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    अयोध्या राम मंदिर चढ़ावे की गिनती में एसबीआई पर उठे सवाल, बिना टेंडर इस कंपनी को सौंप दी जिम्मेदारी

    Updated: Wed, 08 Jul 2026 05:28 AM (IST)

    एसबीआई पर अयोध्या राम मंदिर के चढ़ावे की गिनती का काम बिना टेंडर सैनिक सिक्योरिटी सर्विसेज को सौंपने का आरोप है। ...और पढ़ें

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    HighLights

    1. बिना टेंडर सैनिक सिक्योरिटी को सौंपा गया गिनती का काम।

    2. एसबीआई की कार्यप्रणाली और आंतरिक नियंत्रण पर उठे सवाल।

    3. मंदिर के करोड़ों रुपये के चढ़ावे की गिनती में अनियमितता।

    जागरण संवाददाता, लखनऊ। श्री राम मंदिर अयोध्या में चढ़ावे की राशि में चोरी के मामले की जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ रही है, वैसे-वैसे भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) की कार्यप्रणाली भी सवालों के घेरे में आती जा रही है।

    सामने आए तथ्यों से यह बात सामने आ रही है कि मंदिर में प्रतिदिन आने वाली करोड़ों रुपये की दानराशि की गणना का जिम्मा बिना विधिक टेंडर प्रक्रिया अपनाए सैनिक सिक्योरिटी सर्विसेज को सौंप दिया गया।

    यह कंपनी मुख्य रूप से मैनपावर सप्लाई, हाउसकीपिंग और सुरक्षा सेवाएं उपलब्ध कराती है, लेकिन इसे नोटों की गिनती जैसे अत्यंत संवेदनशील कार्य की भी जिम्मेदारी दे दी गई।

    ऐसे में सवाल इस बात का है कि बैंक ने मैनपावर सप्लाई करने वाली कंपनी को कैसे नोटों की गिनती कराने में लगाए रखा। हालांकि इस पूरे प्रकरण पर बैंक प्रबंधन कुछ भी बाेलने से बच रहा है।

    सूत्रों के अनुसार, इस व्यवस्था के लिए न तो प्रतिस्पर्धी निविदा प्रक्रिया अपनाई गई और न ही अन्य एजेंसियों से प्रस्ताव आमंत्रित किए गए। ऐसे में यह प्रश्न उठ रहा है कि आखिर किस आधार पर इस कंपनी का चयन किया गया और क्या इसके लिए बैंक की सक्षम प्राधिकारी से आवश्यक स्वीकृति प्राप्त की गई थी।

    दरअसल, बैंकिंग व्यवस्था में सामान्यतः कार्यों को दो श्रेणियों—कोर बैंकिंग और नॉन-कोर बैंकिंग-में विभाजित किया जाता है। कोर बैंकिंग के अंतर्गत नकद जमा-निकासी, चेक भुगतान, पासबुक अपडेट तथा नकदी प्रबंधन जैसे कार्य शामिल होते हैं, जिन्हें केवल बैंक के नियमित एवं अधिकृत कर्मचारी ही संपादित करते हैं।

    वहीं सफाई, सुरक्षा, हाउसकीपिंग और अन्य सहायक सेवाएं नॉन-कोर बैंकिंग के दायरे में आती हैं, जिन्हें आउटसोर्स एजेंसियों के माध्यम से कराया जाता है।

    जानकारी के अनुसार, बैंक ने लागत कम करने के उद्देश्य से इस आउटसोर्स एजेंसी के माध्यम से 15 से 20 हजार रुपये मासिक वेतन पर कर्मचारियों की तैनाती की। बाद में इन्हीं कर्मचारियों को मंदिर के चढ़ावे की नकदी की गणना में भी लगा दिया गया।

    बैंकिंग विशेषज्ञों का कहना है कि इतनी बड़ी मात्रा में नकदी की गणना केवल प्रशिक्षित एवं जवाबदेह व्यवस्था के तहत होनी चाहिए, क्योंकि इसमें पारदर्शिता और जवाबदेही सर्वोच्च प्राथमिकता होती है। इस काम लगाने से पहले कर्मचारियों की सत्यनिष्ठा की भी जांच की जानी चाहिए।

