कैंसर कितना गंभीर है? पहले ही चल जाएगा पता, PGI लखनऊ के वैज्ञानिकों की बड़ी कामयाबी
एसजीपीजीआई लखनऊ के शोधार्थियों ने मल्टीपल मायलोमा (ब्लड कैंसर) की गंभीरता और इलाज की प्रतिक्रिया का अनुमान लगाने के लिए एक नए संकेतक (एसएफएलसी रेशियो) ...और पढ़ें

पीजीआई लखनऊ। (तस्वीर- फाइल)

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कुमार संजय, लखनऊ। ब्लड कैंसर मल्टीपल मायलोमा को लेकर संजय गांधी परास्नातक आयुर्विज्ञान संस्थान (एसजीपीजीआइएमएस) के शोधार्थियों ने एक ऐसे संकेतक (मार्कर) की पहचान की है, जिससे बीमारी की गंभीरता का अंदाजा पहले से लगाया जा सकेगा।
जिन मरीजों का सीरम फ्री लाइट चेन (एसएफएलसी) रेशियो सामान्य या लगभग सामान्य रहता है, उनमें बीमारी अपेक्षाकृत कम आक्रामक होती है। इलाज का असर भी बेहतर देखने को मिलता है।
अध्ययन में कुल 306 लोगों को शामिल किया गया, जिनमें 240 मरीज मल्टीपल मायलोमा से पीड़ित थे। इनमें 9.6 प्रतिशत मरीजों का एसएफएलसी रेशियो सामान्य पाया गया। ऐसे मरीजों में बीमारी का असर कम गंभीर रहा और इलाज के प्रति प्रतिक्रिया भी बेहतर मिली।
सबसे अहम बात यह रही कि नार्मल एसएफएलसी रेशियो वाले 88.9 प्रतिशत मरीजों में इलाज के बाद वेरी गुड पार्टियल रिस्पांस देखा गया, जबकि असामान्य एसएफएलसी रेशियो वाले मरीजों में यह आंकड़ा 65.4 प्रतिशत रहा।
शोधार्थियों के मुताबिक नार्मल या लगभग नार्मल एसएफएलसी रेशियो वाले मरीजों में बीमारी कम खतरनाक हो सकती है। उनका शरीर इलाज पर बेहतर प्रतिक्रिया देता है। भविष्य में यह जांच मल्टीपल मायलोमा मरीजों की जोखिम श्रेणी तय करने में अहम बायोमार्कर साबित हो सकती है।
दुनिया में हर साल आ रहे नए मामले
मल्टीपल मायलोमा अपेक्षाकृत कम पाया जाने वाला गंभीर ब्लड कैंसर है। दुनियाभर में हर साल बड़ी संख्या में इसके नए मामले सामने आते हैं। भारत में भी यह ब्लड कैंसर के प्रमुख प्रकारों में शामिल है। यह बीमारी आमतौर पर 60 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों में ज्यादा देखी जाती है, हालांकि अब कम उम्र के मरीजों में भी इसके मामले सामने आने लगे हैं।
मल्टीपल मायलोमा
मल्टीपल मायलोमा ब्लड कैंसर का एक प्रकार है। इसमें शरीर की प्लाज्मा कोशिकाएं असामान्य रूप से बढ़ने लगती हैं। सामान्य स्थिति में ये कोशिकाएं संक्रमण से लड़ने वाली एंटीबाडी बनाती हैं, लेकिन बीमारी होने पर ये असामान्य प्रोटीन बनाने लगती हैं। इससे हड्डियों में दर्द, कमजोरी, खून की कमी और किडनी से जुड़ी समस्याएं हो सकती हैं।
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इन्होंने किया शोध
एसजीपीजीआइएमएस के हेमेटोलाजी विभाग के डॉ. मनीष के. सिंह, डा. संजीव यादव, डॉ. अक्षिता पांडेय, डा. खलीकुर रहमान, डॉ. मोना विजयरण, डॉ. पूरवी कपूर, डॉ. सायन सिन्हा राय, डॉ. रुचि गुप्ता, डॉ. दिनेश चंद्र, डॉ. कौशल कुमार और डॉ. विनीता शर्मा इस शोध से जुड़े रहे।
विभागाध्यक्ष प्रो. राजेश कश्यप के नेतृत्व में किए गए इस अध्ययन को अंतरराष्ट्रीय जर्नल इंटरनेशनल जर्नल आफ लेबोरेटरी हेमेटोलाजी ने स्वीकार किया है।
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