अब इंसानों से नहीं डरते पीलीभीत के बाघ! कैमरों के सामने 'कैटवॉक' और बदला व्यवहार उड़ा रहा विशेषज्ञों के होश
पीलीभीत टाइगर रिजर्व के बाघों का स्वभाव बदल रहा है; वे अब इंसानों और वाहनों से नहीं डरते, बल्कि पर्यटकों के सामने बेफिक्र होकर घूमते हैं। विशेषज्ञ इसे ...और पढ़ें

दीवार पर बैठी बाघिन। फाइल फोटो
HighLights
पीलीभीत टाइगर रिजर्व में एक ही टेरेटरी में दो से तीन बाघ रहते, वाहनों के सामने खड़े रहकर बदलते भंगिमाएं
पीयूष दुबे, पीलीभीत। बाघ का भारी-भरकम पंजा भले ही खतरनाक हो मगर, उसका स्वभाव शर्मीला माना गया। वह मानव को देखकर छिपने की जुगत करने लगता है। मानव पर हमला तभी करता है, जब आदमखोर हो जाए या मनुष्य की पीठ उसकी ओर हो। वन्यजीव विशेषज्ञ अब तक बाघों के स्वभाव की व्याख्या इसी तरह करते हैं मगर, इसमें बदलाव आने लगा। अब बाघ मानव का सह अस्तित्व स्वीकारने लगे हैं।
पर्यटन सत्र में सफारी वाहनों के सामने खड़े बेफिक्र विचरण करते हैं। कैमरों के सामने से हटते नहीं, टिककर भंगिमाएं बदलते हैं। बीते सत्र में ऐसे दो दर्जन से अधिक फोटो सामने आए, जिनमें बाघ कैमरा या पर्यटकों को देखकर हटे नहीं। शांत होकर खड़े रहे। सफारी वाहनों के आगे-आगे टहलते रहे या पर्यटकों की आवाजाही के बीच तालाब में पानी पीते रहे।

शावक भी बिना झिझक पर्यटकों के सामने से गुजरते रहे। विशेषज्ञ मान रहे कि बाघों का स्वभाव बदल रहा है। अब पीलीभीत टाइगर रिजर्व के बाघ मानव के साथ रहने के अभ्यस्त हो रहे हैं। वे जंगल सफारी करने वाले पर्यटकों के वाहनों के सामने चलते नजर आते हैं।
छोटे-छोटे शावक भी छिपने के बजाय कच्ची पटरी, पक्की पटरी, चूका बीच में सामने चलते नजर आते हैं। बाघों के मानव के साथ अभ्यस्त होने से मानव वन्यजीव संघर्ष में बढ़ोतरी होने की आशंका से इन्कार नहीं किया जा सकता है। बाघों का बदलता स्वभाव लोगों को चौंकाता है।
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पीलीभीत टाइगर रिजर्व (पीटीआर) का कुल जंगल 730 वर्ग किलोमीटर हैं, जिसमें बफर जोन करीब 128 किलोमीटर का है। इसमें पीलीभीत टाइगर रिजर्व का कोर जंगल 602 वर्ग किलोमीटर है, जिसमें कोर जंगल का 20 प्रतिशत हिस्सा ही सफारी में शामिल हो सकती है।

यहां पर जोन सफारी के लिए बनाए गए। वर्ष 2014 में पीलीभीत टाइगर रिजर्व घोषित किए जाने पर बाघों की संख्या 25 थी, जोकि अब 80 से अधिक हो चुकी है। वर्ष 2014 में टाइगर रिजर्व का दर्जा मिलने के बाद पीटीआर न केवल दुधवा बल्कि देश के अन्य प्रमुख टाइगर रिजर्व की कतार में खड़ा हो गया है।
पीटीआर की इस कामयाबी के पीछे बाघों की तेजी से बढ़ती आबादी और पर्यटकों को होने वाली आसान साइटिंग सबसे बड़ा कारण है। इंटरनेट मीडिया की दुनिया में भी पीटीआर के बाघों का खासा दबदबा है। इनमें से कई बाघ जहां पर्यटकों के आकर्षण का मुख्य केंद्र बनकर पीटीआर की शान बढ़ा रहे हैं।
यह बढ़ोतरी बाघ संरक्षण को प्रोत्साहित करनी वाली है मगर, सुरक्षा की चुनौती भी बढ़ाती है। पीटीआर के जंगल में 122 जलाशय और 10 नहरें हैं। बाघ यहां पानी पीने आते हैं। उन्हें सुरक्षा देने के लिए पूर्व में कुछ कैमरे लगे थे, पीलीभीत टाइगर रिजर्व में बाघों की सुरक्षा के लिए जलाशयों के आसपास पेड़ों पर 100 इंफ्रा रेड (आइआर) कैमरे लगाए जाने की योजना भी है।

पेड़ों पर लगाए जाने वाले इन कैमरों के जरिये 24 घंटे निगरानी की जा सकेगी। जंगल में खटीमा रोड पर सबसे ज्यादा बाघों की साइटिंग होती है। खटीमा रोड पर अक्सर बाघ घूमते नजर आते हैं। इसमें खासतौर पर वाहनों के आने के बावजूद बाघ खटीमा रोड पर टहलते नजर आते हैं। वे वाहनों और इंसानों को देखकर छिपने के बजाय उनके सामने खड़े रहकर फोटो क्लिक कराते हैं।
सफारी वाहनों के आगे कैट-वाक करते नजर आए बाघिन व शावक
सफारी जोन में भीमताल फीमेल बाघिन सफारी करने गए पर्यटकों को भीमताल सरोवर के आसपास अपने तीन शावकों के साथ कई बार नजर आई। इसी तरह नैना बाघिन एक कई बार पर्यटकों को नजर आई और नैना के साथ भी तीन शावक नजर थे।

