International Tiger Day: बाघों की बढ़ती संख्या से दुधवा में बढ़ा मानव-वन्यजीव टकराव, गन्ने के खेत बने ठिकाना
दुधवा टाइगर रिजर्व में बाघों की बढ़ती संख्या संरक्षण की सफलता है, लेकिन इससे मानव-वन्यजीव संघर्ष भी बढ़ रहा है।

बाघों का बढ़ता कुनबा बढ़ा रहा इंसानों से टकराव।

समय कम है?
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जागरण संवाददाता, लखीमपुर। दुधवा टाइगर रिजर्व में बाघों की बढ़ती संख्या संरक्षण की सफलता की कहानी है, लेकिन इसके साथ ही मानव-वन्यजीव संघर्ष भी तेजी से बढ़ रहा है।
जंगल से सटे गन्ने के खेत अब बाघों की शरणस्थली बन गए हैं। आसान शिकार, घना आवरण और खेती वाले इलाके बाघों को आकर्षित कर रहे हैं, जिसके परिणामस्वरूप ग्रामीणों और बाघों का आमना-सामना बढ़ रहा है।
साथ ही साथ पिछले चार महीनों में दो बाघ और दो बाघिन की मौत ने वन विभाग और पार्क प्रशासन की चिंता बढ़ा दी है। इस स्थिति में अंतरराष्ट्रीय बाघ दिवस पर संरक्षण के साथ मानव सुरक्षा का सवाल भी महत्वपूर्ण बन गया है। तराई में सबसे अधिक संघर्ष की घटनाएं खीरी, बहराइच और पीलीभीत में सामने आ रही है।
दुधवा टाइगर रिजर्व में पहली बार वर्ष 2006 में वैज्ञानिक तरीके से बाघों की गणना की गई थी, जिसमें 95 बाघ दर्ज किए गए थे। इसके बाद वर्ष 2010 में संख्या 50 रही, जबकि 2014 में यह बढ़कर 68 और 2018 में 83 हो गई। वर्ष 2022 की गणना में दुधवा में 135 बाघ दर्ज किए गए।
2026 में बाघ गणना हुई पूरी
हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि उस समय करीब 20 से 25 बाघ जंगल से बाहर गन्ने के खेतों में रह रहे थे, जिन्हें आधिकारिक गणना में शामिल नहीं किया गया। वर्ष 2026 की बाघ गणना पूरी हो चुकी है और इसके परिणाम आने बाकी हैं।
वन्यजीव विशेषज्ञों का अनुमान है कि इस बार दुधवा में बाघों की संख्या 200 के करीब पहुंच सकती है। तराई में पिछले चार महीनों में एक बाघ और तीन बाघिन की मौत हो चुकी है।
मैलानी में हुई थी एक बाघिन की मौत
मैलानी में ट्रेन की टक्कर से एक बाघिन की मौत हुई तो मझगई में बाघिन की मौत की घटना के बाद उसे आपसी संघर्ष बताया गया। मझगई में ही दो दिन पहले शिकार करने पिंजरे में कैद हुई बागी के कुछ देर में मौत हो जाने की घटना ने सवाल खड़े कर दिए।
महेशपुर में 10 वर्षीय बाघ की मौत की घटना ने अधिकारियों को पूरी तरह सवालों के घेरे में खड़ा कर दिया, लेकिन इन सभी म्यूट की पोस्टमार्टम रिपोर्ट में बाघिन और महेशपुर के बाघ के अस्वस्थ होने की रिपोर्ट सामने आई। पिछले डेढ़ वर्ष में खीरी जिले में बाघ के हमले में 10 लोगों की मौत हुई है।
बाघ संरक्षण अभियान में आ रही तेजी
इनमें सबसे ज्यादा घटनाएं गाने के खेतों में कृषि कार्य करते समय घटित हुई हैं। पलिया, मैलानी, महेशपुर, गोला, संपूर्णानगर जैसे इलाके बाघों के मूवमेंट के लिए बेहद संवेदनशील माने जाते हैं। वन्यजीव विशेषज्ञों का मानना है कि बाघ संरक्षण के अभियान से ही इनकी संख्या में लगातार वृद्धि हो रही है।
जरूर यह है कि जंगल से बाहर निकलने वाले बाघों की नियमित निगरानी, गन्ने के खेतों में उनकी मौजूदगी का वैज्ञानिक आकलन और प्रभावित गांवों में त्वरित चेतावनी व बचाव तंत्र को मजबूत किया जाए। मानव-वन्यजीव संघर्ष पर समय रहते प्रभावी नियंत्रण नहीं किया गया, तो यह उपलब्धि नई चुनौतियों में बदल सकती है।
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