दलित-पिछड़ों के साथ अब 'पंडित' भी? यूपी चुनाव 2027 में ब्राह्मण वोट से जीत का फॉर्मूला तलाश रही सपा
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले सपा प्रमुख अखिलेश यादव 'पीडीए' में 'पंडित' को जोड़कर ब्राह्मणों को साधने की कोशिश कर रहे हैं।

सपा प्रमुख अखिलेश यादव।

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
अजय जायसवाल, लखनऊ। उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव भले ही अभी महीनों दूर हैं, लेकिन सियासत का तापमान चुनावी मौसम जैसा हो चुका है। चुनाव से पहले बिछ रही राजनीति की बिसात पर सामाजिक समीकरणों की गोलबंदी को लेकर घमासान शुरू हो गया है।
राजनीतिक दल पिछड़ों के साथ दलितों को अपने से जोड़ने में तो पहले से जुटे ही हैं, अब उनकी नजर ब्राह्मणों का साथ पाने की भी है ताकि सत्ता हासिल करने की राह आसान बन सके। अन्य समीकरणों संग सवर्णों में खासतौर से ब्राह्मणों के साथ से ही भाजपा लगातार चुनावी बढ़त बनाए हुए हैं।
दो दशक पहले वर्ष 2007 में बसपा प्रमुख मायावती ने भी दलित-ब्राह्मणों की सोशल इंजीनियरिंग के दम पर ही सूबे की सत्ता हासिल की थी। ऐसे में ब्राह्मणों की भाजपा से नाराजगी की चौतरफा चर्चाओं के बीच दिख रहे सत्ता के अवसर को समाजवादी पार्टी भी छोड़ना नहीं चाहती है।
मायावती की राह पर चले अखिलेश
ब्राह्मणों को साधने के लिए पहले से जुटे सपा प्रमुख अखिलेश यादव अब 'पीडीए' में 'पीडी' को पिछड़ा-दलित के साथ अब पंडित का भी शॉर्ट फॉर्म बताकर अपनी रणनीति साफ कर चुके हैं। अखिलेश की कोशिश पीडीए (पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक) संग ब्राह्मणों की सोशल इंजीनियरिंग से बसपा की तरह एक दशक बाद सत्ता हासिल करने की है।
पहले की तरह ब्राह्मणों का फिर 'आशीर्वाद' पाने को मायावती भी सक्रिय हैं, इसलिए हैट-ट्रिक लगाने की तैयारी में जुटी भाजपा के सामने अपने परंपरागत आधार को इस बार एकजुट रखने की बड़ी चुनौती होगी।
उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण मतदाता 10 प्रतिशत से ज्यादा माने जाते हैं। वोटरों से ज्यादा चुनावी समीकरण में ब्राह्मण समाज सदैव अहम भूमिका निभाता रहा है।
यूपी में 10 प्रतिशत से ज्यादा ब्राह्मण वोटर
राज्य की 403 विधानसभा सीटों में से 100 से अधिक पर ब्राह्मणों का व्यापक असर है और किसी न किसी तरह से यह लगभग पूरे प्रदेश को प्रभावित करते हैं। यही कारण है कि कोई भी पार्टी इस समाज की अनदेखी करने का जोखिम नहीं लेना चाहती।
वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में सपा की 37 सीटों पर जीत में पीडीए (पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक) ने भूमिका निभाई थी, लेकिन पार्टी को एहसास है कि केवल पीडीए के सहारे विधानसभा चुनाव में सत्ता पाना आसान नहीं है, इसलिए अब पीडीए की छतरी के नीचे ब्राह्मण समेत दूसरे सामाजिक समूहों को जोड़ने की कोशिश है।
पिछले दिनों जनेश्वर मिश्र की जयंती पर अखिलेश ने पीडीए में पंडित को पंडित से जोड़कर राजनीति को नया मोड़ दिया। ब्राह्मणों को साधने के लिए अखिलेश के इस नये कदम पर रणनीतिकारों का मानना है कि यदि पीडीए संग ब्राह्मणों का एक हिस्सा भी जुड़ता है तो विधानसभा चुनाव की मौजूदा तस्वीर बदल सकती है।
इस बार बसपा और सपा में भी टक्कर
अखिलेश के इस कदम की राजनीतिक अहमियत का अंदाजा इससे भी लगाया जा सकता है कि भाजपा और बसपा ने प्रतिक्रिया देने में देर नहीं की। भाजपा ने सपा सरकारों के कार्यकाल और ब्राह्मणों से जुड़े सवाल उठाकर पलटवार किया तो बसपा ने भी सपा पर निशाना साधा। यानी एक बयान ने भाजपा और बसपा को भी अपने-अपने सामाजिक आधार को सक्रिय करने का अवसर दे गया।
साफ है कि सत्ता के लिए सपा जहां पीडीए की छतरी बड़ी करना चाहती है तो बसपा दो दशक पुरानी सोशल इंजीनियरिंग के दम पर सत्ता में वापसी तलाश रही है। वर्ष 2007 की तरह ब्राह्मणों का फिर साथ पाने के लिए मायावती पार्टी संगठन से लेकर टिकट देने में ब्राह्मणों को जगह देती दिख रही हैं। चूंकि ब्राह्मणों पर सपा-बसपा, दोनों की नजर है, इसलिए मुकाबला केवल भाजपा से नहीं बल्कि एक-दूसरे से भी है।
ब्राह्मणों का बड़ा हिस्सा अब भी बीजेपी के साथ
विपक्ष, ब्राह्मणों में कथित नाराजगी की चर्चाओं को भी हवा दे रहा है। विपक्षियों की इस तरह की कोशिश भाजपा की बेचैनी बढ़ाने वाली है। ब्राह्मण, भाजपा का मजबूत सामाजिक आधार रहे हैं। राम मंदिर आंदोलन के बाद से इस वर्ग का बड़ा हिस्सा भाजपा के साथ रहा है।
कुछ समय से समाज की नाराजगी की चर्चाओं के बीच चढ़ावा चोरी आदि मामलों ने भी चुनौती बढ़ाई है। हालांकि, भाजपा के खासतौर से ब्राह्मण नेताओं को लगता है कि पार्टी पर ब्राह्मणों का भरोसा कायम है।
भरोसा बढ़ाने के लिए पार्टी ब्राह्मण बुद्धिजीवियों, अधिवक्ताओं, शिक्षकों और धार्मिक संस्थानों से संवाद बढ़ाने की रणनीति पर भी तेजी से काम करती दिख रही है।