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    सूत्र बताते हैं कि पूरी प्रक्रिया के दौरान निर्धारित मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) का भी अपेक्षित स्तर पर पालन नहीं कराया गया। यदि एसओपी का कड़ाई से अनुपालन होता, नियमित निगरानी रखी जाती और समय-समय पर प्रक्रिया का ऑडिट किया जाता तो किसी भी संभावित अनियमितता की आशंका काफी हद तक कम हो सकती थी।

    यही नहीं, त्रैमासिक ऑडिट के दौरान भी इस व्यवस्था की प्रभावी समीक्षा नहीं किए जाने के आरोप लग रहे हैं। बैंकिंग क्षेत्र के जानकारों का मानना है कि चढ़ावे की राशि की प्राथमिक गणना मंदिर ट्रस्ट के अधिकृत प्रतिनिधियों की उपस्थिति में होनी चाहिए थी। इसके बाद बैंक अधिकारियों द्वारा पुनर्गणना (रिकाउंटिंग) कर कुल राशि का सत्यापन किया जाता और अंत में बैंक द्वारा ट्रस्ट को विधिवत रसीद उपलब्ध कराई जाती।

    इस पूरी प्रक्रिया का दस्तावेजी रिकॉर्ड भी सुरक्षित रखा जाना चाहिए था। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि दानराशि की गिनती जैसी संवेदनशील जिम्मेदारी आउटसोर्स एजेंसी को सौंपी गई थी तो उसके चयन, निगरानी और जवाबदेही की जिम्मेदारी किसकी थी?

    साथ ही, क्या बैंक की आंतरिक नियंत्रण प्रणाली और ऑडिट व्यवस्था ने समय रहते संभावित खामियों की पहचान करने का प्रयास किया? इन सवालों के जवाब जांच पूरी होने के बाद ही स्पष्ट हो सकेंगे, लेकिन फिलहाल इस मामले ने बैंक की प्रक्रियाओं और निगरानी तंत्र दोनों पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिए हैं।

    इस बेहद गंभीर प्रकरण पर बैंक अधिकारियों से बात करने का प्रयास करने पर मुख्य महाप्रबंधक द्वारा एजीएम पीआर रवि वर्मा का नंबर उपलब्ध कराया गया। रवि वर्मा का कहना है कि इस मामले में वे कुछ भी बोलने के अधिकृत नहीं हैं।

    नहीं किया गया एसओपी का पालन

    • दानराशि की गिनती केवल अधिकृत बैंक अधिकारियों और मंदिर ट्रस्ट के प्रतिनिधियों की उपस्थिति में की जानी चाहिए थी।
    • आउटसोर्स कर्मियों की भूमिका केवल सहायक कार्यों तक सीमित रहनी चाहिए थी, उन्हें नकदी गणना का अधिकार नहीं दिया जाना चाहिए था।
    • एजेंसी चयन के लिए पारदर्शी टेंडर या प्रतिस्पर्धी निविदा प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए थी।
    • नकदी गिनती के दौरान सीसीटीवी निगरानी, वीडियोग्राफी और दोहरी गणना की व्यवस्था अनिवार्य होनी चाहिए थी।
    • गिनती के बाद राशि को सील्ड पैक में सुरक्षित रखा जाए और उसका पूरा रिकॉर्ड तैयार किया जाना चाहिए था।
    • प्रत्येक चरण पर बैंक अधिकारी, ट्रस्ट प्रतिनिधि और सुरक्षा कर्मियों के हस्ताक्षर लिए जाने चाहिए थे।
    • नकदी गिनती मशीनों की नियमित जांच, कैलिब्रेशन और सत्यापन किया जाना चाहिए था।
    • प्रक्रिया का दैनिक, साप्ताहिक और त्रैमासिक ऑडिट अनिवार्य रूप से होना चाहिए था।
    • किसी भी अंतर या गड़बड़ी की स्थिति में तत्काल रिपोर्टिंग और जवाबदेही तय की जाए।
    • सभी कर्मचारियों को संवेदनशील नकदी प्रबंधन का प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए था।