चार लोगों की हत्या का कोई प्रत्यक्षदर्शी नहीं, फिर भी हाई कोर्ट ने बरकरार रखी दोषियों की उम्रकैद की सजा
इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने हरदोई के चर्चित चार लोगों की हत्या के दोषी विनय प्रताप सिंह उर्फ बबलू की उम्रकैद की सजा बरकरार रखी है। ...और पढ़ें

इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ।

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विधि संवाददाता, लखनऊ। इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने हरदोई के चर्चित एक ही परिवार के चार लोगों की निर्मम हत्याकांड में दोषी विनय प्रताप सिंह उर्फ बबलू की उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा है।
अदालत ने स्पष्ट कहा कि मामले में कोई प्रत्यक्षदर्शी नहीं था, लेकिन परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की पूरी और अटूट शृंखला केवल आरोपित की ओर ही इशारा करती है। ऐसे में उसके दोषी होने पर कोई संदेह नहीं रह जाता। न्यायमूर्ति राजेश सिंह चौहान और न्यायमूर्ति अभदेश कुमार चौधरी की पीठ ने विनय प्रताप सिंह की आपराधिक अपील खारिज करते हुए सत्र अदालत के फैसले को सही ठहराया।
अदालत ने अपने फैसले में कहा कि आरोपित ने स्वयं अपने बयान में मृतका बबीता से घनिष्ठ संबंध और उसके घर आने-जाने की बात स्वीकार की थी। चार लोगों की हत्या उसी घर में हुई, जहां आरोपित मौजूद था, तब उसके ऊपर घटना के संबंध में संतोषजनक स्पष्टीकरण देने की जिम्मेदारी थी, लेकिन वह ऐसा नहीं कर सका। मामला हरदोई के संडी थाना क्षेत्र का है।
अभियोजन के अनुसार 24 जून 2009 की सुबह नंद्रानी, उनकी बेटी बबीता, नातिन गुंजन और नाती अंशु के शव घर में मिले थे। चारों की गला घोंटकर हत्या की गई थी। जांच में सामने आया कि विनय प्रताप सिंह करीब डेढ़ वर्ष से बबीता के साथ रह रहा था और घटना से एक रात पहले दोनों के बीच विवाह को लेकर विवाद हुआ था।
पुलिस ने घटना वाले दिन ही आरोपित को गिरफ्तार कर उसके कब्जे से मृतकों के आभूषण, मोबाइल फोन और अन्य सामान बरामद करने का दावा किया था। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में भी चारों की मौत गला घोंटने से होने की पुष्टि हुई।
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हाई कोर्ट ने कहा कि आरोपित और मृतका के संबंध, घटना से पहले का विवाद, आखिरी बार मृतकों के साथ आरोपित का देखा जाना, घटना के बाद उसका फरार होना और उसके कब्जे से मृतकों का सामान बरामद होना, ये सभी परिस्थितियां एक-दूसरे से जुड़कर अभियोजन की कहानी को पूरी तरह पुष्ट करती हैं।
इन्हीं आधारों पर अदालत ने हत्या, संपत्ति के दुरुपयोग, एससी-एसटी अधिनियम और अन्य धाराओं में जिला अदालत द्वारा सुनाई गई उम्रकैद सहित अन्य सजाओं को यथावत बरकरार रखा।
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