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100-200 नहीं; 4500 साल पुरानी हैं मांडी में मिलीं 3000 स्वर्ण मुद्राएं, गंगा घाटी सभ्यता के मिले ऐतिहासिक प्रमाण

Published: Wed, 09 Sep 2026 05:50 PM (IST)

मुजफ्फरनगर के मांडी गांव में 27 साल पहले मिलीं 4500 साल पुरानी स्वर्ण मुद्राएं प्राचीन भारतीय समाज की धातुकर्म, तौल प्रणाली और गणितीय समझ के महत्वपूर्ण प्रमाण हैं।

इस फोटो को AI के माध्यम से तैयार किया गया है।

इस फोटो को AI के माध्यम से तैयार किया गया है।

HighLights

  1. मांडी में मिलीं 4500 साल पुरानी स्वर्ण मुद्राएं।

  2. प्राचीन भारतीय धातुकर्म, गणितीय समझ के प्रमाण मिले।

  3. सिक्के लखनऊ के राज्य संग्रहालय में सुरक्षित रखे गए।

जागरण संवाददाता, लखनऊ। मुजफ्फरनगर के मांडी गांव में 27 वर्ष पहले किसानों को मिलीं तीन हजार स्वर्ण मुद्राएं लगभग 4000-4500 वर्ष पुरानी हैं। वैज्ञानिक अध्ययन में सिक्कों से जुड़ी गंगा घाटी की प्राचीन ओचर कलर्ड पाटरी (ओसीपी) संस्कृति के इतिहास और उसकी वैज्ञानिक दक्षता से जुड़े महत्वपूर्ण प्रमाण मिले हैं। इसके साथ ही प्राचीन भारतीय समाज की धातुकर्म, तौल प्रणाली, गणितीय समझ और व्यापारिक गतिविधियों की जानकारियां भी सामने आई हैं। फिलहाल इन सिक्कों को राज्य संग्रहालय, लखनऊ में सुरक्षित रखा गया है।

बुधवार को होटल गोमती में आयोजित पत्रकार वार्ता में पूर्व डीजीपी एवं नेशनल ट्रस्ट फार प्रमोशन आफ नालेज के चेयरमैन और इंडियन जर्नल आफ आर्कियोलजी के चीफ एडिटर विजय कुमार ने बताया कि इन सिक्कों का वजन 0.04 ग्राम से लेकर 1.61 ग्राम तक है। इतने छोटे आकार और कम वजन के बावजूद इनके निर्माण में जिस स्तर की तकनीकी दक्षता दिखाई देती है, वह उस काल के धातुकर्म और गणितीय ज्ञान की उन्नति का संकेत देती है।

तौल के लिए रत्ती और तोला जैसी इकाइयों का होता था प्रयोग

विजय कुमार ने बताया कि भारत में प्राचीन काल से ही वस्तुओं और धातुओं की तौल के लिए रत्ती और तोला जैसी इकाइयों का प्रयोग होता रहा है। सोने के जिन सिक्कों का वजन एक रत्ती से भी कम था, उनकी सूक्ष्म तौल के लिए राई और सरसों के बीज को आधार बनाया जाता था।ओसीपी संस्कृति के लोग तांबे की बड़ी तलवारें बनाने के साथ-साथ बेहद छोटे आकार के सोने के सिक्के भी ढालने में सक्षम थे।

इससे स्पष्ट होता है कि उन्हें विभिन्न धातुओं को गलाने, ढालने और मनचाहा आकार देने की तकनीक का पर्याप्त ज्ञान था। बीरबल साहनी पुरा विज्ञान संस्थान के वैज्ञानिक डा. नीरज राय ने बताया कि मांडी से मिले सिक्कों के आकार और संरचना का अध्ययन प्राचीन भारतीय गणित की ओर भी संकेत करता है। चपटे, गोल और छेद वाले सिक्कों का ढांचा तैयार करने तथा उनका आयतन निर्धारित करने के लिए गणितीय गणना आवश्यक रही होगी।

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ओसीपी संस्कृति में तौल के लिए 96 रत्ती के तोले के प्रयोग का उल्लेख किया गया है। बहरीन क्षेत्र में भी व्यापारिक वजन के लिए 112 रत्ती के तोले के प्रयोग किया जाता था। इससे संकेत मिलता है कि प्राचीन काल में भारतीय उपमहाद्वीप और पश्चिम एशिया के बीच व्यापारिक संपर्कों के दौरान वजन और माप की कुछ समान प्रणालियां प्रचलन में थीं।