BJP के नई राष्ट्रीय टीम में UP के दो मुस्लिम नेताओं को अहम जिम्मेदारी, क्या बदलेगा राजनीतिक समीकरण?
भाजपा ने अपनी नई राष्ट्रीय टीम में उत्तर प्रदेश के दो मुस्लिम चेहरों, डॉ. तारिक मंसूर को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और कुंवर बासित अली को अल्पसंख्यक मोर्चे क ...और पढ़ें

बाएं से तारिक मंसूर और कुंवर बासित अली। जागरण
HighLights
डॉ. तारिक मंसूर राष्ट्रीय उपाध्यक्ष, बासित अली अल्पसंख्यक मोर्चे के अध्यक्ष।
यूपी से दोनों मुस्लिम चेहरों को राष्ट्रीय संगठन में मिली जगह।
आगामी चुनावों में मुस्लिम समाज तक पहुंच बनाने की भाजपा रणनीति।
विवेक शुक्ला, लखनऊ। भारतीय जनता पार्टी ने राष्ट्रीय संगठन में बड़ा फेरबदल करते हुए 65 पदाधिकारियों की नई टीम घोषित की है। नितिन नवीन के नेतृत्व में बनी इस टीम में उत्तर प्रदेश को खास तवज्जो मिली है। खास बात यह है कि संगठन में दो मुस्लिम चेहरों को भी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां दी गई हैं। डॉ. तारिक मंसूर को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया गया है, जबकि कुंवर बासित अली को भाजपा के राष्ट्रीय अल्पसंख्यक मोर्चे की कमान सौंपी गई है।
दोनों नेता उत्तर प्रदेश से आते हैं और लंबे समय से भाजपा के संगठन में सक्रिय हैं। ऐसे में इन नियुक्तियों को सिर्फ संगठनात्मक बदलाव के तौर पर नहीं देखा जा रहा है। विधानसभा चुनाव से पहले उत्तर प्रदेश में मुस्लिम समाज के अलग-अलग सामाजिक वर्गों तक पहुंच बनाने की भाजपा की रणनीति से भी इसे जोड़कर देखा जा रहा है। आइए इन दोंनों नेताओं के बारें में जानते हैं...

कौन हैं तारिक मंसूर?
डॉ. तारिक मंसूर अलीगढ़ से आने वाले प्रमुख मुस्लिम चेहरों में शामिल हैं। उन्हें भाजपा ने राष्ट्रीय उपाध्यक्ष की जिम्मेदारी दोबारा दी है। वर्तमान में वह उत्तर प्रदेश विधान परिषद के सदस्य हैं। अप्रैल 2023 में योगी सरकार ने उन्हें विधान परिषद के लिए मनोनीत किया था।
20 सितंबर 1956 को अलीगढ़ में जन्मे तारिक मंसूर का लंबा अकादमिक और चिकित्सा क्षेत्र का अनुभव रहा है। उनके पिता प्रोफेसर हफीजुल रहमान एएमयू के कानून विभाग के संस्थापक डीन रहे हैं। तारिक मंसूर ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के जवाहरलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस और एमएस की पढ़ाई की।
चिकित्सा क्षेत्र में कई जिम्मेदारियां संभालने के बाद वह एएमयू में शिक्षक के रूप में जुड़े। उन्होंने असिस्टेंट प्रोफेसर से लेकर प्रोफेसर तक का सफर तय किया। वर्ष 2017 में उन्हें अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय का कुलपति बनाया गया। कुलपति के रूप में उनका कार्यकाल 2023 में समाप्त हुआ। इसके बाद उन्होंने सक्रिय राजनीति का रुख किया और भाजपा में शामिल हुए। संगठन में उनकी भूमिका लगातार बढ़ती गई और अब उन्हें राष्ट्रीय उपाध्यक्ष की जिम्मेदारी फिर मिली है।
भाजपा में कैसे बढ़ा कद?
तारिक मंसूर की पहचान केवल राजनीतिक नेता के तौर पर नहीं, बल्कि शिक्षा और चिकित्सा क्षेत्र से जुड़े व्यक्ति के रूप में भी रही है। वह विभिन्न राष्ट्रीय संस्थानों और सरकारी समितियों में भी जिम्मेदारियां संभाल चुके हैं। भाजपा में आने के बाद उनका इस्तेमाल पार्टी ने मुस्लिम समाज के बीच संवाद बढ़ाने वाले चेहरे के तौर पर भी किया। खासकर अलीगढ़ और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में उनकी सामाजिक और शैक्षणिक पृष्ठभूमि पार्टी के लिए महत्वपूर्ण मानी जाती है।