चूका फीमेल बाघिन दो शावकों के साथ और बराही फीमेल बाघिन बराही रेंज में पर्यटकों के साथ खूब नजर आई। पर्यटकों को देखकर छिपने के बजाय बाघ, बाघिन और उनके उनके शावक वाहनों के आगे-आगे चलते नजर आए।
पीटीआर का बेताज बादशाह एस-थ्री
यूं तो पीटीआर सफारी के दौरान पर्यटकों को कई बाघों के दीदार होते हैं। लेकिन एस-थ्री का नाम हर वन्यजीव प्रेमी की जुबां पर रहता है। सुरई रेंज से पीलीभीत के जंगलों में आए इस बाघ को शुरुआत में इसकी आंख के पास कुल्हाड़ी जैसी आकृति होने के कारण पर्यटकों ने इसे कुल्हाड़ीराम नाम दिया था।

हालांकि, पीटीआर के मशहूर बाघ सुल्तान का वंशज होने के कारण बाद में इसे एस-थ्री कहा जाने लगा। यह पीटीआर का सबसे अधिक कैमरे में कैद होने वाला बाघ है। इस पर्यटन सत्र में वन्यजीव प्रेमियों को इसके दीदार कम ही हुए हैं।
नहर में तैराकी का शौकीन राकेट मेल
जंगल में विचरण करने वाले बाघों की पहचान के लिए गाइड और ड्राइवर अक्सर उनके शरीर के निशानों, आदतों या क्षेत्र के आधार पर उनका नामकरण कर देते हैं। एस-थ्री के बाद पर्यटकों में राकेट नामक बाघ की सबसे अधिक दीवानगी देखी जाती है।
इसके माथे पर राकेट जैसी आकृति बनी है जिसके चलते इसे राकेट मेल कहा जाने लगा। इस बाघ को अक्सर जंगल की नहर में तैराकी करते देखा जाता था। एस-थ्री की तरह यह बाघ भी इस बार कम ही नजर आया है।
घंटों दीवार पर बैठी रही थी बाघिन
पर्यटन के इतर पीलीभीत अक्सर मानव-वन्यजीव संघर्ष को लेकर भी चर्चा में रहता है। दिसंबर 2024 का वह वाकया आज भी लोगों के जेहन में ताजा है। जब पीटीआर के जंगलों से भटकी एक बाघिन गन्ने के खेत से निकलकर एक ग्रामीण के घर की दीवार पर जा बैठी थी।
हैरत की बात यह थी कि हजारों इंसानों की मौजूदगी और शोर-शराबे के बीच भी वह करीब आठ घंटे तक दीवार पर शांत बैठी रही और किसी पर कोई हमला नहीं किया। यह बाघिन अब हमेशा के लिए जंगल से दूर कानपुर चिड़ियाघर में उम्रकैद काट रही है।
चर्चित आदमखोर मिट्ठी
मां से बिछड़ने के बाद बाघिन मिट्ठी करीब छह महीने तक रिहायशी इलाकों के पास गन्ने के खेतों में इंसानों के बीच बिना किसी संघर्ष के रही। लेकिन अत्यधिक इंसानी दखल ने उसे उग्र और आक्रामक बना दिया।
मई माह में दो लोगों को निवाला बनाने के बाद उसे रेस्क्यू कर जंगल में छोड़ा गया, लेकिन जून में वह फिर आबादी में लौट आई और तीन अन्य लोगों की जान ले ली। एक के बाद एक हमले करने के कारण इंटरनेट पर सुर्खियां बनी यह बाघिन भी अब कानपुर चिड़ियाघर की सलाखों के पीछे है।
सीएम के चहेते केसरी का दर्दनाक अंत
पीलीभीत का एक और चर्चित बाघ केसरी अपनी विशाल और भारी-भरकम काया के लिए जाना गया। इंसानों पर हमलों के बाद सितंबर 2024 में कलीनगर तहसील क्षेत्र से इस बाघ का रेस्क्यू किया गया था। इसकी कद-काठी को देखकर खुद सीएम योगी आदित्यनाथ ने इसे केसरी नाम दिया था।

दुर्भाग्यवश, खुले जंगल में घूमने का आदी यह बाघ उम्रकैद बर्दाश्त नहीं कर सका। कैद और तनाव के चलते महज छह महीने बाद मार्च 2025 में गोरखपुर प्राणि उद्यान में उसकी मौत हो गई। केसरी को उस गुनाह की ऐसी खौफनाक सजा मिली जो शायद उसने कभी किया ही नहीं था।
जंगल के अंदर वाहनों और पर्यटकों को लगातार देखने की वजह से बाघ इसके अभ्यस्त हो जाते हैं। बाघों की टेरेटरी केवल क्षेत्र नहीं बल्कि शिकार, जलाशय और फीमेल तीनों पर निर्भर करती है। जंगल में उपलब्ध संसाधनों, हैबिटेट, भोजन रिसोर्स अधिक होने पर टेरेटरी छोटी भी हो जाती है। पीलीभीत टाइगर रिजर्व में बाघों के लिए संसाधन प्रचुर मात्रा में होता है, जिससे यह बदलाव संभव है।
डाॅ. मुदित गुप्ता, हेड डब्ल्यूडब्ल्यूएफ, पूर्वी तराई
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