के पानी की जांच कराई जाए, ताकि हमें बीमारी का डर न रहे। -अमृत्यांशु सिंह, किसान खड्डा