कौन हैं कुंवर बासित अली?
कुंवर बासित अली को भाजपा ने राष्ट्रीय अल्पसंख्यक मोर्चे का अध्यक्ष बनाया है। इससे पहले वह उत्तर प्रदेश भाजपा अल्पसंख्यक मोर्चे के प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी संभाल रहे थे। मेरठ के किठौर क्षेत्र से आने वाले बासित अली मुस्लिम राजपूत समुदाय से ताल्लुक रखते हैं। उनकी शुरुआती शिक्षा उत्तर प्रदेश बोर्ड से हुई। इसके बाद उन्होंने होटल मैनेजमेंट की पढ़ाई की और मेरठ में होटल कारोबार से जुड़े।
राजनीति में उनका प्रवेश संगठन के जमीनी कार्यकर्ता के रूप में हुआ। वर्ष 2011 में उन्होंने भाजपा के अल्पसंख्यक मोर्चे में मंडल स्तर से काम शुरू किया। इसके बाद जिला और क्षेत्रीय संगठन में अलग-अलग जिम्मेदारियां संभालते हुए वह प्रदेश स्तर तक पहुंचे। वर्ष 2021 में उन्हें उत्तर प्रदेश भाजपा अल्पसंख्यक मोर्चे का प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया। करीब पांच साल तक प्रदेश की जिम्मेदारी संभालने के बाद अब पार्टी ने उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर बड़ी भूमिका दी है।
लोकसभा चुनाव में बुर्कानशीं को पहचानने में तैनात किए थे एजेंट
लोकसभा चुनाव के दौरान बासित अली ने एक अलग तरह की पहल की। कुछ मुस्लिम बहुल मतदान केंद्रों पर बुर्का पहनकर फर्जी मतदान की आशंका को देखते हुए उन्होंने मुस्लिम महिला एजेंटों की तैनाती करवाई, ताकि महिला मतदाताओं की सही पहचान सुनिश्चित की जा सके। इस काम के लिए उन्होंने करीब पांच हजार मुस्लिम महिलाओं को विशेष प्रशिक्षण भी दिलवाया था।
यूपी पर भाजपा का फोकस क्यों?
उत्तर प्रदेश भाजपा के लिए सबसे महत्वपूर्ण राज्यों में है। विधानसभा की 403 और लोकसभा की 80 सीटों वाला यह राज्य केंद्र की राजनीति के साथ-साथ पार्टी के राष्ट्रीय चुनावी समीकरणों के लिए भी अहम है। 2024 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में भाजपा का प्रदर्शन 2019 की तुलना में कमजोर रहा। ऐसे में आगामी विधानसभा चुनाव से पहले पार्टी संगठन को मजबूत करने के साथ-साथ उन सामाजिक समूहों के बीच अपनी पहुंच बढ़ाना चाहती है, जहां उसे अपेक्षित समर्थन नहीं मिला। नई राष्ट्रीय टीम में उत्तर प्रदेश के कई नेताओं को जगह मिलना इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। इनमें तारिक मंसूर और बासित अली की मौजूदगी खास महत्व रखती है।

दो मुस्लिम चेहरों से क्या साधना चाहती है भाजपा?
भाजपा लंबे समय से मुस्लिम समाज में अपनी राजनीतिक पहुंच बढ़ाने की कोशिश कर रही है। पार्टी की रणनीति में खासतौर पर पसमांदा मुस्लिमों पर जोर दिखाई देता है। तारिक मंसूर और बासित अली की सामाजिक पृष्ठभूमि अलग-अलग है। एक ओर तारिक मंसूर का जुड़ाव अलीगढ़, शिक्षा और चिकित्सा क्षेत्र से है, वहीं बासित अली पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुस्लिम राजपूत समाज से आते हैं और लंबे समय से संगठन में सक्रिय हैं।
यही वजह है कि दोनों को अलग-अलग सामाजिक समूहों तक भाजपा का संदेश पहुंचाने वाले चेहरों के रूप में देखा जा रहा है। पार्टी की कोशिश मुस्लिम समाज को एकसमान वोट बैंक मानने के बजाय उसमें मौजूद अलग-अलग बिरादरियों और सामाजिक वर्गों तक राजनीतिक संवाद बढ़ाने की हो सकती है।
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पसमांदा मुस्लिमों पर क्यों है जोर?
'पसमांदा' फारसी शब्द है, जिसका सामान्य अर्थ पीछे छूटे या वंचित तबके से जुड़ा है। भारत में मुस्लिम समाज के भीतर भी अलग-अलग सामाजिक और बिरादरी समूह मौजूद हैं। पिछड़ी और अपेक्षाकृत वंचित मुस्लिम बिरादरियों को अक्सर पसमांदा श्रेणी के तहत राजनीतिक विमर्श में रखा जाता है। यूपी जैसे बड़े राज्य में इन समुदायों की संख्या और चुनावी प्रभाव को देखते हुए सभी प्रमुख राजनीतिक दल इनके बीच अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश करते रहे हैं।
भाजपा भी इसी सामाजिक समीकरण को साधने की रणनीति पर आगे बढ़ रही है। ऐसे में तारिक मंसूर और बासित अली की राष्ट्रीय संगठन में नियुक्ति को आगामी चुनाव से पहले मुस्लिम समाज के अलग-अलग वर्गों तक पहुंच बनाने की कोशिश के तौर पर देखा जा सकता है। हालांकि इन नियुक्तियों का वास्तविक चुनावी असर कितना होगा, यह आने वाले महीनों में पार्टी की जमीनी सक्रियता और मुस्लिम मतदाताओं के बीच उसके संदेश की स्वीकार्यता पर निर्भर करेगा।
