दुधवा की 'दुर्गा' से बिछड़ रही ‘भवानी’, गोरखपुर में होगा पालन-पोषण; सीएम योगी ने दिया था नाम
दुधवा में अनाथ हथिनी भवानी, जिसे हथिनी दुर्गा ने पाला था, अब गोरखपुर भेजी जा रही है। वन्यजीव प्रेमी इस भावनात्मक अलगाव पर चिंता व्यक्त कर रहे हैं, क्य ...और पढ़ें


समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
श्वेतांक शंकर उपाध्याय, लखीमपुर। हिंदी फिल्मों में अक्सर ऐसी कहानियां दिखती हैं, जहां कोई बच्चा अनाथ हो जाता है, फिर किसी को उसका सहारा बनते देखा जाता है। लेकिन दुधवा के जंगलों में एक ऐसी ही कहानी सचमुच जी गई- बस फर्क इतना है कि यहां किरदार इंसान नहीं, हाथी हैं।
बिजनौर के जंगलों से करीब तीन सप्ताह की उम्र में दुधवा लाई गई एक मासूम हथिनी को यहां न सिर्फ नया घर मिला, बल्कि ‘दुर्गा’ नाम की एक ममतामयी हथिनी ने उसे अपनी संतान की तरह अपनाकर जिंदा रहने का सहारा भी दिया।
अब वही हथिनी, जिसे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने दुधवा आकर ‘भवानी’ नाम दिया था, एक बार फिर प्रशासनिक फैसलों और विभागीय दांव-पेच के बीच फंस गई है। तैयारी उसे गोरखपुर भेजने की है। सवाल यही है,क्या वहां उसे फिर कोई ‘दुर्गा’ मिलेगी?
यह कहानी सिर्फ एक वन्यजीव के संरक्षण की नहीं, बल्कि उस भावनात्मक रिश्ते की भी है, जो जंगल के भीतर इंसानों से ज्यादा संवेदनशील रूप में पलता है। कुछ वर्ष पहले बिजनौर क्षेत्र में एक हथिनी के बच्चे को मां से बिछुड़ने के बाद बचाया गया था।
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तब वह इतनी छोटी थी कि अपने दम पर जी पाना लगभग असंभव माना जा रहा था। उसे बेहतर देखभाल और संरक्षण के लिए 13 अक्टूबर 2023 को दुधवा लाया गया।

यहां उसकी हालत नाजुक थी। वनकर्मियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि इतने छोटे हाथी को सिर्फ दूध और दवा से नहीं, बल्कि मातृत्व जैसी सुरक्षा और सामाजिक स्वीकार्यता भी चाहिए थी। तभी दुधवा की हथिनी दुर्गा उसके लिए ढाल बनकर सामने आई।
दुर्गा ने उस नन्ही हथिनी को अपने पास रखा, उसे अपनाया, उसकी हर हरकत पर नजर रखी और एक मां की तरह उसके साथ रही। वनकर्मियों के मुताबिक, दुर्गा का व्यवहार देखकर यह साफ महसूस होता था कि उसने भवानी को केवल झुंड का हिस्सा नहीं माना, बल्कि अपने बच्चे की तरह संरक्षण दिया।
यही वजह रही कि वह मासूम हथिनी धीरे-धीरे संभली, खड़ी हुई, चली, और फिर दुधवा के माहौल में ढलती चली गई। यह रिश्ता इतना अनोखा था कि जब वर्ष 2025 में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ दुधवा पहुंचे और उन्होंने दुर्गा के स्नेह में पल रही इस हथिनी को देखा, तो उसकी कहानी से प्रभावित होकर उसका नाम ‘भवानी’ रख दिया।
दुधवा के भीतर यह नाम सिर्फ औपचारिक पहचान नहीं बना, बल्कि उस संघर्ष और पुनर्जन्म की कहानी का प्रतीक बन गया, जिसमें एक अनाथ हथिनी को दूसरा जीवन मिला था। लेकिन अब वही भवानी फिर असमंजस के दौर में खड़ी है।

दुधवा अधिकारियों ने उसके बेहतर देखभाल के लिए प्रधान मुख्य वन संरक्षक से कहीं और शिफ्ट करने के लिए 29 जून को पत्र लिखा। हथिनी भवानी की सुरक्षा और बेहतर देखभाल के लिए प्रधान मुख्य वन संरक्षक अनुराधा वेमुरी ने उसे गोरखपुर भेजने का निर्देश दिया है।
भवानी को गोरखपुर भेजे जाने की खबर से वन्यजीव प्रेमियों के बीच बेचैनी है। उनका कहना है कि सवाल सिर्फ स्थानांतरण का नहीं, बल्कि उस भावनात्मक और व्यवहारिक ताने-बाने का है, जिसमें भवानी अब तक पली-बढ़ी है।
वन्यजीव विशेषज्ञों का मानना है कि हाथी बेहद संवेदनशील और सामाजिक प्राणी होते हैं। वे अपने झुंड, माहौल और साथियों से गहरे रिश्ते बनाते हैं। ऐसे में किसी हथिनी को उस परिवेश से अलग करना, जहां वह बचपन से रही हो, उसके व्यवहार और मानसिक स्थिति पर असर डाल सकता है।
खासकर तब, जब उसकी शुरुआती जिंदगी ही असुरक्षा और बिछोह से भरी रही हो। भवानी के मामले में चिंता इसलिए भी ज्यादा है, क्योंकि उसकी पहचान दुधवा की उस विरल कहानी से जुड़ी है, जहां एक हथिनी ने दूसरी हथिनी को जीवन दिया।